खास रपटः क्या कहते हैं मौके के तथ्य

रोहन शाह को नौ महीने में, वह भी खबर वायरल होने पर अर्जी की वस्तुस्थिति पता चली. लेकिन अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने महामारी जैसे कठिन वक्त का ख्याल नहीं किया.

नीतिगत बदलाव महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (बीचोबीच)
नीतिगत बदलाव महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (बीचोबीच)

जायजा: हकीकत या फसाना

महाराष्ट्र के सांगली जिले में मैन्युफैक्चरिंग की एक यूनिट लगाने के लिए मंजूरी की खतिर रोहन शाह करीब नौ महीने तक सरकारी दक्रतरों की खाक छानते रहे. अंत में इसी अगस्त में अपना दर्द बयान करने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया.

उन्होंने लिखा कि सबसे पहले वे जिला प्रशासन के दफ्तर गए, जहां उन्हें पुख्ता सबूत वाले कागजों के साथ सात दस्तावेज जमा करने को कहा गया. इनमें से तीन कागज जुटाने में उन्हें तीन महीने लग गए, जिसके लिए 20 दफा उन्होंने दफ्तरों की परिक्रमा की और 2,000 रु. बतौर फीस भी जमा की.

पर गंभीर समस्या उस वक्त शुरू हुई जब उन्होंने जमीन का उपयोग गैर-कृषि कार्य के लिए उपयोग किए जाने को अर्जी दी यानी उसका लैंड यूज बदलवाना चाहा. अर्जी जमा करने के महीने भर बाद उनसे राजस्व विभाग के दफ्तर में हाजिर होने को कहा गया, जहां उन्हें बताया गया कि उन्हें 11 अलग-अलग महकमों से एनओसी यानी अनापत्ति प्रमाणपत्र हासिल करने होंगे.

इनमें से स्थानीय तहसीलदार के दफ्तर से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना तो असंभव ही हो गया. वजह साफ थी: उसने उनकी अर्जी का कोई जवाब ही नहीं दिया. स्थानीय न्याय पंचायत दफ्तर से भी एनओसी नहीं मिल पाई क्योंकि उनके शब्दों में, वहां उनसे बदले में जो रिश्वत मांगी गई थी, वह उन्होंने देने से इन्कार कर दिया.

महाराष्ट्र के राजस्व महकमे के एक अफसर की सफाई है कि शाह ने जमीनी सचाइयों का ख्याल नहीं किया. उनकी अर्जी लैंड-यूज से संबंधित थी, जिसमें कृषि भूमि को मैन्युफैक्चरिंग के मकसद से इस्तेमाल किए जाने की बात थी. और बकौल अफसर, उनके अर्जी दाखिल करने से ठीक पहले नई सरकार वजूद में आई थी—ऐसे मौकों पर नई सरकार की नीतियां स्पष्ट होने तक प्रशासन एहतियातन थोड़ा ठहर जाता है.

उस अफसर का कहना है, ''उसके बाद मार्च के शुरू से सितंबर तक पूरा लॉकडाउन ही रहा. काम के लिए सिर्फ 10 फीसद सरकारी कर्मचारियों को ड्यूटी पर आने के लिए कहा गया था. इस तरह के कठिन वक्त में प्रशासन का कछुए की चाल से चलना कोई असामान्य घटना नहीं है.’’
—और श्वेता पुंज

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