
वर्मा रोजमर्रा के कामों में AI के विकास और इस्तेमाल के खिलाफ लगातार मुखर रहे हैं. 1 सितंबर को X पर एक लंबी पोस्ट में उन्होंने कहा कि यह टेक्नोलॉजी फिल्ममेकिंग को तेज कर सकती है. साथ ही, फिल्म प्रोडक्शन में आने वाली लॉजिस्टिक्स की कई मौजूदा चुनौतियां भी कम हो सकती हैं.
RGV ने इस पोस्ट में लिखा, "फिल्म का भविष्य उज्ज्वल है लेकिन इसकी कीमत फिल्म इंडस्ट्री को खत्म करके चुकानी होगी."
इसके आगे उन्होंने कहा, "दिसंबर 2026 तक हजारों एजेंट वाला एक प्रोडक्शन स्वॉर्म आसानी से उपलब्ध हो सकता है. एक पूरी तरह तैयार सिनेमैटिक सिस्टम में इससे भी ज्यादा एजेंट होंगे और यह धीरे-धीरे AGI स्तर की क्षमता हासिल करेगा." उनके मुताबिक, यह सिर्फ AI से स्क्रीनप्ले लिखवाने तक सीमित नहीं होगा.
ये AI एजेंट एक ही कहानी के आइडिया से कई अलग-अलग वर्जन तैयार कर सकते हैं. फिर वे इन कहानियों को "जरूरत, तनाव, किरदार की सच्चाई और उसके परिणाम" जैसे पहलुओं पर परख सकते हैं.

कमजोर विचारों को हटा दिया जाएगा, जबकि बेहतर विचारों को आपस में मिलाकर नया रूप दिया जा सकेगा. RGV के मुताबिक, इस तरह तैयार स्क्रीनप्ले सिर्फ लेखक के शुरुआती विचार पर आधारित नहीं होगा. वह कई दौर की जांच और सुधार के बाद तैयार किया गया बेहतर वर्जन होगा.
राम गोपाल वर्मा का मानना है कि इससे फिल्म बनाने का तरीका भी बदल सकता है. उन्होंने लिखा, "AI का बदलाव टेक्नोलॉजी के रूप में घोषित नहीं होगा. इसे महसूस किया जाएगा. लॉजिस्टिक्स से जुड़े समझौते कम होंगे. तारीख या लोकेशन की वजह से रद्द होने वाले सीन कम होंगे. ज्यादा वर्जन पूरे किए जा सकेंगे, जिन्हें बहाने बनाने के बजाय वास्तव में परखा जा सकेगा."
RGV का मानना है कि AI आने के बाद पोस्ट-प्रोडक्शन का तरीका भी काफी बदल जाएगा. उन्होंने लिखा, "पोस्ट-प्रोडक्शन में महीनों का समय नहीं लगेगा. एडिटिंग, कलर ग्रेडिंग, इफेक्ट्स और मिक्सिंग का काम साथ-साथ हो सकेगा. अभी इन कामों से जुड़े अलग-अलग डिपार्टमेंट को एक-दूसरे का काम पूरा होने का इंतजार करना पड़ता है."
RGV का मानना है कि AI आने के बाद फिल्म के बजट और उसके पैमाने का हिसाब भी बदल सकता है. अगर AI से शानदार सिनेमैटिक इमेज बनाना आसान और सस्ता हो जाता है, तो फिल्ममेकर्स को लोकेशन, सेट, शूटिंग शेड्यूल और दूसरी जरूरतों के चलते अपनी कल्पना से समझौता नहीं करना पड़ेगा.
RGV ने लिखा है , "इमेज की कमी खत्म हो जाएगी. अच्छी समझ और पसंद की कमी नहीं होगी." सीधे शब्दों में कहें तो उनका मानना है कि जब लगभग हर कोई शानदार सिनेमैटिक इमेज बना सकेगा, तब सिर्फ शानदार इमेज किसी फिल्म को अलग पहचान दिलाने के लिए काफी नहीं होंगी. जब टेक्नोलॉजी लगभग कुछ भी बना सकेगी, तब ज्यादा मुश्किल सवाल यह होगा कि वास्तव में क्या बनाया जाना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि फिल्में पूरी होने के बाद भी ज्यादा लचीली हो सकती हैं. अलग-अलग दर्शकों के लिए उनके अलग वर्जन पेश किए जा सकते हैं. निर्देशक कहानी में कोई बड़ा बदलाव किए बिना उसकी रफ्तार और जोर जैसे पहलुओं को बदल सकता है.
उन्होंने लिखा, "दर्शक किसी 'AI फिल्म' को देखने नहीं बैठेंगे. वे एक ऐसी दुनिया में जाएंगे, जिसे निर्देशक ने रचा है और जो फिल्म तैयार होने के बाद भी बदली जा सकती है."

