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बांग्लादेश में हिंदुओं ने बेखौफ मनाई दुर्गा पूजा लेकिन सुरक्षा पर सवाल बरकरार

बांग्लादेश में इस बार दुर्गा पूजा के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम रहे और बड़े हमलों की आशंका के बीच उत्सव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ. हालांकि हिंदू समुदाय की सुरक्षा और पुराने हमलों के मामलों में न्याय को लेकर चिंताएं अब भी बनी हुई हैं

एक पूजा पंडाल में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान
अपडेटेड 26 अक्टूबर , 2026

म्यमेनसिंह में दुर्गा बाड़ी रोड पर विसर्जन जुलूस आगे बढ़ रहा था. सफेद साड़ियों में लाल बॉर्डर वाली साड़ियां पहने महिलाओं की भारी भीड़ सड़कों पर नाच रही थी. वायरल हुए इस वीडियो को देखने वाले किसी भी व्यक्ति को लग सकता था कि यह कोलकाता या पश्चिम बंगाल के किसी दूसरे इलाके का नजारा है, जहां दुर्गा पूजा धार्मिक आयोजन के साथ-साथ एक बड़ा सांस्कृतिक उत्सव भी है.

लेकिन यह बांग्लादेश था.

बांग्लादेश के कई हिंदुओं के लिए खुशी के इस बेखौफ इजहार का मतलब सिर्फ उत्सव तक सीमित नहीं था. पिछले कुछ सालों में दुर्गा पूजा अक्सर डर के माहौल में मनाई गई है. परिवारों, मंदिरों और मोहल्लों पर हमले का डर हर साल पूजा का एक अनचाहा हिस्सा बन गया था. लेकिन समुदाय के नेताओं का कहना है कि इस साल माहौल अलग था.

वे इसका श्रेय प्रधानमंत्री तारिक रहमान की अगुवाई वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार को देते हैं जिसने सत्ता में आने के बाद अपनी पहली दुर्गा पूजा के दौरान सुरक्षा को मुख्य प्राथमिकता बनाया.

16 अक्टूबर को उत्सव की शुरुआत के मौके पर रहमान ने सार्वजनिक रूप से सरकार का रुख साफ किया. उन्होंने कहा ''धर्म व्यक्तिगत है लेकिन राष्ट्र सबका है... हर किसी को सुरक्षा का अधिकार है."

इस संदेश के पीछे असाधारण रूप से व्यापक सुरक्षा अभियान था. सरकार ने लगभग 33,861 पूजाओं की सुरक्षा के लिए देश भर में 6,000 सुरक्षाकर्मियों, 550 पिकअप वैन और 450 मोटरसाइकिलों को तैनात किया. अकेले ढाका में, मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने महानगर सार्वजनिन पूजा उद्जापन समिति द्वारा आयोजित पंडालों सहित 257 पूजा स्थलों पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए 2,100 कर्मियों को नियुक्त किया. डर के बीच पूजा मनाने के आदी हो चुके समुदाय के लिए सुरक्षा के इन बड़े इंतजामों को नजरअंदाज करना आसान नहीं था.

ढाकेश्वरी राष्ट्रीय मंदिर परिसर में पूजा का आयोजन करने वाली महानगर सार्वजनिन पूजा उद्जापन समिति के महासचिव सुभाषिश कुमार बिस्वास कहते हैं, "पिछले कुछ सालों में बांग्लादेश में दुर्गा पूजा मनाने का एक हिस्सा हिंसा का डर बन गया है. हालांकि इस साल सरकार की ओर से किए गए इंतजाम शानदार थे."

20 अक्टूबर को पूजा पंडाल में रहमान का आना भी अपने आप में खास मायने रखता था. फरवरी में प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनके कार्यकाल की पहली दुर्गा पूजा थी और कई मायनों में यह अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर उनकी सरकार की प्रतिबद्धता की शुरुआती परीक्षा भी थी. प्रधानमंत्री ने देशभर में कई अन्य पूजा पंडालों का भी दौरा किया. राष्ट्रपति मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर भी महानगर पूजा में पहुंचे.

