27 साल की राइफल शूटर इलावेनिल वलारिवन अब भारतीय टीम की अनुभवी खिलाड़ियों में से एक हैं. वे दो ओलंपिक (टोक्यो 2020 और पेरिस 2024) में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं और जूनियर और सीनियर दोनों स्तरों पर कई वर्ल्ड कप, एशियन और वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडल जीत चुकी हैं.
अब तक यह धारणा बनी हुई थी वे बड़े मंचों यानी एशियन गेम्स और ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पातीं जबकि अधिकतर भारतीय इन बड़े मुकाबलों को देखने के लिए टीवी के सामने जुटते हैं. हाल ही में जापान में हुए एशियन गेम्स में लगा कि आखिरकार उन्होंने इस दबाव से खुद को मुक्त कर दिया है. करीबियों के बीच इला नाम से लोकप्रिय यह शूटर बताती है, "अब मैं इस बात को लेकर उत्साहित हूं कि आने वाली प्रतियोगिताओं के लिए खुद का और बेहतर वर्जन बनाऊंगी. इस सफलता से मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ा है."
वलारिवन ने सिर्फ 10 मीटर राइफल और 10 मीटर महिला टीम इवेंट में जीते अपने दो सिल्वर मेडल से ही पहचान नहीं बनाई बल्कि उनके कानों की सोने की बालियों ने भी सबका ध्यान खींचा. राइफल गन के आकार वाली उनकी स्टड ईयररिंग्स की क्लोज-अप तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई.
क्या यह उनके लिए लकी चार्म है? इस पर वे कहती हैं, "मुझे ऐसा ही लगता है. मैंने इसे अपने भाई की शादी से पहले खरीदा था. इसके बाद मैं एशियन चैंपियन बनी और वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीता और अब एशियन गेम्स की मेडलिस्ट हूं." इसी दौरान उन्होंने तमिलनाडु के कुड्डालोर में परिवार के ज्वेलर से खरीदी गई पारंपरिक बुगड़ी ईयररिंग भी पहननी शुरू कर दी.
तमिलनाडु के कड्डालूर में जन्मीं वलारिवन गुजरात का प्रतिनिधित्व करती हैं. उनके माता-पिता गुजरात चले गए थे और तीन साल की उम्र से वे वहीं रह रही हैं. वे कहती हैं, "मुझे गुजराती होने पर गर्व है. मैंने अपनी पूरी जिंदगी अहमदाबाद में बिताई है, यही मेरा घर है. मैं दिल से गुजराती हूं. नवरात्रि में मैं बाहर निकलती हूं और गरबा की धुनों पर पूरी रात डांस करती हूं. मुझे ढोकला और खमण बहुत पसंद है."
हालांकि 2017 से वलारिवन अपना ज्यादातर समय चेन्नई में बिता रही हैं. श्री रामचंद्र सेंटर फॉर स्पोर्ट्स साइंस उनका ट्रेनिंग बेस रहा है. यहां का इंडोर शूटिंग रेंज गगन नारंग की गन फॉर ग्लोरी शूटिंग एकेडमी के साथ मिलकर तैयार किया गया है. वलारिवन इसी एकेडमी से जुड़ी हैं. वे बताती हैं, "यहां बहुत अच्छा रेंज है. यहां इंडोर रनिंग ट्रैक, इंडोर स्विमिंग पूल, डॉक्टर और फिजियोथेरेपिस्ट हैं और पौष्टिक खाना देने वाली कैंटीन भी है."
भारत में शूटिंग की बेहद कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच एशियन गेम्स की टीम में जगह बनाना आसान नहीं है और वलारिवन करीब एक दशक से ट्रायल्स के जरिए अपनी जगह बनाए हुए हैं. वे कहती हैं, "मुझे पता है कि मैं टीम का हिस्सा बनना चाहती हूं और मैं हर दिन अपना 100 प्रतिशत देने के लिए पूरी तरह अनुशासित हूं.”
वे कहती हैं कि इसके साथ कई तरह के त्याग भी करने पड़ते हैं जिसमें महीनों तक परिवार से नहीं मिल पाना भी शामिल है. लेकिन कई बार खासकर निराशा भरे क्षणों से निपटते समय शक और मोटिवेशन की कमी उनके रास्ते में आई है, "ऐसे बहुत से मौके आए हैं जब मुझे लगा कि मैं यह नहीं कर सकती, कि मैं एक और दिन नहीं उठ सकती और बिना किसी उम्मीद के उसी रूटीन को फिर से नहीं दोहरा सकती."
इला इसका श्रेय अपनी टीम को देती हैं जिसने यह सुनिश्चित किया कि वे हार न मानें. वलारिवन कहती हैं, "अगर वे लगातार मेहनत नहीं करते तो शायद ऐसा नहीं हो पाता. मेरे मेंटर गगन नारंग, कोच नेहा चौहान, गन फॉर ग्लोरी की टीम, साइकोलॉजिस्ट कीर्तिका पांडे, न्यूट्रिशनिस्ट मधु और स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच ने मेरा साथ दिया. टीम का मुझ पर भरोसा होना मेरे लिए शब्दों से परे है."
लॉस एंजेलिस ओलंपिक में अब सिर्फ दो साल बाकी हैं और इला जानती हैं कि भारत की शूटिंग टीम से एक बार फिर मेडल जीतने की काफी उम्मीदें होंगी. एशियन गेम्स में शूटिंग ने सिर्फ तीन गोल्ड मेडल जीते, जिसके बाद काफी आलोचना हुई. वलारिवन इसे समझाते हुए कहती हैं, "लोग हमसे उम्मीद इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि हम अच्छा कर सकते हैं. हम अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन उस स्तर तक नहीं जिसकी हमसे उम्मीद की जाती है."
क्या आलोचना करने वाले लोगों की बातों का उन पर असर होता है? वलारिवन कहती हैं, "मैं उनके बारे में नहीं सोचती. जब वे मुझे बधाई देते हैं या आलोचना करते हैं तो इससे मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ता. मेडल मिलने या न मिलने से यह नहीं बदलता कि मैं हर दिन रेंज पर जाती हूं और अपना 100 प्रतिशत देती हूं."
एशियन गेम्स खत्म होने के साथ ही वलारिवन ने अपने लिए नए लक्ष्य तय कर लिए हैं. नवंबर में वर्ल्ड चैंपियनशिप है और इसके बाद भारत के लिए ओलंपिक कोटा हासिल करने और टीम में जगह बनाने की चुनौती शुरू होगी. अगर वे इसमें कामयाब होती हैं तो वलारिवन शूटिंग टीम की सीनियर खिलाड़ियों में से एक होंगी. वे हंसते हुए कहती हैं, "अब मैं गैंग की दीदी हूं और मुझे जिम्मेदार भी बनना है."

