‘‘उनका हर शॉट यकीनन पहला शॉट होता है’’

फिल्म के निर्माण के दौरान, मुझे याद है जब मेहरा ने कहा: 'जावेद, इसकी सिफारिश करने के लिए शुक्रिया, क्योंकि मैं इस ऐक्टर के बगैर फिल्म बनाने की कल्पना नहीं कर सकता.’

अमिताभ बच्चन और बच्चन
अमिताभ बच्चन और बच्चन

अमिताभ बच्चन@80

जावेद अख्तर 

मैं फिल्म जगत के उन बहुत थोड़े लोगों में था, जो इस नौजवान अभिनेता की जबरदस्त प्रतिभा को देख और सराह सके, यहां तक कि तब भी जब उनकी फिल्में अच्छा नहीं कर रही थीं. रास्ते का पत्थर (1972) फ्लॉप फिल्म थी—मुझे लगता है उसके प्रोड्यूसर के अलावा अकेला मैं रहा होऊंगा जिसने तीन बार देखी.

मगर मैंने देखा कि अमिताभ बच्चन ने जबरदस्त काम किया था. यहां तक कि परवाना (1971) और महमूद की गरम मसाला (1972) में भी, जिसमें उन्होंने रॉबर्ट टेलर नाम के कॉमिक किरदार के तौर पर मेहमान भूमिका की थी, उनका काम तारीफ के काबिल था. मुझे लगा कि बस एक ही चीज उनके खिलाफ जा रही थी और वह थी खराब स्क्रिप्ट और खराब निर्देशन.

बच्चन को जंजीर (1973) में लेने के लिए प्रकाश मेहरा को मनाने में कुछ वक्त लगा, क्योंकि वे 'काम के’ अभिनेता की तलाश में थे. फिल्म के निर्माण के दौरान, मुझे याद है जब मेहरा ने कहा: 'जावेद, इसकी सिफारिश करने के लिए शुक्रिया, क्योंकि मैं इस ऐक्टर के बगैर फिल्म बनाने की कल्पना नहीं कर सकता.’

स्क्रिप्ट में मेहरा जितना गहरा विश्वास करते थे, उसके प्रति मेरे मन में बड़ा सम्मान है, क्योंकि तब तक हर 'काम के’ अभिनेता ने वह भूमिका निभाने से इनकार कर दिया था, पर उन्होंने उसे छोड़ा नहीं. किस्मत की बात है वरना अमिताभ को वह मौका नहीं मिलता. जंजीर आगे चलकर गोल्डन जुबिली हिट हुई और अमिताभ बच्चन के उदय का सूत्रपात किया.

सलीम खान और मैंने 22 फिल्में लिखीं और उनमें से 11 में अमिताभ बच्चन थे. उन्होंने कभी कोई एक शब्द भी नहीं बदला. हमें भाषा की बारीकियां उन्हें समझानी नहीं पड़ती थीं; उन्हें पता होती थीं. लेखक स्वभाव से तुनुकमिजाज होते हैं, पर हमने जितनी भी फिल्में कीं, उनमें एक लाइन में भी मुझे नहीं लगा कि उन्होंने संवाद उस तरह न बोला और व्यक्त किया हो जैसी मैंने कल्पना की थी.

इसमें कोई शक नहीं है कि जो परफॉर्मेंस जंजीर और दीवार में अमिताभ बच्चन ने दी, वह कोई दूसरा नहीं दे सकता था. मुझे बहुत विनम्र भी नहीं होना चाहिए. सलीम-जावेद के अलावा कोई भी उन्हें वह स्क्रिप्ट नहीं दे सकता था जो उन्होंने ’70 और ’80 के दशक में कीं और सलीम-जावेद को कोई उस किस्म के परफॉर्मेंस नहीं दे सकता था, जैसे उन्होंने दिए.

अमिताभ बच्चन होने के लिए आपमें कई खूबियां होनी चाहिए—विराट प्रतिभा, पूर्ण अनुशासन और फोकस, और मुकम्मल सामाजिक रिश्ते. यहां तक कि ’80 की उम्र में भी यहां एक ऐसा शख्स है जो अब भी हर शॉट ऐसे देता है मानो यह उसकी जिंदगी का पहला शॉट है, और उनका करियर इसी पर टिका है.

वे आपके काम में दखलअंदाजी नहीं करते और आपको जितनी चाहिए, उतनी पूरी जगह देते हैं. यही वजह है कि उन्हें भगवान मानने वाले युवतर अभिनेताओं को उनके साथ काम करने पर एहसास होता है कि यह भगवान कितना परोपकारी है.

(पटकथा लेखक, गीतकार जावेद अख्तर ने बच्चन की ऐंग्री यंगमैन की छवि गढ़ने में सलीम खान के साथ अहम भूमिका अदा की)

‘असाधारण अदाकारी’

शक्ति (1982)
जब भी किसी से बच्चन अभिनीत पसंदीदा फिल्मों के बारे में पूछो तो आम जवाब होते हैं जंजीर (1973), अमर अकबर एंथनी (1977), त्रिशूल (1978), डॉन (1978) और दीवार (1979). मगर कुछ उनकी अदाकारी के असाधारण प्रदर्शनों को वाजिब तवज्जो नहीं मिली. शक्ति (ऊपर) में बेहद रौबदार पिता का किरदार निभा रहे दिलीप कुमार के नाराज लेकिन दब्बू बेटे की भूमिका अदा की. वे अदाकारी को कुछ ऊपर ले जा सकते थे और एतराज भी नहीं होता, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया.

मिली (1975)
जया तो शानदार हैं ही, पर उनका काम इतना उम्दा है कि भरोसा नहीं होता. उनकी ऐंग्री यंग मैन की बात होती है, मुझे हैरानी है कि कभी इस फिल्म का जिक्र नहीं किया जाता.

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