"भारत को नजरअंदाज करना बड़ी गलती... माफी मांगनी चाहिए" : मालदीव के पूर्व उपराष्ट्रपति

भारत-मालदीव विवाद पर मालदीव के पूर्व उपराष्ट्रपति अहमद अदीब से बातचीत

मालदीव के पूर्व उपराष्ट्रपति अहमद अदीब का इंटरव्यू
मालदीव के पूर्व उपराष्ट्रपति अहमद अदीब

अहमद अदीब मालदीव की एक राजनैतिक पार्टी ‘मालदीव थर्ड-वे डेमोक्रेट’ के अध्यक्ष हैं. वे 2012 से 2015 के बीच देश के पर्यटन, कला और संस्कृति मंत्री थे और राष्ट्रपति यामीन के समय 2015 में ही उन्हें उपराष्ट्रपति भी बनाया गया था. हाल के दिनों में भारत और मालदीव के संबंधों आए तनाव को अदीब अपने देश के लिए नुकसानदायक मानते हैं. 

इंडिया टुडे हिंदी (डिजिटल) के असिस्टेंट एडिटर धनंजय कुमार से बातचीत में  मालदीव के पूर्व उपराष्ट्रपति ने इस तनाव को कम करने के तरीकों, मालदीव की घरेलू राजनीति, उस पर चीन के असर जैसे कई मुद्दों पर बात की. इस बातचीत के अंश:  

मालदीव मौजूदा विवाद को कैसे देखता है? आपके देश की सरकार का इस मुद्दे पर क्या रुख है?

मालदीव सरकार में कुछ जूनियर मंत्रियों के अपमानजनक ट्वीट के चलते ये विवाद खड़ा हुआ. ये कभी नहीं होना चाहिए था. उन्हें सस्पेंड किया गया है, लेकिन सरकार को उन्हें ऑफिस से हटाना चाहिए. मालदीव की सरकार को लिखित में एक माफीनामा देना चाहिए और यह मुद्दा हल करने की कोशिश करनी चाहिए. भारत में कई लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं. मालदीव टूरिज्म के खिलाफ भी भारत में कैंपेन शुरू हो गया है. इससे हमारा नुकसान हो रहा है. अगर हमारे टूरिज्म का नुकसान हुआ तो सीधे अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा. 

क्या मालदीव पिछले कुछ सालों से चीन के प्रभाव में है? चीन मालदीव में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में भारी निवेश कर रहा है. इसके अलावा, BRI और FTA को ध्यान में रखते हुए, क्या चीन मालदीव के करीबी सहयोगी के रूप में भारत की जगह ले रहा है?

पिछले 5 सालों में भारत और मालदीव के रिश्ते काफी अच्छे थे. कोविड महामारी के दौरान पीएम मोदी ने मालदीव की काफी मदद की. उसी के चलते मालदीव श्रीलंका जैसी स्थिति में गए बगैर खुद को संभाल पाने में कामयाब रहा. नई सरकार को अभी आए दो ही महीने हुए हैं. अब तक लगभग सभी राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद पहले भारत के दौरे पर जाते थे, लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति (राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू) पहले तुर्की, फिर UAE और अब चीन गए हैं. तो देखना होगा कि मौजूदा सरकार चीन के साथ किस तरह के समझौते करती है. पिछले पांच सालों में भारत के प्रति सकारात्मक रहने वाली सरकार के सत्ता में रहने के चलते चीन से ज्यादा निवेश नहीं आया है. अब फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) और BRI पर इस सरकार का रुख क्या रहेगा, ये देखने वाली बात है. 

आप उपराष्ट्रपति के अलावा पर्यटन मंत्री भी रहे हैं, क्या आपको लगता है कि मालदीव भारत के दखल के बिना आर्थिक रूप से स्थिर हो सकता है, चाहे वह राजनयिक स्तर पर हो या पर्यटन के दृष्टिकोण से?

मालदीव में पिछले 50 सालों के टूरिज्म में भारत ने काफी योगदान दिया है. यहां का पहला बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) था.  इसने यहां के विकास कार्यों के लिए काफी लोन दिया. जब मैं टूरिज्म मंत्री था तो मालदीव में लग्जरी होटल्स को प्रोमोट किया. इससे बॉलीवुड समेत भारत की कई हस्तियां आईं. सामाजिक प्रभाव के कई कार्यक्रम भारत के साथ मिलकर किए. हम केवल टूरिज्म के लिए भारत से नहीं जुड़े हैं, बल्कि मेडिकल और शिक्षा जैसी कई चीजों में भी उन्होंने हमारी काफी मदद की है. हमें नहीं पता कि आने वाले कुछ सालों में आर्थिक स्तर पर कैसी चुनौतियां आएंगी, लेकिन भारत ने इतिहास में हमेशा हमारी मदद की है और बजट सपोर्ट भी दिया है. हम भारत के बिना विकास नहीं कर सकते, क्योंकि निर्माण की आधारभूत चीजें भी भारत से ही आती हैं.

