खास रपटः भारत का सबसे बड़ा बैंकिंग घोटाला
अट्ठाइस भारतीय बैंकों के कंसोर्शियम से एबीजी शिपयार्ड के ऋषि अग्रवाल ने किस तरह 22,842 करोड़ रुपए का कर्ज हड़प लिया, इसकी अंदरूनी दास्तान.

साल 2009 में मुंबई में भारत के जहाज निर्माण और समुद्री कारोबार पर वर्चस्व की दिलचस्प जंग छिड़ी थी. एक ओर देश की दूसरी सबसे बड़ी जहाज निर्माता भारती शिपयार्ड थी, जिसकी स्थापना दो दोस्तों प्रकाश सी. कपूर और विजय कुमार ने 1973 में की थी.
दूसरी ओर सबसे तेजी से बढ़ती एबीजी शिपयार्ड थी जिसके मालिक थे पर्ड्यू यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट और पहली बार उद्यमी बने ऋषि अग्रवाल. सारी लड़ाई ग्रेट ऑफशोर पर कब्जे की थी, जो अपतटीय ड्रिलिंग में इस्तेमाल होने वाली रिग्स सप्लाइ करती थी और ग्रेट ईस्टर्न शिपिंग कंपनी की शाखा थी.
ग्रेट ऑफशोर के लिए भारती शिपयार्ड की खुली पेशकश के जवाब में अग्रवाल ने बिन मांगे बोली लगा दी, जिससे कारोबारी जगत के कान खड़े हो गए. भारती ने ग्रेट ऑफशोर पर नियंत्रक हिस्सेदारी हासिल की, तो अग्रवाल ने 15 फीसद हिस्सेदारी खरीदी. ये आक्रामक बोलियां भारत के शिपिंग सेक्टर की सबसे तीखी कॉर्पोरेट लड़ाइयों में से एक मानी गईं.
एबीजी शिपयार्ड उस वक्त भारत की नंबर एक पोत निर्माण कंपनी थी, जिसे धड़ाधड़ ऑर्डर (2012 में 16,000 करोड़ रुपए) मिल रहे थे. यह अलग कहानी है कि दोनों ही जहाज निर्माता उसके बाद जल्द भारी घाटे की चपेट में आ गए. उन्होंने कर्ज के पुनर्गठन की कवायदें कीं, जिसमें ब्याज दरें कम करवाने के लिए कर्जदाता से मोलभाव किया जाता है.
अगले दशक का अंत आते-आते आखिरकार उनके हाथों से अपनी-अपनी कंपनियों का नियंत्रण फिसल गया. खुद ग्रेट ऑफशोर ने भी, जिसका नाम अब जीओएल ऑफशोर हो गया था, कर्ज के पुनर्गठन की नाकाम कवायद के बाद 2018 में काम बंद कर दिया.
ग्रेट ऑफशोर की जंग के एक दशक से ज्यादा वक्त बाद अग्रवाल, जो एस्सार ग्रुप के शशि और रवि रुइया भाइयों के भतीजे हैं, फिर खबरों में हैं, पर गलत वजहों से. सीबीआइ (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) ने एबीजी शिपयार्ड के पूर्व अध्यक्ष अग्रवाल और फर्म के अन्य डायरेक्टरों के खिलाफ 28 बैंकों के कंसोर्शियम से 22,842 करोड़ रुपए के कथित गबन के आरोप में मुकदमा दर्ज किया है.
कंसोर्शियम में देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) और दूसरा सबसे बड़ा निजी बैंक आइसीआइसीआइ भी है. अग्रवाल और एबीजी शिपयार्ड के चार अधिकारी—एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर संथानम मुथुस्वामी और डायरेक्टर अश्विनी कुमार, सुशील कुमार अग्रवाल और रवि विमल नेवतिया—और कुछ 'अज्ञात जनसेवक’ घोटाले में आरोपी हैं.
इसने बैंकिंग प्रणाली के उन छल-छिद्रों को फिर से उजागर किया है जो धोखेबाजों को करदाताओं की गाढ़ी कमाई उड़ाने देते हैं. बैंकिंग प्रणाली पहले ही 8.35 लाख करोड़ रुपए (मार्च 2021) की गैर-निष्पादित परिसंपत्तिबयों (एनपीए) के बोझ से कराह रही है, जिससे कर्ज दे पाना और दूभर हो गया है.
