इंडिया टुडे कॉनक्लेवः देश की तरक्की और कुछ रोड़े

देश की तरक्की की कहानी को आगे बढ़ाने वाले कारकों में वित्तीय अनुशासन, गिरता भ्रष्टाचार, आधार बिल का पेश होना, सब्सिडी को निशाना बनाने के लिए जेएएम का सहारा लेना और कुछ क्षेत्रों में एफडीआइ का खुलना अहम हैं.

भारत के विकास के आंकड़े की गणना करने की नई विधि को लेकर अब तक काफी सवाल उठाए जा चुके हैं. सियासत में विपरीत ध्रुवों पर खड़े दो आर्थिक विचारकों और नीति निर्माताओं-मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुबह्मण्यम और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया-ने इन चिंताओं पर विराम लगाते हुए कहा कि आर्थिक आंकड़े पैदा करने वाली संस्थाएं “सर्वोच्च गुणवत्ता की हैं जिनकी विश्वसनीयता असंदिग्ध है, जहां राजनीतिक दखलअंदाजी का कोई सवाल ही नहीं खड़ा होता.” सुब्रह्मण्यम ने अतीत में हालांकि नई विधि पर कुछ चिंता जताई थी, लेकिन उस पर सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि हर प्रणाली में, हर अनुमान में दुनिया भर में आंकड़ों को लेकर अनिश्चितता का एक सामान्य दायरा होता है. और फिलहाल तेल की कम कीमत की वजह से पैदा हुई परिस्थितियों के मद्देनजर जब कंज्युमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआइ) और व्होल-सेल प्राइस इंडेक्स (डब्लूपीआइ) के आंकड़े आठ फीसदी नीचे गिर चुके हैं, तो जीडीपी के आंकड़े की गणना करना कठिन हो जाता है.

देश की तरक्की की कहानी को आगे बढ़ाने वाले कारकों में वित्तीय अनुशासन, गिरता भ्रष्टाचार, आधार बिल का पेश होना, सब्सिडी को निशाना बनाने के लिए जेएएम का सहारा लेना और कुछ क्षेत्रों में एफडीआइ का खुलना अहम हैं. समस्या यह है कि बैंकों का 1.14 लाख करोड़ रु. कर्ज डूब चुका है और देश का भविष्य इस बात पर टिका है कि वह अपने बैंकिंग संकट से कैसे निबटता है. वोडाफोन के लिए पूर्व प्रभावी टैक्स पर सुब्रह्मण्यम ने कहा, “अगर आप खुलकर पूरी तरह कार्रवाई करते तो आप पर एक विदेशी कंपनी को फायदा पहुंचाने का आरोप लग जाता.”

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