भारत के साथ भविष्य के संबंधों के संदर्भ में, आपके देश में घरेलू राजनीति कैसे आकार ले रही है?

घरेलू राजनीति की बात करें तो मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP) 2023 के अंत में हुए चुनावों में थोड़े अंतर से हार गई. चुनावों में कई तरह का दुष्प्रचार था. भारत विरोधी कैंपेन भी आयोजित हो रहे थे. ये आंदोलन राष्ट्रपति यामीन के समय ही शुरू किए गए थे. लेकिन अब राष्ट्रपति यामीन और मौजूदा राष्ट्रपति मुइज्जू अलग हो चुके हैं. राष्ट्रपति यामीन ने नई पार्टी बना ली है. इसी तरह MDP भी टूट चुकी है. तो यहां सभी बड़ी पार्टियां टूट गई हैं और अगले 2 महीने में संसदीय चुनावों में जाने वाली हैं. इसी के बाद पता चलेगा कि शक्तियों का बंटवारा कैसे होता है, और क्या स्टैंड रहेगा. अभी लोकल पॉलिटिक्स अस्थिर है. ये देखना बाकी है कि संसद में किसकी संख्या ज्यादा रहती है, सरकार की या विपक्ष की. उसी के हिसाब से आगे की रणनीति तय होगी.

2013 में अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति बने और उनकी नीतियां काफी हद तक चीन के साथ मजबूत दोस्ती बनाने पर निर्भर थीं. आपने 2015 में उपराष्ट्रपति के रूप में भी काम किया है. आप उस कार्यकाल को भारत-मालदीव संबंधों में कैसे देखते हैं?

2013 में राष्ट्रपति यामीन ने गद्दी संभाली तो वे भी पहली राजकीय यात्रा पर भारत गए थे. मैं भी उनके साथ था. पीएम मोदी भी 2014 में उनके शपथ  ग्रहण में आए. इससे पहले तक हमारे भारत के साथ अच्छे संबंध थे, लेकिन फिर राष्ट्रपति यामीन ने शक्तियां हासिल करने के बाद विपक्ष के नेताओं को जेल भेजना शुरू कर दिया. मानवाधिकारों का हनन होने लगा. फिर जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत ने इसके खिलाफ स्टैंड लिया तो राष्ट्रपति यामीन भी भारत के खिलाफ स्टैंड लेने लगे. जब वे चुनाव हारे तो सारा ठीकरा भारत पर ही फोड़ दिया. जब एक लोकतंत्र तानाशाही रवैया अपनाता है तो बाकी लोकतांत्रिक देश उसे ठीक करने की कोशिश करते हैं, लेकिन राष्ट्रपति यामीन को ये पसंद नहीं आया और उन्होंने भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. चुनावों में इस तरह के दुष्प्रचार भी किए गए कि यहां भारत के हजार-दो हजार सैनिक हैं. लेकिन ये सब झूठ था. 

आपके देश में लोग 'इंडिया मिलिट्री आउट' अभियान चलाते हैं, इस तथ्य के बावजूद कि भारतीय सेना ने अतीत में कई मौकों पर मालदीव की मदद की है. आज भी, सैन्य प्रशिक्षण की 70% आवश्यकताएं भारतीय सेना द्वारा पूरी की जाती हैं, क्या आपको लगता है कि 'इंडिया मिलिट्री आउट' कैंपेन सही है? 

नहीं, ये सही नहीं है. अगर आप मालदीव के साथ रिश्ते देखेंगे तो ये एक प्रक्रिया है. मिलिट्री अलायंस और राजनयिक समझौतों पर लगभग सभी सरकारों ने सहमति जताई है. इंडियन आर्मी ने भी मालदीव नेशनल डिफेंस फोर्स (MNDF) की काफी मदद की है. मेडिकल हेलीकॉप्टर या ड्रोन यहां की सरकारों के मांगने पर ही मिले हैं. तो अचानक कुछ नहीं हुआ, ये एक प्रक्रिया के तहत होता आया है. ऐसे में हम अचानक इसे मिलिट्री कैंपेन कहना शुरू कर दें ये ठीक नहीं है. ये सिर्फ एक राजनैतिक चाल है. अगर कोई मुद्दा है तो मालदीव को भारत के साथ बैठकर सुलझाना चाहिए. 