सितारे का पतन
एबीजी शिपयार्ड का पतन क्यों हुआ और अग्रवाल बदनामी के गर्त में क्यों डूबे? एबीजी 1985 में जन्मी जब अग्रवाल ने गुजरात का एक छोटा-सा जहाज निर्माण संयंत्र मगदाला शिपयार्ड खरीदा. महत्वाकांक्षी अग्रवाल ने जल्द अपना कारोबार बड़े स्तर पर बढ़ा लिया.
1990 से एक दशक के दौरान उनकी फर्म ने 165 से ज्यादा जहाज बनाए, जिनमें अधिकतर यूरोप और एशिया के ग्राहकों के लिए थे. 2000 में एबीजी शिपयार्ड को पहला सरकारी ऑर्डर मिला, जिसमें उन्हें कोस्ट गार्ड के लिए दो इंटरसेप्टर नावें बनानी थीं. 2011 में उसने भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए पनडुब्बियों सहित जहाज बनाने का लाइसेंस हासिल किया.
कंपनी के दो शिपयार्ड थे. मुख्य शिपयार्ड मगदाला सूरत में तापी नदी के किनारे 35 एकड़ से ज्यादा में फैला था. दूसरा भरूच के दहेज में था जिसकी स्थापना गुजरात मैरिटाइम बोर्ड के साथ मिलकर की गई थी. फर्म का मंसूबा गुजरात में 2,500 करोड़ रुपए में तीसरा शिपयार्ड बनाने का भी था. 2012-13 के आखिर तक स्थितियां ठीक थीं.
उस वर्ष कंपनी ने 2,149 करोड़ रुपए के कुल राजस्व पर 107 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया. कंपनी की तीन सहायक कंपनियां थीं—वेस्टर्न इंडिया शिपयार्ड (तब बीएसई सूचीबद्ध कंपनी), एबीजी शिपयार्ड सिंगापुर पीटीई और एबीजी एफपीएसओ प्राइवेट लिमिटेड. मगर अगले ही साल उसका पतन शुरू हो गया, जब इसने 199 करोड़ रुपए का घाटा दिखाया. मार्च 2016 आते-आते घाटा बढ़कर 3,704 करोड़ रुपए हो गया और राजस्व घटकर 37 करोड़ रुपए पर आ गया.
जहाज/नावों के ऑर्डर रद्द होना, बैंकों से कर्ज मिलने में कमी, उधारी की भारी लागत और दहेज शिपयार्ड की क्षमता का कम इस्तेमाल फर्म की परेशानियों की वजहें बताई गईं. 2007 में केंद्र सरकार की तरफ से जहाज निर्माण पर दी जा रही सब्सिडी बंद होने का भी इतने वर्षों के दौरान कंपनी के मुनाफे पर असर पड़ा.
आखिरकार एबीजी शिपयार्ड पर 28 बैंकों के 22,842 करोड़ रुपए बकाया हो गए. तीन शीर्ष कर्जदाता थे आइसीआइसीआइ बैंक (7,089 करोड़ रुपए), आइडीबीआइ बैंक (3,639 करोड़ रुपए) और एसबीआइ (2,925 करोड़ रुपए). ज्यादातर कर्ज 2005 और 2012 के बीच दिया गया था. कर्ज नहीं चुका पा रही एबीजी शिपयार्ड ने 2013-14 में कॉर्पोरेट कर्ज पुनर्गठन योजना की शरण ली.
घोटाले की खुलती परतें
मुंबई में एसबीआइ के डिप्टी जनरल मैनेजर बालाजी सिंह सामंता 25 अगस्त, 2020 को कफ परेड स्थित सीबीआइ के दफ्तर में दाखिल हुए. वे अपने बैंक की शिकायत लेकर आए थे, जिसमें कहा गया कि एबीजी शिपयार्ड ने आइसीआइसीआइ बैंक की अगुआई वाले 28 बैंकों के कंसोर्शियम को 22,842 करोड़ रुपए का इरादतन चूना लगाया है.
