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पूर्वोत्तर पर टिकी जापान की नई भारत नीति

प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की भारत यात्रा इस बात का संकेत देती है कि जापान अब भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को अपनी रणनीति का अहम आधार मान रहा है

जापान की PM सनाए ताकाइची, पीएम मोदी के साथ
जापान की PM सनाए ताकाइची, पीएम मोदी के साथ
अपडेटेड 2 जुलाई , 2026

पहली जुलाई को जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची अपनी पहली आधिकारिक भारत यात्रा पर नई दिल्ली पहुंची हैं. भारत-जापान की 16वीं वार्षिक शिखर बैठक में व्यापार, रक्षा तकनीक, सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिज और सप्लाई चेन को मजबूत बनाने जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी.

यह बैठक भले ही देश की राजधानी नई दिल्ली में हो रही हो लेकिन दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की चर्चा के केंद्र में पूर्वोत्तर होगा. दोनों देशों की ओर से जिस रणनीति को आगे बढ़ाया जाएगा उसकी शुरुआत 2,000 किलोमीटर दूर भारत के पूर्वोत्तर के पहाड़ी और नदी-बहुल इलाकों से होती है.

दरअसल, भारत और जापान ने पहले इस शिखर बैठक के लिए असम को मेजबान बनाने पर विचार किया था. हालांकि, जापानी संसद (डाइट) के कार्यक्रम की वजह से ताकाइची को दिल्ली आना पड़ा.

असम में ताकाइची की मेजबानी को लेकर विचार करने मात्र से ही यह साफ हो गया था कि जापान की रणनीतिक सोच में पूर्वोत्तर का महत्व कितना बढ़ चुका है. पहले इसे केवल सीमावर्ती और सहायता पाने वाला इलाका माना जाता था लेकिन अब टोक्यो इसे अपनी भारत नीति की सबसे अहम कड़ी मानता है.

इसकी सबसे बड़ी वजह पूर्वोत्तर की भौगोलिक स्थिति है. पूर्वोत्तर भारत मुख्य भूमि से सिर्फ सिलीगुड़ी कॉरिडोर के जरिए जुड़ा है. 20-22 किलोमीटर चौड़ी यह 'चिकन नेक' पट्टी नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और चीन की चुंबी घाटी के बीच स्थित है. 4 करोड़ से अधिक लोगों के लिए यही एकमात्र जमीनी संपर्क है.

2017 के डोकलाम विवाद के बाद से भारत इसे अपनी सबसे संवेदनशील रणनीतिक कमजोरी मानता है. ऐसे में पूर्वोत्तर को चिकन नेक के अलावा किसी और रास्ते से जोड़ने वाली हर सड़क, पुल और जलमार्ग भारत के लिए रणनीतिक सुरक्षा का काम करता है.

जापान के लिए भी यह क्षेत्र बेहद अहम है. जापान इस क्षेत्र को समुद्री रास्तों की सुरक्षा और मजबूत सप्लाई चेन के लिए अहम मानता है. चिकन नेक बेहतर तरीके से जुड़ा पूर्वी भारत एक ऐसा वैकल्पिक मार्ग है, जिससे रणनीतिक दबाव और चीन पर निर्भरता कम की जा सकती है. जापान ने इस महत्व को दूसरे देशों से पहले समझा और उसी हिसाब से निवेश भी करने के लिए तैयार हुआ है. जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) के जरिए पूर्वोत्तर में बड़े पैमाने पर परियोजनाएं चलाने वाला जापान एकमात्र विदेशी साझेदार है.

भारत में जापान के राजदूत ओनो केइइची ने फरवरी 2025 में गुवाहाटी में आयोजित एडवांटेज असम 2.0 सम्मेलन में बताया था कि जापान सड़क, जल, बिजली, स्वास्थ्य और जैव विविधता से जुड़ी परियोजनाओं के लिए 22,000 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता दे चुका है. इसके लिए 2017 में तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे की भारत यात्रा के दौरान भारत-जापान एक्ट ईस्ट फोरम बनाया गया था, जो भारत की एक्ट ईस्ट नीति और जापान के फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक विजन को जोड़ता है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी कह चुके हैं कि इस फोरम की वजह से टोक्यो में पूर्वोत्तर की परियोजनाओं को प्राथमिकता मिली.

