
कुछ बहसें किसी विचार से नहीं, एक शीर्षक से जन्म लेती हैं. ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अख़बार द गार्डियन में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने हाल ही में ऐसा ही किया. शीर्षक था: Most Indians do not read for pleasure, so why does the country have 100 literature festivals?
इस शीर्षक ने भारत को प्रश्न नहीं, निष्कर्ष की तरह प्रस्तुत किया. वाक्य निर्णायक था. लगभग अंतिम सत्य की तरह. जैसे एक जटिल, बहुभाषी, बहुस्तरीय समाज को एक ही निष्कर्ष में समेट लिया गया हो. रिपोर्ट प्रकाशित होते ही भारत में लेखकों, प्रकाशकों, शिक्षकों और पाठकों के बीच असहमति दर्ज होने लगी. प्रश्न यह नहीं था कि पढ़ने की आदतों में बदलाव आया है या नहीं. प्रश्न यह था कि क्या भारत को इस तरह एकरेखीय कथन में बांधा जा सकता है? क्या यहां की साहित्यिक संस्कृति, जो अनेक भाषाओं और सामाजिक स्तरों में फैली है, एक सर्वग्राही वाक्य में समेटी जा सकती है?
आलोचना इतनी व्यापक थी कि द गार्डियन को अपना शीर्षक बदलना पड़ा. मूल शीर्षक की कठोरता को संशोधित कर अपेक्षाकृत संतुलित भाषा अपनाई गई.

अंत में यह स्पष्ट उल्लेख भी जोड़ा गया कि शीर्षक को अद्यतन किया गया है. यह केवल संपादकीय प्रक्रिया का हिस्सा नहीं था वरन इस बात का संकेत भी था कि भारत में बौद्धिक प्रतिवाद जीवित है. यहां अपने सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व को लेकर सजगता है.
आंकड़ों से परे एक बहुभाषी वास्तविकता
यह स्वीकार करना आवश्यक है कि प्रश्न अपने आप में वैध था. डिजिटल माध्यमों के प्रसार, लघु वीडियो संस्कृति और बदलती ध्यान संरचनाओं ने पढ़ने की आदतों को प्रभावित किया है. यह केवल भारत की स्थिति नहीं है. अमेरिका और यूरोप में भी दीर्घ पाठ के प्रति धैर्य में कमी पर शोध उपलब्ध हैं. परंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब इस वैश्विक परिवर्तन को भारत की एकमात्र व्याख्या बना दिया जाता है.
भारत में पढ़ना केवल एक मध्यवर्गीय, अंग्रेज़ीभाषी गतिविधि नहीं है. यहां पढ़ना अनेक रूपों में घटित होता है- रेलवे प्लेटफॉर्म पर खरीदी गई सस्ती पुस्तिकाओं से लेकर छोटे कस्बों के पुस्तक मेलों तक. विश्वविद्यालय परिसरों से लेकर गांवों की पाठशालाओं तक. भारतीय भाषाओं में छपने वाली पुस्तकों की संख्या और उनकी बिक्री इस जटिलता का प्रमाण है.
प्रकाशन उद्योग का आकार आज लगभग बारह अरब डॉलर के आसपास पहुंच चुका है. यह न केवल घरेलू स्तर पर सशक्त उद्योग है, बल्कि वैश्विक प्रकाशन परिदृश्य में भी भारत को महत्वपूर्ण स्थान दिलाता है. यह केवल बाज़ार का आंकड़ा नहीं है. यह सांस्कृतिक ऊर्जा का संकेत है. हिंदी, बंगाली, तमिल, मलयालम, मराठी, असमिया, उर्दू, मैथिली, ओड़िया और अन्य भाषाओं में सक्रिय पाठक समुदाय मौजूद है.
द गार्डियन की रिपोर्ट में यह बहुलता पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं दी. प्रश्न था कि जब लोग पढ़ते नहीं, तो इतने साहित्य उत्सव क्यों? परंतु यह प्रश्न तभी सार्थक होता है, जब हम यह मान लें कि पढ़ना एक ही तरह से होता है और उत्सव का अर्थ केवल पुस्तक की बिक्री है.
साहित्योत्सवों का नया भूगोल
भारत में साहित्य उत्सवों की परंपरा पिछले दो दशकों में विशेष रूप से उभरी है. जयपुर ने इस ऊर्जा को सार्वजनिक रूप दिया. एक खुले मैदान में, बिना टिकट, हजारों लोगों के बीच लेखक और पाठक आमने-सामने आए. साहित्य पहली बार बड़े पैमाने पर एक दृश्य सांस्कृतिक घटना बना. इसके बाद यह मॉडल यात्रा पर निकल पड़ा. बेंगलुरु, केरल, भुवनेश्वर, कोलकाता, पटना, रांची, देहरादून, कुमाऊँ, जमशेदपुर, मुरादाबाद, इंदौर, भोपाल, रायपुर और फिर पूर्वोत्तर के शहर. गुवाहाटी, ईटानगर, शिलांग, कोहिमा, इंफाल जैसे स्थानों पर साहित्य उत्सव केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हैं, संवाद के मंच हैं.