एसबीआइ ने 8 नवंबर, 2019 को भी ऐसी ही शिकायत दी, पर कोई कार्रवाई नहीं की गई थी, क्योंकि सीबीआइ ने कुछ महीने बाद कुछ स्पष्टीकरण मांगे. ताजा शिकायत भी ठंडे बस्ते में डाल दी गई.
इस साल 7 फरवरी को सीबीआइ ने एबीजी शिपयार्ड और अग्रवाल की अगुआई वाले उसके निदेशक मंडल के खिलाफ एफआइआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज की. इसमें कहा गया कि यह 'धोखाधड़ी बैंकों की निधियों की कीमत पर अवैध ढंग से फायदा उठाने के मकसद से रकमों के दुरुपयोग, गबन और अमानत में आपराधिक खयानत के जरिए’ की गई.
आरोपों से एबीजी शिपयार्ड का मामला भारत के अब तक के सबसे बड़े बैंकिंग घोटाले के तौर पर सामने आया. इसने 2018 के पंजाब नेशनल बैंक के उस घोटाले को भी पीछे छोड़ दिया जिसमें हीरा कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी पर 14,000 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का आरोप है.
एबीजी शिपयार्ड मामले में अपराध कथित धोखाधड़ी की शुरुआत के करीब एक दशक बाद और ऑडिटिंग फर्म अर्न्स्ट ऐंड यंग (ईवाइ) की ओर से 'अमानत में आपराधिक खयानत’ की ओर उंगली उठाए जाने के तीन साल बाद दर्ज किया गया.
सीबीआइ ने अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं की है. एजेंसी ने 17 फरवरी को अग्रवाल से पूछताछ की. एक दिन पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सार्वजनिक धन फर्जी कंपनियों में लगाने के संदेह में एबीजी शिपयार्ड के अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया.
2001 से एबीजी शिपयार्ड का खाता संभाल रही एसबीआइ के मुताबिक, कंपनी ने कर्ज की रकम गलत ढंग से खुद से जुड़े साझेदारों में लगाई और 2005 से 2012 के बीच अपनी विदेशी सहयोगी कंपनियों में भारी रकम निवेश की. सीबीआइ ने 14 फरवरी के बयान में कहा, ''27 मार्च 2014 को कॉर्पोरेट कर्ज पुनर्गठन (सीडीआर) के तहत कर्ज की धनराशि का पुनर्गठन किया गया. पर कंपनी का कामकाज जिलाया नहीं जा सका.’’
गड़बड़ियों का तांता
एबीजी शिपयार्ड वित्तीय परेशानियां शुरू होने के समय से ही कर्जदाताओं के राडार पर थी. एबीजी शिपयार्ड का स्टॉक ऑडिट करने के लिए एसबीआइ ने 10 सितंबर, 2014 को ऑडिटर एन.वी. डांड ऐंड एसोसिएट्स की नियुक्ति की.
अप्रैल 2016 को पेश अपनी रिपोर्ट में ऑडिटर ने एबीजी शिपयार्ड की कई गड़बड़ियां पकड़ीं. 20 जुलाई, 2016 को कंपनी का खाता 30 नवंबर, 2013 से एनपीए घोषित कर दिया गया. कर्जदाता बैंकों ने अप्रैल, 2012 और जुलाई, 2017 के बीच की अवधि का फॉरेंसिक ऑडिट करने के लिए अप्रैल 2018 में ईवाइ को नियुक्त किया.
ईवाइ ने फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट 18 जनवरी, 2019 को दी, जिसमें विस्तार से बताया कि एबीजी शिपयार्ड ने कर्ज की रकम का भुगतान संबंधित पक्षों को करके कैसे इसका दुरुपयोग किया. बैंकों से उधार ली गई रकम का प्रयोग कर्ज चुकाने और समूह की अन्य कंपनियों के बिलों का भुगतान करने तथा साख पत्रों के लिए किया गया. रकमों के गबन या दुरुपयोग के मोटे तौर पर चार उदाहरण थे.
पहला, जब 1,415 करोड़ रुपए विक्रेताओं और समूह की कंपनियों के खातों में भेजे गए और वापस कंपनी को 'राउंड ट्रिप’ किए गए. राउंड ट्रिप का मतलब लेन-देन की शृंखला से है जिसमें रकम विभिन्न जगहों में घूमकर अंतत:, अमूमन विदेशी निवेश के रूप में, मूल जगह लौट आती है. एबीजी शिपयार्ड ने 603 करोड़ रुपए वन ओशन शिपिंग प्रा. लिमि. को और 812 करोड़ रुपए अपनी पार्टनर कंपनी एबीजी इंजीनियरिंग ऐंड कंस्ट्रक्शन को ट्रांसफर किए.
