उबरते गांव राह दिखाता भारत
ट्रैक्टर की बिक्री में वृद्धि, बेरोजगारी के सुधरते आंकड़े और एफएमसीजी की बढ़ती बिक्री जैसे कुछ आर्थिक संकेतक इशारा करते हैं कि ग्रामीण भारत के अर्थशास्त्र का कांटा थोड़ा ऊपर चढ़ा है. तो क्या अर्थव्यवस्था उबरने की राह पर है?

भारत में विनाशकारी कोविड-19 महामारी के दस्तक देने के छह महीने बाद ग्रामीण इलाकों में सुधार की उम्मीद नजर आ रही है. कई आर्थिक संकेतक बताते हैं कि उबरने की प्रक्रिया चल रही है. जैसे उर्वरक की बिक्री पिछले साल मई की तुलना में इस वर्ष 90 प्रतिशत अधिक रही और इसकी बिक्री अप्रैल से लगभग दोगुनी होकर करीब 40 लाख टन हो गई. बुवाई में लगभग 39 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और ट्रैक्टर तथा दोपहिया वाहनों की बिक्री पिछले साल के स्तर पर आ रही है. दैनिक ट्रैक्टर पंजीकरण वित्त वर्ष 20 के दैनिक औसत के 90 प्रतिशत के आसपास है. जून 2020 में 92,888 ट्रैक्टर बिके जो जून 2019 के 75,859 से अधिक है. दोपहिया वाहनों की बिक्री में भी सुधार दिखता है. इस साल जून में बजाज ऑटो ने 1,46,695 मोटरसाइकिलें बेचीं जो पिछले साल जून में बेची गई 1,99,340 इकाई का 73.5 प्रतिशत है.
फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष आशीष काले का कहना है कि बाजार में वास्तविक सुधार है और यह ग्रामीण भारत में कई सकारात्मक कारकों के साथ आया है. वे कहते हैं, ''बारिश अच्छी हुई है, बुवाई बेहतरीन है और खेतों में काम करने के लिए प्रवासी श्रमिक लौट आए हैं.'' हालांकि, इस बिक्री में से कुछ पहले से रोककर रखी गई मांग के कारण हो सकती है, फिर भी उपलब्ध नकदी और मौजूदा जरूरत ने उस मांग को बल दिया है. मगर इस साल सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स ने बिक्री में 26-45 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान लगाया है. काले के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में वाहन डीलर तो मांग के अनुसार आपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि दोपहिया वाहनों के कुछ मॉडल्स की आपूर्ति कम हो रही है. सकारात्मक बात यह है कि वित्तपोषण की कमी के बावजूद इस श्रेणी में बिक्री बढ़ी है—कोरोना वायरस के प्रसार के साथ, अधिक से अधिक लोग अपने स्वयं के परिवहन के साधनों में निवेश कर रहे हैं.
हालांकि, विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि कृषि क्षेत्र में नजर आ रही समृद्धि को आवश्यक रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार की तरह नहीं देखा जा सकता. डन ऐंड ब्रैडस्ट्रीट इंडिया के मुख्य अर्थशास्त्री अरुण सिंह का कहना है, ''गैर-कृषि गतिविधियों का ग्रामीण आय में दो-तिहाई योगदान रहता है.'' उदाहरण के लिए, भारत के निर्माण क्षेत्र और समग्र मैन्युफैक्चरिंग में ग्रामीण क्षेत्र का योगदान लगभग 50 प्रतिशत है. अरुण सिंह चेताते हैं, ''जब तक मैन्युफैक्चरिंग और निर्माण क्षेत्रों को पुनर्जीवित नहीं किया जाता, तब तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो पाएगी.''
मजबूत बिक्री
इस बीच डाबर, पार्ले एग्रो, मैरिको, गोदरेज और आइटीसी जैसे एफएमसीजी (तेज खपत वाले उपभोक्ता सामान) क्षेत्र के प्रमुख खिलाडिय़ों ने ग्रामीण और अर्ध-शहरी बाजारों में मजबूत बिक्री की सूचना दी है. डाबर इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मोहित मल्होत्रा का कहना है, ''जहां तक डाबर की बात है, शहरी बाजार की तुलना में ग्रामीण बाजार तेजी से बढ़ रहा है. पिछले साल यही स्थिति देखी गई थी जो अब भी कायम है. हम गांवों में पहुंच बढ़ाने की योजना बना रहे हैं. मार्च 2020 में 52,000 गांवों की पहुंच को बढ़ाते हुए 2020-21 तक 60,000 गांवों मे पहुंचने की योजना है.'' कंपनी मांग बढ़ाने के लिए हर श्रेणी में किफायती पैक पेश करके अपने उत्पादों के विस्तार पर भी काम कर रही है. नीलसन की ओर से किए गए विश्लेषण में खपत के स्तर में वृद्धि को भी दिखाया गया है—सर्वेक्षण में शामिल 60 प्रतिशत परिवारों का कहना था कि कोविड-19 की वजह से आय में गिरावट आई थी, लेकिन 39 प्रतिशत परिवारों ने यह भी कहा कि उनके मासिक घरेलू खर्चों में वृद्धि हुई है.
लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में रोजगार की जो दर थी उसमें सुधार से बाजार में श्रमिकों की वापसी का संकेत मिलता है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार, 12 अप्रैल को ग्रामीण बेरोजगारी 24.37 प्रतिशत थी जो 28 जून को घटकर 7.62 प्रतिशत हो गई. शहरी बेरोजगारी भी 12 अप्रैल के 23.17 प्रतिशत से घटकर 28 जून को 10.69 प्रतिशत हो गई. कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट के प्रबंध निदेशक नीलेश शाह कहते हैं, ''ग्रामीण भारत, शहरी भारत से बेहतर कर रहा है. अगर 2020-21 में कृषि में विकास का आंकड़ा सकारात्मक रहता है तो मुझे कोई हैरानी नहीं होगी.''
ये सारे संकेतक बताते हैं कि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जो राष्ट्रीय आय में 46 प्रतिशत योगदान देती है, देश के उद्धारकर्ता के रूप में उभर सकती है. भारत का 67 प्रतिशत से अधिक उपभोक्ता आधार ग्रामीण भारत से आता है पर इस क्षेत्र की बिक्री का आंकड़ा, कुल बिक्री का केवल 36 प्रतिशत है. विश्लेषकों का अनुमान है कि कस्बों और गांवों के अपने घरों में प्रवासी श्रमिकों की वापसी और ग्रामीण क्षेत्रों में आय तथा रोजगार के अवसरों को लक्षित नीतिगत हस्तक्षेपों के कारण, इन क्षेत्रों में एफएमसीजी उत्पादों की मांग बढ़ेगी. इसे देखते हुए व्यवसाय ग्रामीण इलाकों में अपनी पहुंच का विस्तार कर रहे हैं. पारले एग्रो की संयुक्त प्रबंध निदेशक और मुख्य विपणन अधिकारी नादिया चौहान कहती हैं, ''शुरुआत में, अचानक लॉकडाउन से हम पर असर तो पड़ा था पर अब बिक्री पिछले साल के उसी महीने के आधार के 100 प्रतिशत तक वापस पहुंच गई है. बिक्री में ग्रामीण क्षेत्रों का हिस्सा 2019 के 41 प्रतिशत से बढ़कर 2020 में 46 प्रतिशत हो गया है.''
ग्रामीण चमक
इस वर्ष कृषि और संबंद्ध गतिविधियां भारतीय अर्थव्यवस्था का एकमात्र ऐसा क्षेत्र होंगी जहां कुछ चमक दिख सकती है क्योंकि महामारी ने उद्योग और सेवाओं पर ब्रेक लगा दिया है. कृषि में कई उप-क्षेत्र शामिल हैं, जिसमें खाद्यान्न का उत्पादन, मांस, दूध और अंडे जैसे पशुधन उत्पाद, और मत्स्य पालन तथा जलीय कृषि शामिल हैं. पशुधन उत्पाद भी कृषि जीवीए (ग्रॉस वैल्यू एडेड या सकल मूल्यवर्धन) वृद्धि में अहम भूमिका निभाते हैं पर खाद्यान्न उत्पादन ही सबसे बड़ा घटक है. इस वर्ष खाद्यान्न और दुग्ध उत्पादन अच्छा होने की उम्मीद है, पर मांस, अंडे, मछली पकड़ने और जलीय कृषि में कमी रहने की संभावना है. देश की आधी से अधिक आबादी कृषि क्षेत्र पर निर्भर है फिर भी 2018 तक, भारत की जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी घटकर 14 प्रतिशत रह गई थी.
जो आशावादी स्थिति बन रही है, वह रबी की बंपर फसल, सरकार की ओर से बड़े पैमाने पर खरीद अभियान और ग्रामीण आबादी के हाथों में अधिक पैसे उपलब्ध कराने को लक्षित ठोस नीतिगत हस्तक्षेपों के कारण है. इन हस्तक्षेपों में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) जिसके तहत किसानों को प्रति वर्ष 6,000 रुपए मिलते हैं और मनरेगा पर अधिक ध्यान दिया जाना शामिल है.
उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अनुसार, इस साल 16 जून तक सरकार ने 3.82 करोड़ टन गेहूं की खरीद की जो अब तक का सर्वाधिक है. कुल मिलाकर, लगभग 42 लाख किसानों को इससे लाभ हुआ और उन्हें गेहूं खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में कुल 73,500 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया. क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के. जोशी इस क्षेत्र में 2.5 प्रतिशत की वृद्धि की भविष्यवाणी करते हैं. वे कहते हैं, ''हम कृषि में सकारात्मक वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं. यह पिछली मंदी की स्थिति के विपरीत है, जहां कृषि को सबसे ज्यादा परेशानी हुई थी.''
