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राहुल गांधी: काठ के घोड़े पर सवार उत्तराधिकारी

कांग्रेस में अगले चुनाव के लिए राहुल ही तय चेहरा हैं. लेकिन पार्टी के सामने दरपेश इस सबसे संकटपूर्ण दौर में क्या वे कमान संभालेंगे?

राहुल गांधी
राहुल गांधी
अपडेटेड 1 अक्टूबर , 2012

अब कैमरा क्लिक होने ही वाला था कि सोनिया गांधी की नजरें लेंस से हटकर दूसरी तरफ चली गईं. यह 15 सितंबर की बात है, जब वे दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टुडेंट यूनियन के चुनावों में विजयी हुए एनएसयूआइ के नेताओं से घिरी हुई थीं. फोटोग्राफरों द्वारा फोटो लेने के बीच में ही वे राहुल गांधी की ओर मुखातिब हुईं जो तस्वीर में नहीं आ रहे थे. जब राहुल फ्रेम में आ गए, तब ही सोनिया मुस्कराईं.

सिर्फ सोनिया गांधी ही राहुल की तलाश में नहीं रहती हैं. पिछला हफ्ता पार्टी के लिए मुश्किल भरा रहा है. केंद्र सरकार डगमगा रही है. लेकिन राहुल गांधी कुछ करते नहीं दिख रहे. राहुल वही व्यक्ति हैं जिनके निकट भविष्य में पार्टी का नेतृत्व संभालने का संकेत दिया गया है. वे सहयोगी दलों से बात करने या संकट दूर करने के लिए सामने नहीं आए. इसकी एक वजह यह है कि उमर अब्दुल्ला के अलावा सहयोगी दलों में और किसी से उनकी नजदीकी नहीं है.

इसके ठीक उलट सोनिया सहयोगी दलों के नेताओं से आसानी से घनिष्ठता कायम कर लेती हैं. यहां तक कि जब ममता बनर्जी ने यूपीए-2 सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा की तो उन्होंने यह जोडऩे में देर नहीं की कि कांग्रेस अध्यक्ष के साथ उनके ‘व्यक्तिगत संबंधों’ में कोई ‘बदलाव नहीं’ आएगा. जबकि राहुल ने बेरुखी दिखाते हुए 20 सितंबर को भारत बंद के दिन दिल्ली में आयोजित अपने साप्ताहिक जनता दरबार को रोक दिया.Rahul Gandhi

राहुल ने 13 सितंबर को अमेठी में पत्रकारों से कहा था कि वे जल्दी ही एक बड़ी भूमिका में सामने आएंगे. लेकिन मौजूदा संकट से उनकी तरक्की में देरी हो सकती है. पार्टी के एक वरिष्ठ महासचिव के अनुसारए ‘मां-बेटे ही तय करेंगे कि यह कब होगा. हम अब भी नहीं जानते हैं कि उन्हें कौन-सा पद दिया जाएगा, लेकिन सभी महासचिव उनके मातहत ही होंगे. ’’ इस बीच राहुल रहस्यमय व्यक्तित्व बने हुए हैं.

कांग्रेसी इस बात को लेकर भी भ्रमित हैं कि राहुल खुदरा कारोबार में एफडीआइ का समर्थन करते हैं या नहीं. उत्तर प्रदेश के चुनावों में हार के बाद से ही राहुल ने लगातार चुप्पी ओढ़ रखी है. सरकार ने जब 13 सितंबर को डीजल की कीमत में बढ़ोतरी की घोषणा की तब वे अमेठी के दौरे पर थे. इस वृद्धि के खिलाफ उनके संसदीय क्षेत्र के लोगों ने मुंशीगंज गेस्टहाउस में उनका घेराव किया. टीवी पर यूपीए के सहयोगी दल सरकार की आलोचना कर रहे थे, लेकिन राहुल यूपीए के बचाव में सामने नहीं आए.