दूसरा, एबीजी शिपयार्ड ने अपनी विदेशी शाखा एबीजी सिंगापुर की प्रतिभूतियों में 4.35 करोड़ डॉलर (326 करोड़ रुपए) निवेश किए. ईवाइ के फॉरेंसिक ऑडिट के मुताबिक, हो सकता है कि यह रकम सिस्टम से बाहर ले जाई गई हो. तीसरा, एबीजी शिपयार्ड ने 83 करोड़ रुपए संबंधित फर्म में ट्रांसफर किए.
मगर ये परिसंपत्तियां कंपनी के परिसंपत्ति0 समूह के हिस्से के रूप में नहीं दिखाई गई. एबीजी शिपयार्ड ने 2007-08 से पहले 83 करोड़ रुपए संस्थाओं को सुरक्षा जमा के तौर पर भुगतान किए. इनमें एक सॉमरसेट एस्टेट प्रा. लिमि. है, जिसे 14 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया. अग्रवाल मुंबई में सॉमरसेट की प्रॉपर्टी में रहते हैं.
ईवाइ की रिपोर्ट कहती है, ''एबीजी शिपयार्ड ने 2007-08 और 2008-09 में सुरक्षा जमा धनराशियों से संपत्तियां खरीदीं.’’ एबीजी शिपयार्ड ने 15 और 16 मार्च, 2016 को एबीजी एनर्जी को क्रमश: 15 करोड़ रुपए और 16 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए.
उन्हीं दिनों, कंपनी की कॉर्पोरेट गारंटर एबीजी इंटरनेशनल ने सुरक्षा जमा के रिफंड के तौर पर 31 करोड़ रुपए प्राप्त किए. रिपोर्ट के अनुसार, यह ''इशारा करता है कि 31 करोड़ रुपए की सुरक्षा जमा राशि असल में रिफंड न की गई हो और इसका संभवत: महज गोल-मोल लेन-देन किया गया हो.’’
अंत में, एसबीआइ का आरोप है कि एबीजी शिपयार्ड ने पुनर्गठन समझौते का उल्लंघन किया. पुनर्गठन के तहत कर्जदाताओं ने ट्रस्ट ऐंड रिटेंशन खाता (टीआरए) कायम किया. पुनर्गठन की अवधि के दौरान कंपनी में आने वाली रकम टीआरए में रखी जाती है ताकि कर्जदाता उसकी निगरानी कर सकें.
सीबीआइ का कहना है कि एबीजी शिपयार्ड को मिली 50 फीसद से ज्यादा धनराशियां इस व्यवस्था से बाहर थीं. उड़ाए गए पूरे 22,842 करोड़ रुपए के ब्योरे न तो ईवाइ रिपोर्ट में दिए गए और न ही एफआइआर में, पर विशेषज्ञों का कहना है कि आगे की जांच से सामने आ सकता है कि रकम कहां-कहां से गुजरी. निष्कर्ष में ईवाइ रिपोर्ट कहती है, ''आरोपी के गैरकानूनी कृत्य भारतीय दंड संहिता के तहत संज्ञेय अपराध हैं और आरोपी की ओर से उन्हें कर्ज की सुविधा मंजूर करने वाले बैंकों को नुक्सान पहुंचाने और बैंकों की कीमत पर अवैध फायदा उठाने के निश्चित इरादे से किए गए हैं.’’
सीडीआर योजना के जरिए कंपनी को जिलाने की कोशिशें नाकाम होने के बाद फर्म ने 2019 में ऋणशोधन अक्षमता और दिवाला संहिता (आइबीसी) के तहत समापन की अर्जी दाखिल की. समापन की प्रक्रिया अभी चल रही है. वैसे, कर्जदाता बैंकों को इस कार्यवाही से ज्यादा कुछ हासिल होने की उम्मीद नहीं है.