सुरक्षा से आगे की बात

यह बदलाव सिर्फ पुलिस व्यवस्था में ही नहीं, बल्कि खुद त्योहार को लेकर सरकार के रुख में भी नजर आया. कई वर्षों से हिंदू संगठन लगातार सरकारों से दुर्गा पूजा के दौरान छुट्टियों की अवधि बढ़ाने की मांग करते रहे थे ताकि श्रद्धालु कामकाज की पाबंदियों के बिना पूरी तरह उत्सव में हिस्सा ले सकें.

बिस्वास कहते हैं, "हम हमेशा से पूजा के दौरान लंबी छुट्टी की मांग करते रहे हैं. अंतरिम सरकार ने छुट्टी एक दिन बढ़ाई और नई सरकार ने एक दिन और जोड़ दिया. इस तरह तीन दिन की सरकारी छुट्टियां हो गईं. वीकेंड को मिलाकर हमें पांच दिन की छुट्टी मिली."

उनके अनुसार, गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने यह भी वादा किया है कि अगले साल से तीन दिन की सरकारी छुट्टी जारी रहेगी. सरकार के वरिष्ठ नेताओं को भी सीधे तैयारियों की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई.

रहमान के मंत्रिमंडल के मंत्री इकबाल हसन महमूद टुकू का कहना है कि प्रधानमंत्री ने मंत्रियों और सांसदों को उत्सव के दौरान अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था की निगरानी करने का जिम्मा सौंपा था साथ ही उन्होंने खुद भी कई पूजा स्थलों का दौरा किया.

टुकू कहते हैं, "मैं अपने जिले सिराजगंज का प्रभार संभाल रहा था." बांग्लादेश में हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले और देश भर में दुर्गा पूजा के आयोजनों की देखरेख करने वाले प्रमुख संगठन 'पूजा उद्जापन समिति' की सिराजगंज इकाई के सलाहकार सत्यनारायण सरदा बताते हैं कि टुकू की पत्नी और पूर्व सांसद रुमाना महमूद ने जिले के कई पंडालों का दौरा किया.

सरदा कहते हैं, "सरकार ने पूजा समितियों को दी जाने वाली आर्थिक मदद भी बढ़ा दी है. समाज के बुरे तत्व हमेशा शांतिपूर्ण पूजा आयोजनों में बाधा डालने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि वे इस बार कोई गड़बड़ी न कर सकें. इस तरह की सुरक्षा हमारी पूजा में पहले नहीं होती थी."

जब हालात खराब हुए

जश्न पूरी तरह से चिंताजनक घटनाओं से मुक्त नहीं थे. 18 अक्टूबर को पुलिस ने गाजीपुर के कोनाबाड़ी इलाके के अंबागान में स्थित श्री श्री राधा गोविंद केंद्रीय मंदिर में 28 साल के मोहम्मद यूसुफ अली को हिरासत में लिया जब उसने कथित तौर पर मंदिर के अंदर कुरान की एक प्रति में आग लगा दी.

घटना के बारे में सामने आई जानकारी के मुताबिक, वह अपने आठ से दस साल के बेटे के साथ परिसर में घुसा और मूर्तियों के सामने किताब को जला दिया. वहां तैनात मंदिर के सुरक्षाकर्मियों और पुलिस ने तुरंत आग बुझाई और पूछताछ के लिए उस व्यक्ति और उसके बेटे दोनों को हिरासत में ले लिया.

इस घटना ने याद दिलाया कि धर्म से जुड़ा कोई संवेदनशील मामला कितनी जल्दी बड़े संकट का रूप ले सकता है. साथ ही, इससे यह भी पता चला कि समय रहते कार्रवाई करने से हालात को बिगड़ने से रोका जा सकता है. सुरक्षाकर्मियों ने हालात को संभाल लिया और उन्हें सांप्रदायिक टकराव में बदलने से रोक दिया. इससे पूजा बिना किसी रुकावट के जारी रह सकी.

कई हिंदुओं के लिए यह फर्क बहुत मायने रखता है. बड़ी हिंसा का न होना जरूरी नहीं कि खतरे भी न हों. यह इस बात का संकेत भी हो सकता है कि बचाव के लिए किए गए इंतजाम काम आए.