राजस्थान के शेरपुर गांव, जिसका यह नाम रणथंभौर नेशनल पार्क के बाघों के कारण पड़ा है, के लगभग हर घर में कम से कम एक मनरेगा कार्डधारक है. इन परिवारों के सदस्यों को सुबह 7 बजे से दोपहर 1.30 बजे तक खुदाई या दीवार निर्माण में लगाया जाता है और वे प्रतिमाह लगभग 4,500 रुपए कमाते हैं. भारत भर में 13 करोड़ श्रमिकों को नौकरी की गारंटी की इस योजना में नामांकित किया गया है, जो न केवल अकुशल श्रमिकों बल्कि कई ऐसे शिक्षित और अत्यधिक कुशल श्रमिकों के लिए भी एक अंतिम उपाय के रूप में उभरा है, जिन्होंने महामारी के कारण अपनी नौकरी गंवा दी. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के 20 लाख करोड़ रुपए के आत्मनिर्भर भारत अभियान पैकेज और अन्य प्रयासों के साथ-साथ मनरेगा के बजट आवंटन में केंद्र सरकार की तरफ से की गई वृद्धि बहुत प्रभावशाली नीतिगत हस्तक्षेपों में से एक है.
40,000 करोड़ रुपए की वृद्धि के साथ मनरेगा के लिए कुल आवंटन एक लाख करोड़ रुपए से अधिक हो गया है. क्रेडिट सुइस के नीलकंठ मिश्र ने एक रिसर्च नोट में लिखा कि वायरस के मामलों में धीमी रफ्तार ने गैर-कृषि कार्यों की तीव्र वापसी की. मनरेगा व्यक्ति दिवसों में साल-दर-साल 39 प्रतिशत की वृद्धि अच्छी राजकोषीय सहायता दिखाता है, लेकिन तथ्य यह है कि श्रमिक रोजाना 200 रुपए पर काम करने को तैयार हैं जो अन्य कार्यों की कमी का संकेत देता है.
अर्थशास्त्रियों और ग्रामीण विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि आत्मनिर्भर भारत अभियान पैकेज में कृषि सुधार के जो उपाय किए गए हैं वे भी अभूतपूर्व रहे. उदाहरण के लिए, वे कहते हैं कि प्रस्तावित नया कानून, जो किसानों को एपीएमसी (कृषि उपज विपणन समिति) पर आश्रित रहने की बजाए उपज को मर्जी से बेचने की अनुमति देता है, की लंबे समय से जरूरत महसूस की जा रही थी. वर्षों से इन एपीएमसी ने किसानों की मदद करने की बजाए, व्यापारियों और कमिशन एजेंटों को मनमाने तरीके से कीमतें तय करने का अवसर देते हुए किसानों को बाजार शक्तियों के आगे कमजोर बना दिया था.
ग्रामीण भारत में अन्य बड़े बदलाव भी हो रहे हैं—पिछले तीन-चार वर्षों में भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बन गया है. वहीं, 2019 में पहली बार भारत का बागबानी उत्पादन, अनाज उत्पादन से ज्यादा रहा. 29 करोड़ टन खाद्यान्न के मुकाबले बागबानी उत्पादन 31 करोड़ टन रहा. कृषि आय पर इसका सकारात्मक असर पड़ेगा क्योंकि बागबानी उत्पादों की कीमतें अनाज की तुलना में ज्यादा होती हैं. सरकार की ओर से 1 लाख करोड़ रुपए के कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड की स्थापना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सकारात्मक असर वाला कारक है.
सफर लंबा है...
कृषि के विकास की संभावनाओं पर बादल भी मंडराने लगते हैं. इस वर्ष के शुरू में टिड्डी दल ने राजस्थान में फसलों को बुरी तरह प्रभावित किया है. ये खरीफ के लिए खतरा बने हुए हैं. अन्य पर्यावरणीय कारकों ने भी असर डाला है. उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्य मई में अम्फन चक्रवात से बुरी तरह प्रभावित हुए थे, और असम के लाखों नागरिक हाल की बाढ़ से प्रभावित हुए हैं.
कई लोगों को ग्रामीण मोर्चे पर दिखता आशावाद कोविड के बाद के चरण में भारत के आर्थिक पुनरुत्थान की दिशा में दमदार संकेत नहीं लग सकता है. पर व्यापक पुनरुत्थान के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना होगा और बहुत कुछ करने की जरूरत होगी, फिर भी यह वर्तमान आशावाद एक आधार तो देता ही है जिस पर महामारी के कारण पैदा हुई निराशा के बीच केंद्र और राज्यों को नए सिरे से एक आर्थिक कथा लिखने का हौसला मिलेगा.