अब यह केवल योजना नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाला काम भी बन चुका है. असम में धुबरी-फुलबाड़ी पुल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. राष्ट्रीय राजमार्ग-127बी पर बन रहा 19.3 किलोमीटर लंबा यह केबल-स्टे पुल 4,997 करोड़ रुपये के JICA ऋण से बन रहा है. दिसंबर 2025 तक इसका 67.5 फीसद काम पूरा हो चुका था. इस परियोजना की निगरानी सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय कर रहा है और लार्सन एंड टर्बो (एलएंडटी) इसे सितंबर 2028 तक पूरा करेगी. इसके बनने के बाद असम और मेघालय के बीच 205 किलोमीटर और 6-7 घंटे का रास्ता घटकर सिर्फ 20 मिनट रह जाएगा.

मध्य असम के जागीरोड में टाटा का 27,000 करोड़ रुपये का सेमीकंडक्टर असेंबली और टेस्टिंग प्लांट, जिसे भारत का सबसे बड़ा प्लांट बताया जा रहा है. यह जल्द उत्पादन शुरू करने की तैयारी में है. केंद्र सरकार ने इस साल मई में कहा था कि मौजूदा वित्त वर्ष के भीतर उत्पादन शुरू हो जाएगा. जापानी कंपनियां भी इस परियोजना का हिस्सा हैं. टोक्यो इलेक्ट्रॉन ने टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ उपकरण और प्रशिक्षण के लिए साझेदारी की है और एडवांटेज असम 2.0 में जापानी कंपनियां सप्लायर के तौर पर शामिल हुई थीं.

इनके अलावा गुवाहाटी की जल और सीवरेज परियोजनाएं, मेघालय की उमियाम-उमटू स्टेज-3 जलविद्युत परियोजना का नवीनीकरण, त्रिपुरा और नागालैंड में वन प्रबंधन, कोहिमा में मेडिकल कॉलेज और 2022 में शुरू की गई बांस आधारित वैल्यू चेन जैसी परियोजनाएं भी चल रही हैं. दरअसल, जापान और भारत मिलकर पूर्वोत्तर भारत में 'बांस मूल्य श्रृंखला' का विकास कर रहे हैं.

ताकाइची को जापानी राजनीति में शिंजो आबे की विरासत को सबसे मजबूती से आगे बढ़ाने वाला नेता माना जाता है. उन्हें जापान की 'आयरन लेडी' भी कहा जाता है. पूर्व आर्थिक सुरक्षा मंत्री रह चुकी ताकाइची के लिए चीन पर निर्भरता कम करना सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है. ताइवान के समर्थन, चीन के प्रति सख्त रुख और 'इंडस्ट्रियल डिटरेंस' पर जोर देने वाली उनकी सोच में भारत का पूर्वोत्तर चीन की घेराबंदी का मुकाबला करने वाली रणनीति का अहम हिस्सा बन जाता है.

ताकाइची अपने साथ जिस सोच को लेकर भारत आई हैं, उसे विश्लेषक 'ताकाइची डॉक्ट्रिन' कह रहे हैं. इसके तहत आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय रक्षा का विस्तार माना जाता है. इस सोच में मजबूत सप्लाई चेन, सेमीकंडक्टर और तकनीकी आत्मनिर्भरता सिर्फ आर्थिक प्राथमिकताएं नहीं बल्कि चीन जैसी बड़ी ताकत का मुकाबला करने के साधन हैं. यानी राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ युद्ध के मैदान में नहीं बल्कि फैक्ट्रियों, सप्लाई चेन और औद्योगिक नीति में भी तय होती है. 'इंडस्ट्रियल डिटरेंस' का मतलब है कि उत्पादन क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय शक्ति में बदलना है.

असम और पूर्वोत्तर इस सोच में पूरी तरह फिट बैठते हैं. ऐसा सेमीकंडक्टर प्लांट जो पैकेजिंग क्षमता को पूर्वी एशिया से हटाकर यहां लाए, बांस से बायोफ्यूल बनाने वाली वैल्यू चेन और भरोसेमंद तरीके से श्रमिक तैयार करने वाली स्किलिंग व्यवस्था, ये सब 'फ्रेंड-शोरिंग' की उसी नीति का हिस्सा हैं. जहां आबे पूर्वोत्तर को मुख्य रूप से संपर्क बढ़ाने के नजरिए से देखते थे, वहीं ताकाइची इसे आर्थिक सुरक्षा के बुनियादी ढांचे के रूप में देखती हैं.

