उत्तराखंड: कलह या कमल खिलाने की तैयारी?
उत्तराखंड में कांग्रेस की कलह भड़की तो बीजेपी ने उसमें घी डालकर हरीश रावत सरकार को स्वाहा करने की पटकथा लिख दी, लेकिन बीजेपी सरकार बनाने की बजाए राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रही

भारतीय मानचित्र पर वर्ष 2000 में उभरे तीन राज्यों में सबसे ज्यादा राजनैतिक अस्थिरता किसी ने झेली तो वह है—झारखंड और उत्तराखंड. लेकिन दोनों राज्यों की सियासत में फर्क सिर्फ इतना है कि झारखंड में राजनैतिक दलों ने अवसरवादिता का खेल किया, तो उत्तराखंड में सत्तारूढ़ दल की उठापटक ने 16 साल में राज्य को आठ मुख्यमंत्री दिखा दिए. लेकिन इस बार होली से पहले शुरू हुई कांग्रेसी हुल्लड़ में बीजेपी भी रंग खेलने को बेताब हो गई है. जिससे देहरादून से दिल्ली तक सियासी तूफान खड़ा हो गया है और सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह उबाल अचानक आया है या फिर इसकी पटकथा पहले से तैयार हो रही थी?
मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ बगावत की शुरुआत अचानक नहीं हुई. फरवरी, 2014 में जब विजय बहुगुणा को राज्य के मुख्यमंत्री पद से हटाकर कांग्रेस आलाकमान ने हरीश रावत को कमान सौंपी तब भी बहुगुणा और अब बीजेपी में शामिल हो चुके सतपाल महाराज के समर्थकों ने रावत के लिए काफी मुश्किलें खड़ी की थीं. लेकिन बाद में उपचुनावों में जीत और कांग्रेस को खुद बहुमत तक लाकर रावत ने आलाकमान के सामने अपनी स्थिति मजबूत कर ली. लेकिन यह बात उनके विरोधी हजम नहीं कर पाए. विरोधियों को सबक सिखाने के लिए रावत ने सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत, जो रामनगर से कांग्रेस की विधायक और राज्य में पर्यटन मंत्री थीं, को बर्खास्त कर दिया. इस कार्रवाई को पार्टी आलाकमान से भी हरी झंडी मिल गई. तब से सतपाल समर्थकों के हौसले पस्त हो गए. उन्होंने मुख्यमंत्री के साथ रहने में ही भलाई समझी.
विरोधियों में मुखर बहुगुणा की नाराजगी 2014 में बढ़ गई जब उन्हें राज्यसभा का टिकट नहीं मिला. राज्यसभा उपचुनाव में भी राज बब्बर को तरजीह दी गई. बहुगुणा ने मुख्यमंत्री पद छोडऩे पर अपने समर्थकों में नरेंद्रनगर के विधायक सुबोध उनियाल और जसपुर के विधायक शैलेंद्र सिंघल को मंत्री पद पर नियुक्त करने का अश्वासन लिया था, जो पहले तो मंत्री पद खाली न होने के कारण टाला गया. बाद में सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत को बर्खास्त करने के बाद खाली हुए मंत्री पद के बाद भी उन्हें शामिल नहीं किया गया. यही नहीं, जब सरकार के अल्पमत में होने के चलते बीएसपी कोटे से मंत्री बनाए गए सुरेंद्र राकेश की मौत होने पर दूसरा मंत्री पद खाली हुआ तो भी बहुगुणा समर्थकों को यह पद नहीं दिया गया. इसे लेकर बहुगुणा लगातार राज्य के प्रभारी महासचिव समेत मुख्यमंत्री को बार-बार याद दिलाते रहे, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. इन सब बातों ने बहुगुणा और उनके समर्थक विधायकों कि नाराजगी बढ़ाई. वे मौके की तलाश में ही थे कि इस बीच हरक सिंह रावत सहसपुर विधानसभा सीट से चुनाव लडऩे को लेकर लॉबीइंग करने लगे तो आलाकमान ने यह बात तय कर दी कि मंत्रियों की सीट नहीं बदली जाएगी. उनको अपनी पुरानी सीट से ही लडऩा होगा. जिसके बाद बागी गुट ने लगातार कांग्रेस आलाकमान से बातचीत करनी चाही लेकिन वहां से कोई समय नहीं मिला.