राहुल को अपने हाल के अमेठी दौरे से कोई एक सबक यदि सीखना चाहिए तो वह यह कि उनकी चुप्पी ज्यादा समय तक रहस्यमय नहीं रह सकती. इसकी जगह इससे केवल लोगों में उनके खिलाफ धीरे-धीरे पैदा हो रहा गुस्सा और कुंठा ही बढ़ेगी. उत्तर प्रदेश के भादर में 13 सितंबर को यूको बैंक की एक शाखा के उद्घाटन के दौरान कुछ लोग विरोध में नारे लगाने लगे. विरोध करने वाला एक व्यक्ति कह रहा था, ‘‘एटीएम मशीन भूल जाइए. हमें सड़कें और नौकरियां चाहिए.’’

राहुल ने विरोध करने वालों को सुनाए लेकिन इस पर कुछ नहीं कहा. भादर के ही निवासी गायत्री प्रसाद प्रजापति ने कहा, ‘‘हम वीआइपी इलाके में रहते हैं, फिर भी यहां अच्छी सड़कें नहीं हैं.’’ इस 60 वर्षीय किसान ने कहा कि पड़ोस के रामपुर खास में सड़कें यहां से अच्छी हैं. राहुल जब भी अमेठी में होते हैं, वे मुंशीगंज गेस्ट हाउस में ‘जनता दरबार’ लगाते हैं लेकिन इसका आकर्षण खत्म हो रहा है क्योंकि लोगों की बाद में सुनवाई बहुत कम होती है.

फरवरी-मार्च में हुए यूपी विधानसभा चुनावों के बाद यह राहुल की दूसरी अमेठी यात्रा थी. इसके पहले वे मई में वहां गए थे. स्थानीय कांग्रेसी विधायक अखिलेश प्रताप सिंह कहते हैं, ‘‘राहुल गांधी खोखले वादे करने में भरोसा नहीं करते. वे वादे करने की जगह काम करके दिखाते हैं.’’

राहुल संरक्षण की परंपरागत राजनीति के प्रति चौकन्ने रहते हैं. अप्रैल, 2011 में असम चुनावों के लिए प्रचार अभियान के दौरान उन्हें युवाओं का एक समूह मिला जिनकी शिकायत थी कि दिल्ली में नौकरियों के मामले में पूर्वोत्तर के युवाओं के साथ भेदभाव किया जाता है. राहुल गांधी ने कहा, ‘‘मुझे ऐसा नहीं लगता. मुझे तो हॉस्पिटेलिटी कारोबार में बड़ी संख्या में पूर्वोत्तर के लोग दिखते हैं.’’ यह सपाट बयान था, लेकिन शायद उन युवाओं ने इसकी उम्मीद नहीं की थी.

इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में 2007 में चुनाव प्रचार के दौरान बस्तर के एक ग्रामीण ने उनसे इलाके में और हैंडपंप लगवाने की गुजारिश की. लेकिन सीधे इसका वादा कर देने की जगह उन्होंने कहा, ‘‘पहले मुझे यह पता करने दीजिए कि आपके गांव का जलस्तर इस बात की इजाजत देता है या नहीं. ’’ अमेठी के लोगों का दावा है कि उनके दिल्ली स्थित संसदीय क्षेत्र कार्यालय में एक बोर्ड लगाया गया है कि ‘‘नो नौकरी, नो ट्रांसफर.’ इस पर किसी को शिकायत हो सकती है, यह राहुल की ख्याति का हिस्सा है.

अमेठी के बाहर राहुल के कामकाज की शैली रहस्य बनी हुई है. वे कांग्रेस मुख्यालय की जगह 12 तुगलक रोड स्थित अपने आवास से अपनी टीम के माध्यम से काम करना पसंद करते हैं. उत्तर प्रदेश चुनावों के दौरान भी वे स्थानीय नेतृत्व को शामिल करने की जगह अपनी मदद के लिए युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को लेकर गए थे.

वे यदि बड़ी भूमिका को लेकर गंभीर हैं तो उन्हें कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अपने प्रति अविश्वास को खत्म करना होगा. अमेठी के टिकरमाफी गांव के 50 वर्षीय कांग्रेस कार्यकर्ता रवीन प्रताप सिंह ताना मारते हुए कहते हैं, ‘‘ये तो बिना बनेए बने-बनाए हैं. उन्हें ज्यादा सक्रिय भूमिका के लिए किसी पद की क्या जरूरत है.’’ यह पूरे पार्टी की मनोदशा का मूल है.

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