पूर्वोत्तर भारत लंबे समय तक राष्ट्रीय विमर्श के हाशिये पर रहा. वहां आयोजित साहित्यिक मंच स्थानीय भाषाओं और अनुभवों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखते हैं. इतिहास, स्मृति, पहचान और संघर्ष पर खुली बातचीत होती है. युवा केवल श्रोता नहीं रहते, प्रश्नकर्ता बनते हैं. वे अपनी भाषाओं के लेखकों को सुनते हैं और साथ ही राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय लेखकों से संवाद करते हैं. यह प्रक्रिया दीर्घकालिक बौद्धिक आत्मविश्वास रचती है.
दक्षिण एशिया में भी साहित्य उत्सवों का विस्तार सीमाओं के पार संवाद की संभावनाएं खोलता है. नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका और पाकिस्तान में आयोजित मंच साझा इतिहास और विभाजित राजनीति के बीच सांस्कृतिक पुल का काम करते हैं. साहित्य वहां असहमति को भी गरिमा के साथ व्यक्त करने की जगह देता है. जब कोई लेखक एक देश से दूसरे देश में बोलता है, तो वह केवल पुस्तक की चर्चा नहीं करता, वह स्मृति और अनुभव का आदान-प्रदान करता है.
आलोचना, आत्मालोचना और पढ़ने का लोकतंत्र
आलोचक कहते हैं कि साहित्य उत्सव प्रदर्शन में बदल गए हैं. सेल्फ़ी और सेलिब्रिटी ने गंभीरता को विस्थापित कर दिया है. यह आरोप आंशिक रूप से सही हो सकता है परंतु यह पूर्ण चित्र नहीं है. अनेक सत्रों में इतिहास, राजनीति, पर्यावरण, भाषा और समाज पर गंभीर विमर्श होता है. क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सुने जाते हैं. दलित, आदिवासी और स्त्री लेखन को मंच मिलता है. अनुवाद की भूमिका पर बातचीत होती है.
भारत की सांस्कृतिक परंपरा को समझे बिना इस परिघटना को समझना कठिन है. यहां ज्ञान केवल पुस्तक में सीमित नहीं रहा. वाचिक परंपरा, कथा, प्रवचन और संवाद हमारी स्मृति का हिस्सा रहे हैं. पढ़ना और सुनना परस्पर विरोधी नहीं हैं. अनेक लोग पहले सुनते हैं, फिर पढ़ते हैं. इस बहस में स्क्रॉल पर प्रकाशित अपूर्वानंद का लेख भी उल्लेखनीय था. उन्होंने संकेत किया कि पढ़ने की संस्कृति के संकट को केवल रील और वीडियो संस्कृति से जोड़ देना बौद्धिक सरलीकरण है. उन्होंने पढ़ने को एक लोकतांत्रिक अभ्यास के रूप में देखा. ऐसा अभ्यास, जो नागरिकता की चेतना को गढ़ता है और व्यक्ति को सत्ता तथा बाज़ार दोनों से प्रश्न करने की क्षमता देता है. उनके अनुसार पढ़ना केवल निजी आनंद नहीं, सार्वजनिक विवेक का आधार है.
यह बात अपनी जगह सही है परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि डिजिटल माध्यमों ने ध्यान की संरचना बदली है. यह परिवर्तन बहुस्तरीय है और इसका प्रभाव वैश्विक है. इसलिए साहित्य उत्सवों को प्रतिस्पर्धी माध्यम की तरह नहीं, सेतु की तरह देखना चाहिए.
डिजिटल दुनिया से आए युवा जब किसी लेखक को प्रत्यक्ष सुनते हैं, तो साहित्य उनके लिए अमूर्त नहीं रहता. वह अनुभव बनता है. वही अनुभव आगे चलकर गहरे पाठ में बदल सकता है. द गार्डियन की रिपोर्ट ने एक असुविधाजनक प्रश्न उठाया पर उसी ने यह अवसर भी दिया कि हम स्वयं से पूछें कि पढ़ना क्या है? क्या वह केवल एकांत में पन्ने पलटना है या वह सुनने, बोलने और साझा करने की प्रक्रिया भी है?
शीर्षक का संशोधन इस बात का संकेत था कि एकतरफा कथन स्थायी नहीं होते. भारत की साहित्यिक दुनिया में असहमति है, आत्मालोचना है और आत्मविश्वास भी. यहाँ महानगरों के भव्य मंच हैं, तो छोटे कस्बों के पुस्तक मेले भी. यहाँ विश्वविद्यालयों की गोष्ठियाँ हैं, तो गाँवों की पाठशालाएँ भी.
हम संक्रमण के समय में हैं. माध्यम बदल रहे हैं पर शब्द अभी भी उपस्थित हैं. पढ़ना घट रहा है या बदल रहा है, यह प्रश्न बहस का मुद्दा रह सकता है, पर यह स्पष्ट है कि भारत अपनी पढ़ने, सुनने और बोलने की परंपरा को नए रूपों में जी रहा है. उसे किसी एक शीर्षक में बांधा नहीं जा सकता और शायद यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