अप्रैल 2026 में ताकाइची ने जापान के रक्षा निर्यात नियमों में बदलाव किया, जिसके तहत भारत सहित 17 देशों को घातक रक्षा उपकरणों के निर्यात की अनुमति दी गई. इसी रणनीति के तहत भारत और जापान ने मिलकर भारतीय युद्धपोतों के लिए यूनिकॉर्न मस्तूल विकसित किया, जिसका निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ मिलकर किया जा रहा है.

दरअसल, यूनिकॉर्न (UNICORN), जिसका पूरा नाम यूनिफाइड कॉम्प्लेक्स रेडियो एंटीना (Unified Complex Radio Antenna) है, युद्धपोतों के लिए एक उन्नत और एकीकृत मस्तूल (mast) प्रणाली है. यह जहाजों के संचार और रडार एंटीना को एक ही संरचना में मिला देता है, जिससे युद्धपोत की रडार पकड़ में न आने की क्षमता (स्टील्थ) और डिज़ाइन बेहतर हो जाता है.

इससे बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना की क्षमता बढ़ेगी, जहां तक पूर्वोत्तर के संपर्क मार्ग पहुंचने वाले हैं. आबे ने फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक की अवधारणा दी थी और भारत-जापान संबंधों को मजबूत किया था. ताकाइची उसी सोच को और अधिक आर्थिक सुरक्षा वाले नजरिए के साथ आगे बढ़ा रही हैं.

दोनों देशों की जनसंख्या संरचना भी इस साझेदारी को मजबूती देती है. एक ओर वृद्ध होती लेकिन पूंजी संपन्न जापान है, दूसरी ओर युवा लेकिन रोजगार की तलाश में भारत का पूर्वोत्तर. अप्रैल 2026 में मेघालय ने पांच साल में 5,000 युवाओं को प्रशिक्षण देकर जापान भेजने के लिए समझौता किया.

असम और भारत का एक समझौता 20,000 युवाओं को जापान भेजने का लक्ष्य रखता है. गुवाहाटी में भाषा और कौशल केंद्र पहले से चल रहे हैं और नागालैंड तथा मणिपुर के साथ भी बातचीत जारी है. असम की सीएम-फ्लाइट योजना जापानी भाषा और रोजगार के लिए प्रशिक्षण देती है. इससे जापान के देखभाल, कृषि और विनिर्माण क्षेत्रों को श्रमिक मिलेंगे और पूर्वोत्तर में पूंजी और कौशल का प्रवाह बढ़ेगा.

इस रिश्ते में एक भावनात्मक पहलू भी जुड़ा है. 1944 में इंफाल और कोहिमा की लड़ाइयां जापान की भारत में पहुंचने के बाद लड़ी गई थी. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इस लड़ाई में जापान की बड़ी हार हुई थीं. हालांकि, अब उसी इतिहास को दोनों देशों के बीच मेल-मिलाप की नींव बनाया गया है.

निप्पॉन फाउंडेशन के सहयोग से 2019 में इंफाल पीस म्यूजियम खोला गया और कोहिमा की लड़ाई की 80वीं वर्षगांठ पर जापान और नागालैंड ने एक शांति स्मारक का उद्घाटन किया. जो जगह कभी युद्ध का मैदान थी, आज वही दोस्ती की मिसाल बन गई है. इस क्षेत्र में बहुत कम द्विपक्षीय संबंध ऐसे हैं, जिनमें इतिहास को इतनी सोच-समझकर विश्वास में बदला गया हो.

हालांकि, इस रणनीति के सामने कई अनिश्चित चुनौतियां भी हैं. सबसे बड़ी चुनौती सीमा पार बांग्लादेश में है. जापान की बड़ी योजना'बे ऑफ बंगाल-नॉर्थईस्ट इंडिया इंडस्ट्रियल वैल्यू चेन' है, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा ने 2023 में पेश किया था. ये योजना जाहिर करता है कि जापान, बांग्लादेश और पूर्वोत्तर को एक आर्थिक क्षेत्र के रूप में देखती है. जापानी संस्था JICA की मदद से बांग्लादेश में बन रहा पहला डीप शी पोर्ट मातारबारी इसका बड़ा उदाहरण है. यह गहरे समुद्र का बंदरगाह है, जो पूर्वोत्तर को समुद्र तक सीधी पहुंच देगा.