फर्म के पास कुछ जमीनें, बंगले, स्टाफ क्वार्टर, अधबने जहाज और संयंत्र तथा मशीनें हैं, पर इनसे कर्जदाताओं के मूल दावों का बहुत छोटा-सा हिस्सा मिलने की ही संभावना है. एबीजी शिपयार्ड की जमीन-जायदाद करीब 500 करोड़ रुपए की बताई जाती है.
ईवाइ की रिपोर्ट एसबीआइ के लिए अच्छी खबर रही. मगर आगे की राह आसान नहीं थी. एसबीआइ की फ्रॉड आडेंटिफिकेशन कमेटी को एबीजी शिपयार्ड के खाते को धोखाधड़ी घोषित करने में पांच महीने लगे, जो उसने 6 जून, 2019 को किया. बैंक ने अपनी शिकायत के साथ सीबीआइ का दरवाजा 8 नवंबर, 2019 को खटखटाया, पर सीबीआइ ने आरोपों की पुष्टि के लिए 12 मार्च, 2020 को कुछ स्पष्टीकरणों की मांग की.
एजेंसी ने कहा कि शिकायत दर्ज करने से पहले कोई आंतरिक जांच नहीं की गई. सीबीआइ के मुताबिक, शिकायत में धोखाधड़ी का समय, रकमों की हेराफेरी के निश्चित उदाहरण या बैंकों को चूना लगाने का तौर-तरीका नहीं बताया गया. यही नहीं, शिकायत दर्ज करने में कंसोर्शियम के अन्य बैंकों की सहमति नहीं ली गई. हकीकत यह है कि शिकायत दर्ज करने से पहले एसबीआइ ने दूसरे बैंकों की सहमति लेने के अलावा सभी शर्तें पूरी की थीं.
कंसोर्शियम ने 4 जून और 13 अगस्त, 2020 के बीच शेयरधारकों की बैठकों में शिकायत दर्ज करने की सहमति दी. मामले में कई बुनियादी नाकामियां नजर आती हैं, जिनमें सबसे अहम यह कि वक्त पर धोखाधड़ी का पता नहीं लगाया गया. बैंकिंग कंसल्टेंट अश्विन पारेख कहते हैं, ''बैंकों को आंतरिक तंत्र विकसित करने चाहिए जिनसे नजर रखी जा सके कि किसे रकम दी जा रही और कर्जदार उनका क्या कर रहा है.’’
बैंक के रिलेशनशिप मैनेजर को पता होना चाहिए कि रकमों के इस्तेमाल पर संदेह होने की स्थिति में बैंक को नए कर्ज देने से रोकने के लिए कब आगाह करना चाहिए. पारेख कहते हैं, ''कर्ज चुकाने से चूकने वाले सभी खाते तत्काल नियामक के ध्यान में लाए जाने चाहिए और वसूली की कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए.’’
एफआइआर दर्ज होते ही आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो गया. कांग्रेस महासचिव रणदीप सुरजेवाला ने 13 फरवरी को दावा किया कि उनकी पार्टी ने 2018 में ही केंद्र सरकार को आगाह कर दिया था कि एबीजी शिपयार्ड घोटाला है. उन्होंने सवाल किया कि सरकार ने कार्रवाई के लिए इतना लंबा इंतजार क्यों किया. उधर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दोहराया कि फर्म का खाता कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की हुकूमत के दौरान 2013 में ही एनपीए हो गया था.
एबीजी शिपयार्ड भारत के बैंकिंग सेक्टर को दहलाने वाला ताजातरीन घोटाला है. अग्रवाल और उनके सहयोगियों के खिलाफ मामला घिसटता रहेगा, पर अहम सवाल यह है कि सरकार रकमों के गबन को रोकने की खातिर वित्तीय व्यवस्था के छल-छिद्रों को भरने के लिए क्या कर रही है. मजबूत नियंत्रण और संतुलन के बगैर धोखाधड़ियां होती रहेंगी और करदाताओं का धन दांव पर लगता रहेगा.
बैंकों को तंत्र विकसित करने चाहिए जिनसे नजर रखी जा सके कि किसे रकम दी जा रही है और कर्जदार उनका क्या कर रहा है. कर्ज चुकाने से चूकने वालों को तत्काल नियामक के ध्यान में लाया जाना चाहिए’’
अश्विन पारेख, बैंकिंग कंसल्टेंट
