पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर हालात लगातार बदल रहे हैं. कभी तनाव बढ़ रहा है तो कभी कम होता दिख रहा है लेकिन अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी टकराव पर नजर रखने वाली दुनिया के लिए आर्थिक अनिश्चितता अब भी बनी हुई है.
23 जुलाई को ब्रेंट क्रूड की कीमत मई के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई. इसकी वजह हूती विद्रोहियों का वह दावा था जिसमें उन्होंने बब-अल-मंदेब स्ट्रेट में सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों पर हमले की बात कही थी. इससे पहले उन्होंने सऊदी अरब के तेल निर्यात पर नौसैनिक नाकाबंदी का ऐलान भी किया था.
यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक थी क्योंकि सऊदी अरब इसी रास्ते का इस्तेमाल होर्मुज में आ रही बाधाओं से बचने के लिए कर रहा था. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कई जहाजों ने बब-अल-मंदेब से गुजरने का रास्ता बदल दिया या अपनी यात्रा टाल दी. इसका दुनिया भर के तेल बाजार पर नकारात्मक असर पड़ा.
हालांकि 26 जुलाई को तेल की कीमतों में फिर गिरावट आई. खबरें आईं कि जब तक अमेरिका हमला नहीं करेगा तब तक ईरान भी हमले रोक देगा. दो हफ्ते तक लगातार बढ़े तनाव के बाद हालात कुछ शांत होने पर ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई. 27 जुलाई को भारतीय शेयर बाजार में भी तेजी देखने को मिली और बीएसई सेंसेक्स 776 अंक चढ़कर 76,835 पर बंद हुआ.
इसके बावजूद भारत के लिए स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है. महंगाई लगातार बढ़ रही है. जून में खुदरा महंगाई दर मई के 3.93 प्रतिशत से बढ़कर 4.38 प्रतिशत हो गई. इसकी बड़ी वजह खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती कीमतें रहीं. यह पिछले 18 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर था और दिसंबर 2024 के बाद पहली बार खुदरा महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक के 4 से 6 प्रतिशत के लक्षित दायरे की निचली सीमा को पार कर गई. जून में खाद्य महंगाई भी मई के 4.78 प्रतिशत से बढ़कर 5.32 प्रतिशत हो गई.
युद्ध के दौरान भारत में ईंधन की कीमतें पहले ही बढ़ाई जा चुकी हैं. कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने और अमेरिका-ईरान के बीच अस्थायी युद्धविराम के बावजूद इनमें कोई कमी नहीं की गई है. कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखते हुए फिलहाल ईंधन की कीमतों में राहत मिलने की उम्मीद भी नहीं है. इसका सीधा असर परिवहन लागत पर पड़ेगा, जिससे सामान और सेवाएं दोनों महंगी होंगी.
ऐसी भी खबरें हैं कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतों की वजह से उपभोक्ता वस्तुएं बनाने वाली कंपनियों के पहली तिमाही के मुनाफे पर दबाव पड़ेगा. यह तब है, जब ये कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतें पहले ही बढ़ा चुकी हैं.
इसका असर कपड़ा उद्योग जैसे दूसरे क्षेत्रों पर भी सीधे तौर पर पड़ेगा. क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल से जुड़े कच्चे माल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी की वजह से इस वित्त वर्ष पॉलिएस्टर यार्न बनाने वाली कंपनियों की बिक्री 2 से 3 प्रतिशत तक घट सकती है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वित्त वर्ष कच्चे तेल की औसत कीमत 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान है जो पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले करीब 15 प्रतिशत अधिक होगी. इसका सीधा असर प्रमुख कच्चे माल की कीमतों पर पड़ेगा.
24 जुलाई को जारी एक रिसर्च नोट में क्रिसिल रेटिंग्स के निदेशक शौनक चक्रवर्ती ने कहा, "पश्चिम एशिया संघर्ष से पैदा हुई दिक्कतों और कपड़ा उद्योग के निचले स्तर पर कमजोर मांग की वजह से चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में पॉलिएस्टर की मांग पर बड़ा असर पड़ा और इसकी बिक्री की मात्रा में करीब 20 प्रतिशत की गिरावट आई. बिक्री में आई गिरावट की भरपाई के लिए कंपनियां कच्चे माल की बढ़ी हुई लागत का बोझ धीरे-धीरे ग्राहकों पर डालेंगी. इससे इस वित्त वर्ष उनकी बिक्री में गिरावट 2 से 3 प्रतिशत तक सीमित रहने की उम्मीद है.."
उन्होंने कहा कि प्यूरिफाइड टेरेफ्थैलिक एसिड (PTA) और मोनोएथिलीन ग्लाइकोल (MEG) जैसे कच्चे तेल से जुड़े कच्चे माल, कंपनियों की कुल आय का लगभग 60 से 65 प्रतिशत हिस्सा हैं. ऐसे में इस रणनीति से कंपनियों के परिचालन यानी ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर पड़ेगा.