ऑपरेशन लोटस
बीजेपी इस तरह का ऑपरेशन पहले कर्नाटक में भी अपना चुकी है, जब बी.एस. येदियुरप्पा सरकार ने कुछ कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे कराकर अपनी सरकार को बहुमत तक पहुंचा लिया था. उत्तराखंड में जब कांग्रेस की अंदरूनी कलह बढऩे लगी और मुख्यमंत्री रावत का कद मजबूत होने लगा तो बीजेपी आलाकमान को लगा कि राज्य में सियासी बढ़त हासिल करने का यह सुनहरा मौका है. रावत सरकार को अपदस्थ करने के ऑपरेशन से जुड़े बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, ''करीब डेढ़ साल पहले ही विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत ने बीजेपी से सरकार गिराने को लेकर संपर्क साधा था. उनकी बात केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी से हुई थी. लेकिन तब हम लोगों ने यह कहकर मना कर दिया था कि यह हमारी पार्टी का सिद्धांत नहीं है.''
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की उत्तराखंड को लेकर टीस उसी वक्त से थी जब लोकसभा चुनाव के बाद हुए तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव में कांग्रेस ने मोदी लहर की हवा निकालकर तीनों पर जीत दर्ज कर ली थी. सूत्रों के मुताबिक, संगठनात्मक ढांचा दुरुस्त करने के बाद शाह ने सितंबर 2015 में बिहार चुनाव के दौरान पार्टी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को यह कहते हुए मिशन उत्तराखंड पर लगाया कि राज्य में रावत का कद काफी बड़ा है और 2017 के विधानसभा चुनाव में उनके जीतने की संभावना ज्यादा है. इसलिए कांग्रेस की कलह का फायदा उठाया जा सकता है. सूत्रों का कहना है कि उस वक्त विजयवर्गीय और कांग्रेस के बागी गुट के नेता विजय बहुगुणा से बातचीत भी हुई. लेकिन बिहार में संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान से सियासी समीकरण बिगडऩे लगा तो शाह ने विजवर्गीय को तब रुकने को कहा, ताकि कोई और विवाद न हो.
लेकिन कहानी ने निर्णायक मोड़ लिया 3 मार्च 2016 को. बहुगुणा और दूसरे बागी नेता हरक सिंह रावत ने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट् और उपाध्यक्ष धन सिंह रावत से संपर्क साधा. प्रदेश के इन दोनों नेताओं को शाह ने 10 मार्च को दिल्ली बुलाकर बातचीत की. सूत्रों के मुताबिक, दोनों से अलग-अलग मुलाकात में शाह का निर्देश था, ''आगे बढ़ो, पर ध्यान रखना कि हमें नुक्सान नहीं हो.'' इसके बाद शाह ने विजयवर्गीय को पश्चिम बंगाल चुनाव छोड़कर सारा ध्यान उत्तराखंड पर देने का निर्देश दिया.
बीजेपी नेतृत्व ने सीधे कांग्रेस के बागी गुट से बातचीत कर उनके विरोध की हद को टटोला. जब उसे भरोसा हो गया कि बागी गुट पीछे नहीं हटेगा तो रणनीति के तहत विधानसभा में बजट को पास नहीं होने देने की रूपरेखा तय की गई. लेकिन उससे पहले बीजेपी ने 14 मार्च को विधानसभा घेराव का बेहद सफल कार्यक्रम किया, जिसमें शक्तिमान घोड़े की टांग टूटने का विवाद पैदा हुआ. बीजेपी का मानना है कि रावत को बगावत की भनक लग चुकी थी इसलिए बीजेपी विधायक को घोड़े की टांग पर कथित हमले के आरोप में गिरफ्तार किया गया. हालांकि उस वक्त बागी गुट की ओर से 13 विधायकों के समर्थन की बात कही गई. लेकिन सदन में यह संख्या नौ पर ही आकर टिक गई.
बीजेपी की रणनीति थी कि 18 मार्च को वित्त विधेयक के गिरने के साथ ही सरकार अल्पमत में आ जाएगी. लेकिन स्पीकर ने इसे ध्वनिमत से पारित करा दिया. इस योजना में कोई गड़बड़ी नहीं हो इसलिए शाह ने विजयवर्गीय के साथ उत्तराखंड बीजेपी के प्रभारी श्याम जाजू और सह-संगठन मंत्री शिव प्रकाश और केंद्रीय पर्यटन राज्यमंत्री डॉ. महेश शर्मा को देहरादून भेजा. लेकिन स्पीकर ने जब बजट पारित करा दिया तो बागी विधायकों ने बीजेपी के 26 विधायकों के साथ रात को राजभवन में परेड कर बजट पारित किए जाने को असंवैधानिक बताया.