हालांकि, मातारबारी बंदरगाह का पूरा व्यावसायिक संचालन, जिसे पहले 2026 तक शुरू होना था, अब 2029-30 तक टल गया है. इस बीच बांग्लादेश की राजनीति भी अस्थिर हो गई. शेख हसीना, जिनके समय यह योजना बनी थी, अगस्त 2024 में सत्ता से बाहर हो गईं. अंतरिम सरकार का झुकाव चीन की ओर रहा और फरवरी 2026 के चुनाव में तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार बनी, जिसने देशहित के आधार पर पुराने समझौतों की समीक्षा करने की बात कही है.

इसके बाद हालात पूरी तरह नहीं बिगड़े बल्कि सुधार की दिशा में बढ़े हैं. संपर्क परियोजनाएं फिर शुरू हो गई हैं लेकिन जो योजना पहले भारत समर्थक ढाका पर आधारित थी, अब वह 'बांग्लादेश फर्स्ट' सरकार के दौर में आगे बढ़ रही है. दूसरी ओर म्यांमार के रास्ते का जमीनी संपर्क गृहयुद्ध के कारण बंद है. ऐसे में फिलहाल जापान की पूर्वोत्तर रणनीति सिर्फ भारत वाले हिस्से पर निर्भर है, जबकि सीमा पार का संपर्क पड़ोसी देशों की परिस्थितियों पर टिका हुआ है.

घरेलू स्तर पर भी कई अड़चनें हैं. JICA ने पूर्वोत्तर की प्रमुख सड़क परियोजनाओं को पर्यावरणीय प्रभाव के आधार पर कैटेगरी-ए में रखा है. वहीं राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (NHIDCL) के रिकॉर्ड बताते हैं कि भूमि अधिग्रहण, बिजली और अन्य सेवाओं का स्थानांतरण, वन स्वीकृतियां और कभी-कभी ठेके रद्द होने जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं.

धुबरी-फुलबाड़ी पुल परियोजना में भी स्थानीय लोगों के विरोध और बेदखली के मुद्दे सामने आए हैं. यही वे कारण हैं जिनसे रणनीतिक परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पाती हैं. विवादित जमीन और मणिपुर की जातीय हिंसा के कारण निजी जापानी निवेश अब तक सरकारी निवेश से काफी पीछे है.

असम के नगरबेरा में प्रस्तावित जापानी औद्योगिक टाउनशिप के लिए वर्षों पहले 2,000 बीघा जमीन अधिग्रहित की गई थी लेकिन जापानी कंपनियों की रुचि न होने से वह अब भी खाली पड़ी है. इससे साफ है कि सरकारी ऋण तो तेजी से आगे बढ़ते हैं लेकिन निजी निवेश में समय लगता है.

यही वजह है कि शिखर बैठक का स्थान भी महत्वपूर्ण है. अगर यह बैठक गुवाहाटी में होती तो दोनों देशों को यह दिखाना पड़ता कि क्या काम पूरा हुआ और क्या नहीं. अब यह बैठक दिल्ली में होने से चर्चा रणनीतिक घोषणाओं तक सीमित रह सकती है, जहां बयान देना आसान और उन्हें लागू करना कठिन होता है.

ताकाइची की इस यात्रा की असली कसौटी यही होगी कि क्या संयुक्त बयान में पूर्वोत्तर और बे ऑफ बंगाल वैल्यू चेन का स्पष्ट उल्लेख होता है. इसके अलावा देखने वाली बात यह भी होगी कि क्या फरवरी 2024 के बाद पहली बार एक्ट ईस्ट फोरम की आठवीं बैठक होती है और क्या परियोजनाओं की समयसीमा तेज की जाती है.

इंफाल और कोहिमा जैसी ऐतिहासिक लड़ाइयों का गवाह रहा यह क्षेत्र आज भारत के स्थलीय और समुद्री भविष्य के संगम पर खड़ा है. जापान ने इस महत्व को भारत से पहले समझा और पूर्वोत्तर पर किसी भी दूसरे विदेशी साझेदार से ज्यादा भरोसा और निवेश किया.

अब सवाल यह नहीं है कि टोक्यो इस क्षेत्र की अहमियत समझता है या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या ताकाइची और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकारें शिखर बैठकों से आगे बढ़कर इन योजनाओं को समय पर पूरा भी कर पाएंगी?

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