चूंकि 'इंडिया फर्स्ट' नीति को वर्तमान राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने पहले ही तोड़ दी है और वर्तमान में वे चीन दौरे पर हैं. तो मालदीव में 'इंडिया आउट' या 'इंडिया फर्स्ट' किस पर आम सहमति है? राजनीतिक और आम लोगों दोनों नजरिए से.

ये राष्ट्रपति यामीन के द्वारा शुरू किया गया था. उस समय उनकी पार्टी ने इसे फॉलो किया. उस विरोध में आपको दिखेगा कि बहुत कम लोग हैं. कोई दूसरी पार्टी उसे समर्थन नहीं कर रही. राष्ट्रपति यामीन भी अब पद पर नहीं हैं. 'इंडिया आउट' कैंपेन खत्म हो चुका है, लेकिन उस पार्टी में ऐसे तत्व हैं जिनकी ऐसी विचारधारा है. राष्ट्रपति मुइज्जू उनके समर्थकों को साधने के लिए भारत विरोधी चीजें कर सकते हैं, लेकिन ये सब राजनीति है.

अगर आप पूरे मालदीव को देखेंगे तो ये आम धारणा नहीं है. हम लोग बॉलीवुड फिल्में देखकर बड़े हुए, हम हिंदी समझते हैं. हमें भारतीय खाना और संस्कृति पसंद है. हम एक-दूसरे के काफी करीब हैं.

बॉलीवुड के विरोध और बहिष्कार के आह्वान पर मालदीव कैसे जवाब देने की कोशिश कर रहा है? कोविड-19 के बाद अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या के रूप में भारत आपका शीर्ष स्रोत रहा है, क्या इसका मालदीव में पर्यटन उद्योग पर असर पड़ने की संभावना है?

जब तक मालदीव की सरकार भारत के साथ मिलकर काम करती है, तब तक इसका असर नहीं पड़ेगा. लेकिन राजनयिक संकट बढ़ रहा है, सोशल मीडिया पर भावनाएं भी बढ़ रही हैं. हमें नम्रता के साथ पेश आना चाहिए. इसमें और ज्यादा चीजें किए जाने की जरूरत है.

क्या ये सच है कि चीन के प्रभाव में मालदीव दक्षिण एशिया में भारत के प्रभुत्व को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है? आप भारत के भू-राजनीतिक प्रभाव को कैसे देखते हैं?

राष्ट्रपति यामीन ने भारत विरोधी और लोकतंत्र विरोधी चीजों का सहारा लिया, लेकिन ये काम नहीं आया. उदाहरण के लिए चीन को लें तो ये ऐसा देश नहीं है जो बजट सपोर्ट दे. ये इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट कर सकता है, लेकिन ये भी उनके ही लोग बनाते हैं. मुइज्जू के नेतृत्व में मौजूदा सरकार चीन से रिश्ते मजबूत करने की कोशिश कर सकती है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये फिर से काम करेगा. मालदीव और चीन काफी दूर हैं. चीन मालदीव की जरूरतें पूरी नहीं कर सकता, हमेशा भारत ने ही हमारी मदद की है. मौजूदा सरकार को भले ही काफी उम्मीदें हों, लेकिन अंत में बड़ी निराशा हाथ लगेगी. 

आप इस समय भारत से क्या उम्मीद करते हैं? और क्या मालदीव को भारत से किसी तरह का खतरा महसूस होता है?

मालदीव को भारत की सरकार के पास जाना चाहिए और भारत को हमें माफ कर देना चाहिए. मैं पीएम मोदी की लक्षद्वीप यात्रा को लेकर काफी सकारात्मक हूं. भारत भाग्यशाली है कि उसके पास लक्षद्वीप और अंडमान जैसे आइलैंड हैं. इन्हें भी टूरिस्ट प्लेस के रूप में प्रोमोट करना चाहिए. इससे पूरा क्षेत्र तरक्की करेगा. मालदीव को इसका स्वागत करना चाहिए.

क्या राष्ट्रपति मुइज्जू का प्रो चाइना रवैया ऐसे ही जारी रहेगा और भविष्य में भारत के साथ रिश्ते और खराब होने की संभावना है?

मैंने राष्ट्रपति मुइज्जू और उनके कई मंत्रियों के साथ काम किया है. डॉ. मुइज्जू काफी पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं. वे खुद सिविल इंजीनियर हैं. उन्हें भी एहसास होगा कि वे एक बदलाव से गुजर रहे हैं. भारत को नजरअंदाज करना बड़ी गलती होगी. मालदीव के ऊपर पहले से ही बहुत कर्जा है. अभी भारत से दूर जाने पर अगले 5 सालों में स्थिति और खराब हो जाएगी.

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