उसके बाद बीजेपी बागी विधायकों को रात को ही चार्टर्ड प्लेन से दिल्ली ले गई, जिन्हें गुडग़ांव के फाइव स्टार होटल में ठहराया गया. लेकिन इस बीच राज्यपाल ने रावत सरकार को 28 मार्च तक बहुमत साबित करने का समय दे दिया. बीजेपी को उम्मीद थी कि या तो राज्यपाल सरकार को बर्खास्त करेंगे या फिर 22 मार्च तक बहुमत साबित करने का वक्त देंगे. इसके बाद बीजेपी और बागी गुट के नेताओं ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास गुहार लगाई.
बीजेपी विधायकों ने राज्यपाल को फिर अनुरोध भेजा है कि लंबा समय देने पर रावत सत्ता का दुरुपयोग कर विधायकों की खरीद-फरोक्चत कर सकते हैं. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट का कहना है, ''रावत के समर्थक जहां इन विद्रोहियों को धमकाने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं अपनी सरकार बचने के लिए वे बीजेपी के विधायकों को लालबत्तियों से नवाजने में लगे हैं. बीजेपी विधायक भीमलाल आर्य को 19 मार्च की कैबिनेट बैठक में दिया गया उपाध्यक्ष आंबेडकर आयोजन समिति का पद है.'' जबकि मुख्यमंत्री ने बीजेपी पर उनकी सरकार को अपदस्थ करने का आरोप लगाया.
इस मसले पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सीधे मोदी सरकार को निशाने पर लिया, ''ऐसा लगता है कि बिहार की हार के बाद खरीद-फरोख्त, धन-बल का दुरुपयोग कर चुनी हुई सरकार को गिराना बीजेपी का मॉडल बन गया है. कांग्रेस लड़ेगी. इससे बीजेपी और मोदी का असली चेहरा उजागर हो गया है.''
क्या है बीजेपी की रणनीति
पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए कांग्रेस ने बहुगुणा के बेटे साकेत को पार्टी से निकाल दिया तो दूसरी तरफ दलबदल कानून के तहत बागी नौ विधायकों को विधानसभा स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल ने नोटिस जारी कर 26 मार्च तक जवाब मांग लिया है. इससे बीजेपी को आशंका है कि विश्वास मत से पहले स्पीकर इन नौ विधायकों को मतदान से रोक सकते हैं. इसलिए अब रणनीति बनाई जा रही है कि विश्वास मत से पहले ही स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर हटाने की मांग की जाए. लेकिन यह मांग सदन में खारिज होती है तो जोरदार हंगामा कर विश्वास मत को असंवैधानिक बताएगी.
ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका अहम हो जाएगी. बीजेपी का दावा है कि सदन में उसके अपने 27 और कांग्रेस के 9 बागी को मिलाकर बहुमत का आंकड़ा है. लेकिन रावत गुट 9 बागियों के अयोग्य करार दिए जाने के बाद 61 के सदन में कांग्रेस के 27 और सहयोगी दलों के 6 विधायकों के साथ बहुमत का दावा कर रहा है. लेकिन बीजेपी के राज्य प्रभारी श्याम जाजू सवाल उठाते हैं, ''जब वित्त विधेयक पर वोटिंग ही नहीं हुई तो बागी विधायकों पर दल-बदल कानून के तहत कैसे कार्रवाई हो सकती है'' बीजेपी का दावा है कि यूकेडी (पी) के प्रीतम सिंह पंवार भी बीजेपी के पाले में आ सकते हैं और उनकी बात कोश्यारी से हो रही है. लेकिन बीजेपी अगर बागी विधायकों के साथ सरकार बनाती है तो दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई होगी. लेकिन बीजेपी के एक रणनीतिकार की दलील है, ''सरकार बना लेने के बाद स्पीकर हमारा अपना होगा और जिस तरह यूपी में केशरीनाथ त्रिपाठी ने बीएसपी विधायकों की सदस्यता पर फैसला लेने में समय लिया था उसी तरह उत्तराखंड में भी होगा और साल भर में चुनाव आ जाएगा.''
