उम्र महज 17 साल. इंटरव्यू देने की कला में बिल्कुल नई. एशियाई खेलों में दो स्वर्ण पदक जीतने वाली कुमकुम मोहोद धीरे-धीरे अपनी ओर लोगों की बढ़ती दिलचस्पी को समझने लगी हैं. उनके जवाब छोटे होते हैं और अक्सर मुस्कान के साथ खत्म होते हैं. कुमकुम कहती हैं, "हम किसी के साथ फोटो निकालते थे, अब लोग मेरे साथ फोटो ले रहे हैं तो बहुत अच्छा लग रहा है"
दो सप्ताह पहले तक, कुमकुम रिकर्व कैटेगरी में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली तीन महिला तीरंदाजों में सबसे कम उम्र की खिलाड़ी थीं. 3 अक्टूबर को वे अपनी सटीक निशानेबाजी से कोरियाई तीरंदाजी टीम को बिना घबराए करारी शिकस्त देने वाली 'अद्भुत खिलाड़ी' बनकर उभरीं.
इसकी पहली झलक एक दिन पहले ही देखने को मिली थी जब कुमकुम ने अंकिता भगत और कीर्ति शर्मा के साथ मिलकर कोरियाई खिलाड़ियों से बेहतर प्रदर्शन करते हुए महिला टीम का स्वर्ण पदक जीता था. एशियाई खेलों में रिकर्व कैटेगरी में भारत का यह पहला स्वर्ण पदक था.
दबाव से बेअसर रहते हुए कुमकुम ने हर मैच में आखिरी तीर चलाया. व्यक्तिगत स्पर्धा के फाइनल में भी उनका रवैया टीम इवेंट जैसा ही था. भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) की ओर से आयोजित बातचीत में वे कहती हैं, “लोग कोरियन-कोरियन करते हैं. मैंने खुद से कहा कि उसे 10 अंक का निशाना लगाना है तो मुझे भी वैसा ही करना है. बेस्ट देना है.” उन्होंने ऐसा ही किया. उनके दो गोल्ड और एक सिल्वर मेडल (मिक्स्ड टीम इवेंट में) उनकी सफलता का सबूत हैं.
उनका स्वभाव उन्हें उन साथी खिलाड़ियों से अलग बनाता है, जिन पर दबाव में बिखरने या अपने सामने मौजूद प्रतिद्वंद्वी के कद से घबरा जाने के आरोप लगे हैं. कुमकुम बेहद शांत रहती हैं और एक ऐसी टीनेज की तरह प्रदर्शन करती हैं जो मानती है कि कुछ चीजों से अनजान रहने का अपना ही आनंद है.
हालांकि उन्हें इस बात का एहसास है कि उन्होंने कितनी बड़ी उपलब्धि हासिल की है. उन्होंने कहा, "कोरिया को हराना इंपॉर्टेंट था, रिकॉर्ड मिटाना था. अब भारतीय तीरंदाजों में यह आत्मविश्वास बढ़ेगा कि हम ऐसा कर सकते हैं." फाइनल मुकाबलों में आखिरी तीर निशाने पर लगाते समय वे इतनी शांत कैसे दिख रही थीं, इस बारे में बताते हुए कुमकुम ने कहा कि उन्हें जीतने के लिए नौ अंक चाहिए थे लेकिन उन्होंने 10 अंक हासिल किए. उन्होंने कहा, "मैंने रिजल्ट के बारे में नहीं सोचा, पेशेंस से शॉट क्लियर किया."
ज्यादातर भारतीय तीरंदाजों की तरह उनकी कहानी भी आर्थिक तंगी के बीच भरोसा बनाए रखने की है. तीरंदाजी एक महंगा खेल है और कुमकुम के लिए “सफर बहुत मुश्किल रहा है”. उन्होंने अपनी दादी और पिता के सहयोग से यह मुकाम हासिल किया, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाने पर भी वे हार न मानें. वे कहती हैं, “घर पर वे मुझे चैंपियन कहते हैं. उन्हें मुझ पर पूरा भरोसा है कि मैं यह कर दिखाऊंगी.” वे उन समझौतों के बारे में हंसते हुए बताती हैं जो उन्हें करने पड़े, “पूरा बचपन इसी में चला गया, आगे जाके दिक्कत नहीं होगी.”
अपनी जीत के साथ कुमकुम ने भारत को लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 के लिए व्यक्तिगत रिकर्व में बहुप्रतीक्षित कोटा दिला दिया है लेकिन अभी उनकी जगह पक्की नहीं हुई है. उन्हें राष्ट्रीय ट्रायल के जरिए अपनी जगह हासिल करनी होगी. वे कहती हैं, “मुझे इसके लिए मेहनत और तैयारी करनी होगी. रोज जिम जाना है, ताकत बढ़ानी है, दिमाग को मजबूत बनाना है और तकनीकी पहलुओं पर काम करना है.”
कुमकुम मैनिफेस्टेशन में विश्वास करती हैं यानी जो वे होना चाहती हैं, उसकी कल्पना करना और उसे हकीकत में बदलना. वे सफलता को खुद पर हावी नहीं होने देंगी और न ही उसे अपने लक्ष्यों से भटकने देंगी.
जापान से लौटने पर उनके कोच प्रफुल्ल डोंगे ने उनसे सबसे पहले कहा, “तुमने जो हासिल किया है, उसे भूल जाओ. यह तुम्हारा सपना नहीं है. लॉस एंजिलिस ओलंपिक के बारे में सोचो, वही तुम्हारा लक्ष्य है.” कुमकुम कहती हैं, “अगर मैं कड़ी मेहनत करूं और अपना सर्वश्रेष्ठ दूं और खुद पर बेवजह का दबाव न डालूं तो मैं यह कर लूंगी.” उनके पिता को भी इस पर भरोसा है. वे कहते हैं, “हिस्ट्री तो तू ही बनाएगी, लॉस एंजिलिस में गोल्ड तू ही लाएगी.”