कोमिल्ला में हिंसा का लंबा साया

राहत की यह भावना पुरानी घटनाओं की यादों से अलग नहीं है. अक्टूबर 2021 में हुई हिंसा का दर्द आज भी बांग्लादेश के हिंदू अल्पसंख्यकों के दुर्गा पूजा के अनुभव को तय करता है.

उस साल 13 अक्टूबर को कोमिल्ला के नानुआ दिघिर पार इलाके में दुर्गा पूजा के एक अस्थायी पंडाल में कुरान की एक प्रति मिली थी. सोशल मीडिया पर तेजी से अफवाहें फैलीं. भीड़ ने पंडाल पर हमला कर दिया और जल्द ही हिंसा चांदपुर, नोआखाली, चटगांव और रंगपुर समेत कई जिलों में फैल गई.

मंदिरों और मूर्तियों में तोड़फोड़ की गई. हिंदुओं के घरों और दुकानों में आग लगा दी गई. उस समय की खबरों के मुताबिक, कम से कम सात लोगों की मौत हुई थी. हालात पर काबू पाने के लिए अधिकारियों ने अतिरिक्त पुलिस, रैपिड एक्शन बटालियन और बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश को तैनात किया लेकिन इसके बाद लोगों में नया असंतोष पैदा हुआ. जुलाई 2022 तक पुलिस ने मुख्य मामले में चार्जशीट दाखिल नहीं की थी जिससे जवाबदेही और न्याय को लेकर चिंताएं बढ़ गईं.

अगले साल दुर्गा पूजा से पहले कोमिल्ला में सुरक्षा बढ़ा दी गई. पूजा पंडालों पर चौबीसों घंटे सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए और गश्त तेज कर दी गई. जिस त्योहार को भक्ति और खुशी का प्रतीक होना चाहिए था, वह अब चौकसी और डर के माहौल में मनाया जाने लगा था. इसलिए समुदाय की मांग सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि जवाबदेही तय करने की भी रही है.

न्याय का इंतजार

कोमिल्ला की घटना के बाद भी चिंता खत्म नहीं हुई. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने अगस्त 2024 में शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद हिंदुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों पर हुए हमलों की जानकारी दी. सितंबर 2025 में बांग्लादेश पुलिस ने दुर्गा पूजा से जुड़ी 49 घटनाओं की जानकारी दी, जिसके साथ ही 15 मामले दर्ज किए गए और 19 लोगों को गिरफ्तार हुईं.

समुदाय के कई लोगों के लिए यह मामला सिर्फ त्योहार के दिनों तक सीमित नहीं है. 2025 में अल्पसंख्यकों पर हमलों का सिलसिला चला जो दिसंबर में म्यमेनसिंह में ईशनिंदा के कथित आरोप में 27 साल के गारमेंट वर्कर दीपू चंद्र दास की लिंचिंग पर जाकर खत्म हुआ. खबरों के मुताबिक, उनके शव को एक पेड़ से लटकाकर आग लगा दी गई. कुछ दिनों बाद शरियतपुर में हिंदू कारोबारी खोकन चंद्र दास पर चाकू से हमला किया गया और उन्हें आग के हवाले कर दिया गया, जिससे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और न्याय की रफ्तार को लेकर चिंताएं और गहरी हो गईं.

ऐसी कई दूसरी घटनाएं भी हुई हैं और बिस्वास के मुताबिक, इनमें से कई मामलों में जवाबदेही तय होना अभी बाकी है. वे कहते हैं, "हम इंसाफ चाहते हैं. और हमें उम्मीद है कि एक दिन ऐसा समय आएगा जब हमें अपनी पूजा मनाने के लिए भारी सुरक्षा की जरूरत नहीं होगी."

उनकी यह बात इस साल की दुर्गा पूजा की उपलब्धि और उसकी सीमा, दोनों को दर्शाती है. सरकार इस बार बड़े पैमाने पर हिंसा के बिना त्योहार संपन्न कराने में कामयाब होती दिखी लेकिन बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए सिर्फ सुरक्षा ही मंजिल नहीं है. यह उस बड़े लक्ष्य तक पहुंचने की पहली शर्त है, जहां खुशी मनाने के लिए हथियारबंद सुरक्षा की जरूरत न हो और लोग बिना किसी डर के अपने धर्म का पालन कर सकें.

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