बीजेपी ने हड़बड़ी में सरकार बनाने का दावा तो पेश कर दिया, लेकिन आलाकमान से उसे हरी झंडी नहीं मिल रही है. सूत्रों के मुताबिक, विधायकों और नेताओं के साथ अलग-अलग बैठकों में भी शाह ने अभी इंतजार करने को कहा है. पार्टी को डर है कि अगर बीजेपी बागियों के सहारे सरकार बनाती है तो सीधा आरोप उस पर लगेगा और हरीश रावत सहानुभूति बटोर ले जाएंगे. इतना ही नहीं, सरकार बनाने की स्थिति में उसकी भी अंदरूनी कलह सतह पर आ जाएगी क्योंकि इस वक्त राज्य में तीन बड़े नेता मुख्यमंत्री रह चुके हैं और नए नाम के तौर पर अजय भट्ट का नाम भी उछल रहा है.
नेतृत्व को लेकर उलझन की वजह से बीजेपी अरुणाचल प्रदेश की तर्ज पर बागी नेताओं को बाहर से समर्थन देकर सरकार बनवाने के विकल्प पर भी विचार कर रही है. लेकिन इससे सियासी नुकसान की संभावना दिख रही है क्योंकि बागी गुट बाद में अलग पार्टी भी बना सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक आलाकमान का जोर राष्ट्रपति शासन लगवाने की है. यही वजह है कि हरीश रावत की ओर से विधायकों के खरीद-फरोख्त का आरोप लगाए जाने के बाद बीजेपी की बचाव की मुद्रा में है और पार्टी इसे रावत सरकार की तानाशाही कार्यशैली का नतीजा बता रही है. बीजेपी उल्टा यह आरोप लगा रही है कि कांग्रेस ने पहले सितारगंज से बीजेपी के विधायक किरन मंडल का इस्तीफा कराया और अब रावत ने भी बीजेपी के निलंबित विधायक भीमलाल को मंत्री का दर्जा दिया. जाजू कहते हैं, ''रावत की कार्यशैली से उनके विधायकों में रोष है.'' लेकिन दिलचस्प तथ्य है कि जिन बहुगुणा से बीजेपी गलबहियां कर रही है, उन्होंने ही पहले बीजेपी के सितारगंज के विधायक को तोड़ा था.
बागियों से क्या हुई डील
भले बीजेपी की ओर से किसी तरह की सौदेबाजी से इनकार किया जा रहा हो, लेकिन सूत्रों के मुताबिक, सभी विधायक सरकार बनने की आस में बीजेपी के साथ जुड़ रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक, बहुगुणा को राज्यसभा सांसद बनाने और केंद्र में मंत्री पद का भरोसा दिया गया है तो बागी गुट से कम से कम 3-4 विधायकों को मंत्री बनाया जाएगा. इतना ही नहीं, सभी बागियों को अगले चुनाव में बीजेपी की ओर से टिकट का भी भरोसा दिया गया है.
पार्टी का मानना है कि इन नौ विधायकों को टिकट देने से बीजेपी में असंतोष इसलिए पैदा नहीं होगा कि इन सीटों पर पार्टी का आधार अच्छा नहीं है. लेकिन बीजेपी अगर सरकार बनाने की पहल से हाथ खींच लेती है और राष्ट्रपति शासन के विकल्प को प्राथमिकता देती है तो सबसे बड़ा झटका बागी गुट को ही लगेगा. हालांकि इस सवाल पर बीजेपी के एक नेता का कहना है, ''पहली प्राथमिकता हरीश रावत सरकार को गिराना है और अगर सरकार गिर जाती है तो बागी गुट के विधायकों को बीजेपी आलाकमान के अंतिम निर्णय के मुताबिक ही चलना होगा. लेकिन इतना तय है कि इन विधायकों को बीजेपी अधर में नहीं छोड़ेगी.''
अगर बीजेपी के दावा को माने तो रावत सरकार का जाना तय है, लेकिन सवाल है कि कांग्रेस के असंतोष को हवा देने की तयशुदा रणनीति में कामयाब बीजेपी अब क्या इस पहाड़ी सूबे में वाकई कमल खिला पाएगी या फिर रावत सहानुभूति बटोर ले जाएंगे?