नेटफ्लिक्स पर आने वाली अपनी नई फिल्म इक्का बनाते समय सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने 1990 के दशक के दो सितारों- सनी देओल (गदर 2, बॉर्डर 2) और अक्षय खन्ना (धुरंधर) को चुना. दोनों उम्र बढ़ने के बावजूद हिंदी सिनेमा में अपना दबदबा बनाए हुए हैं.
मल्होत्रा मानते हैं कि उस दौर के कलाकारों की वापसी की एक ठोस वजह है. वे कहते हैं, "हीरो कहां हैं? ऐसे हीरो जो पूरे विश्वास और स्पष्टता के साथ अपने किरदार को निभाएं?" उनके मुताबिक, "सनी और अक्षय के पास वर्षों का अनुभव और स्टारडम है. ये ऐसे अभिनेता हैं जो आपको महसूस कराते हैं."
दर्शकों की उनके प्रति दीवानगी को समझाने के लिए मल्होत्रा दाल-चावल का उदाहरण देते हैं. उनका कहना है कि भारत में चाहे कितने भी नए व्यंजन आ जाएं लोग दाल-चावल से कभी नहीं ऊबते.
उनका मानना है कि फिल्म निर्माताओं के लिए इस जोड़ी की एक और बड़ी खासियत उनकी सहज उपलब्धता है. आज की पीढ़ी के कई कलाकारों के मैनेजर होते हैं जिनकी वजह से उन तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है. मल्होत्रा कहते हैं, "सिर्फ मुलाकात तय करना ही बहुत निराशाजनक हो जाता है." लेकिन देओल और खन्ना के साथ ऐसा नहीं था. उनसे आसानी से संपर्क हो गया और उन्होंने तुरंत जवाब भी दिया. मल्होत्रा कहते हैं, "वे आपको एक मीटिंग के लिए आठ महीने तक नहीं दौड़ाते. न ही कहते हैं कि 'मेरी कुछ शर्तें हैं, मेरा मैनेजर आपसे बात करेगा.' वे चीजों को बहुत सरल रखते हैं." इसके साथ ही उन्हें अपने काम की पूरी समझ है. "सीधे टेक होते हैं, रिहर्सल नहीं. शॉट मिल जाता है और समय बर्बाद नहीं होता."
इक्का में सनी देओल एक वकील की भूमिका निभा रहे हैं जबकि अक्षय खन्ना एक पूर्व वकील बने हैं. देओल का किरदार अदालत में खन्ना के किरदार का बचाव करता है जबकि उसका मन ऐसा करने का नहीं होता. देओल का यह किरदार दर्शकों को दामिनी (1993) की याद दिला रहा है जिसमें उनका मशहूर डायलॉग ‘तारीख पे तारीख’ था. मल्होत्रा कहते हैं कि दामिनी में देओल एक मकसद के लिए लड़ते हैं लेकिन इक्का में वे "ऐसे शख्स के लिए लड़ रहे हैं, जिसका बचाव वे करना ही नहीं चाहते. वह एक कुलीन, अमीर वकील है. यह एक पिता की यात्रा भी है. उसके भीतर दुविधा है और अतीत का बोझ भी."
मल्होत्रा का कहना है कि इस फिल्म में दर्शकों को सनी देओल का एक ऐसा रूप देखने को मिलेगा जो बहुत कम देखने को मिला है. वे कहते हैं, "वह टूटा हुआ इंसान है, भावनात्मक रूप से कमजोर है और पूरी तरह मुश्किलों से घिरा हुआ है."
मल्होत्रा जानते हैं कि हालिया सफलताओं के बाद दोनों कलाकारों का एक बड़ा प्रशंसक वर्ग है, जिसकी अपनी अपेक्षाएं हैं. वे वादा करते हैं कि इक्का एक ‘मसाला फिल्म’ होगी और दर्शकों को ‘पैसा वसूल’ अनुभव देगी. फिर सवाल उठता है कि फिल्म नेटफ्लिक्स पर ही क्यों? मल्होत्रा कहते हैं, "मैं पिछले नौ साल से यह फिल्म बनाना चाहता था. फिल्म बनाना, उसकी कास्टिंग करना और उसे मंजिल तक पहुंचाना लगभग नामुमकिन हो जाता है, चाहे आप बड़े हों या छोटे." उनका कहना है कि जब यह फिल्म नेटफ्लिक्स तक पहुंची तो सब कुछ आसान हो गया. "मैंने मार्च में उन्हें पहला कट दिखाया. उन्होंने उसे मंजूरी दे दी और कहा कि इसमें कोई बदलाव मत कीजिए."
दोनों कलाकारों के बीच कुछ समानताएं भी हैं. दोनों ने 29 साल पहले बॉर्डर (1997) में साथ काम किया था. दोनों ही स्वभाव से शर्मीले हैं और मीडिया की सुर्खियों से दूर रहते हैं. मल्होत्रा कहते हैं, "वे यह परखते हैं कि निर्देशक के तौर पर आपको अपना काम आता है या नहीं. वे माहौल देखते हैं, सेट को समझते हैं. पहले ही शॉट में उन्हें इसका अंदाजा हो जाता है. फिर वे तय करते हैं कि काम आसानी से हो जाएगा या उन्हें पूरी मेहनत करनी पड़ेगी."
मल्होत्रा के लिए अच्छी बात यह रही कि देओल और खन्ना दोनों ने पूरी तैयारी के साथ काम किया. वह अक्षय खन्ना के बारे में कहते हैं, "अक्षय अपने डायलॉग पूरी तैयारी के साथ लेकर आते हैं. वे आपके साथ बैठते हैं, आपकी सोच समझते हैं और किरदार के पूरे सफर को समझते हैं." वहीं सनी देओल के बारे में वे कहते हैं, "सनी सर संवादों को अपना बना लेते हैं. वह उन्हें शब्दशः नहीं बोलते. वे डायलॉग की भावना को भीतर उतारते हैं ताकि उसे सही ढंग से पेश कर सकें."

