उपनिवेश बनते शिक्षा परिसर
मोदी सरकार की योजना स्पष्ट हैः कार्यक्रमों और प्राथमिकताओं में दीर्घकालिक बदलावों से शिक्षा में भारी बदलावों को आगे बढ़ाना और महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे लोग बैठाना जो भविष्य में काम आ सकें.

भारतीय विश्वविद्यालयों की असहमति और विचार-विमर्श की संस्कृति गंभीर चुनौती से जूझ रही है, क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों के ओरिएंटेशन और पाठ्यक्रमों को सुनियोजित तरीके से प्रभावित करने की कोशिश कर रही है, ताकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और संघ परिवार की हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा को इनमें समायोजित किया जा सके. विश्वविद्यालयों में सरकारी दखल नई बात नहीं है, यह चलन पिछले 25 साल में बढ़ा है, लेकिन आज हम जिस तरह का दखल देख रहे हैं, वैसा पहले नहीं देखा गया. यह अब ऐसे चरण में पहुंच गया है, जहां सरकारी विश्वविद्यालयों की अकादमिक स्वायत्तता खत्म हो सकती है.
मोदी सरकार की योजना स्पष्ट हैः कार्यक्रमों और प्राथमिकताओं में दीर्घकालिक बदलावों से शिक्षा में भारी बदलावों को आगे बढ़ाना और महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे लोग बैठाना जो भविष्य में काम आ सकें. इसके लिए वह सरकार और संघ के वफादारों को केंद्रीय और राज्यों के विश्वविद्यालयों, रिसर्च, टेक्नोलॉजी और सांस्कृतिक संस्थाओं में महत्वपूर्ण पदों पर तैनात कर रही है.
यह कोई पहली मर्तबा नहीं है, जब कोई सत्ता अपने पसंदीदा लोगों को ताकत और प्रभाव वाले पदों पर नियुक्त कर रही है. लेकिन पहले कम से कम संस्थानों के प्रमुखों या अकादमिक निकायों के सदस्यों में एक पेशेवर योग्यता तो दिखती थी, लेकिन इस मामले में तो मौजूदा सत्ता के समर्थित ज्यादातर लोगों का रेकॉर्ड बहुत ही निराशाजनक है. ऐसे लोगों के पास तो दिखाने के लिए भी थोड़ी विशेषज्ञता या उपलब्धि नहीं है. इस मामले में किसी भी तरह की आलोचना को राजनीति प्रेरित बताकर खारिज कर दिया जाता है. इस जवाबी तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि सरकार शैक्षणिक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में प्रमुख पदों के लिए ऐसे हिंदू राष्ट्रवादियों को चुन रही है, जिनका एकेडमिक रेकॉर्ड संदिग्ध रहा है.
अमेरिका में रहने वाले हिंदुत्व विचारक राजीव मल्होत्रा को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज में ऑनररी फैकल्टी नियुक्त करना इसका एक अच्छा उदाहरण है. फेक न्यूज को प्रचारित करने के अलावा मल्होत्रा की मीडिया के क्षेत्र में किसी तरह की विशेषज्ञता नहीं है. इतिहासकार और जीवनीकार रामचंद्र गुहा को वर्ष 2009 में स्थापित अहमदाबाद यूनिवर्सिटी (एयू)—एक निजी और गैर लाभकारी संस्था—में हाल ही फैकल्टी मेंबर के रूप में नियुक्त किया गया था, लेकिन यह विडंबना ही है कि वे ज्वाइन नहीं कर सके क्योंकि परिस्थितियां उनके नियंत्रण से बाहर हो गईं.
उन्होंने एक नवंबर को ट्वीट कर बताया कि वे क्यों पीछे हट गएः "गांधी का एक जीवनीकार गांधी के शहर में गांधी पर चलने वाले कोर्स के लिए अध्यापन नहीं कर सकता.'' इसके दो दिन बाद ही खबर आई कि नेहरू मेमोरियल म्युजियम ऐंड लाइब्रेरी (एनएमएमएल) सोसाइटी के कम से कम तीन असहमति वाले सदस्यों को सरकार ने हटा दिया है, जिन्होंने तीन मूर्ति परिसर में सभी प्रधानमंत्रियों के लिए संग्रहालय बनाने के निर्णय का विरोध किया था और टीवी ऐंकर अर्नब गोस्वामी सहित चार ऐसे सदस्यों को नियुक्त किया गया जो सरकार के कदमों के खिलाफ न जाएं.
इन नियुक्तियों और लोगों को बाहर करने की वजहें समान हैः असहमति के लिए जगह लगातार कम हो रही है और संघ के वफादारों को काफी वरीयता दी जा रही है. रामचंद्र गुहा के मामले को ही देखें तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने उन्हें "राष्ट्र विरोधी'' बताते हुए उनकी नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी. यह उनके खिलाफ गया और इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन ने चुप्पी साध ली. यह जेएनयू से लेकर एयू तक विभिन्न विश्वविद्यालयों में चल रही एक मानक बन गई प्रक्रिया के अनुरूप है. दूसरी तरफ, एनएमएमएल सोसाइटी मेंबरशिप में बदलाव से सत्तारूढ़ दल अपने राजनैतिक प्रभुत्व को बढ़ाना चाहता है.
एनडीए सरकार के हाल में यूनिवर्सिटी टीचर्स पर सेंट्रल सिविल सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स थोपने से भी मतभेद के अधिकार और असहमति जाहिर करने के अधिकार को एक और बड़ा धक्का लगा है. इसके मुताबिक केंद्रीय फंडिंग वाली यूनिवर्सिटी के टीचर अब किसी सरकार विरोधी प्रदर्शन में शामिल नहीं हो सकते या उसमें बोल नहीं सकते और यही नहीं, वे सत्ता की आलोचना करने वाली कोई रिसर्च भी नहीं कर सकते. इससे सरकारी यूनिवर्सिटी सरकारी विभाग में बदल जाएंगी और खासकर साइंस, आर्ट और ह्यूमेनिटीज में रिसर्च की गुंजाइश सीमित हो जाएगी.
आज मसला सिर्फ सरकारी दखल का नहीं, बल्कि संघ परिवार कार्यकर्ताओं के दखल का है. भाजपा को समझ नहीं है कि समाज और लोकतंत्र के लिए विश्वविद्यालयों की किस तरह से आलोचनात्मक भूमिका है. वह अकादमिक परिसरों पर नियंत्रण के लिए ज्यादा जुनूनी है, इसी वजह से पिछले कुछ वर्षों से विश्वविद्यालय राजनैतिक अखाड़ा बन गए हैं. एबीवीपी की तरह खुलेआम धमकाने का काम कोई और छात्र संगठन नहीं करता. इन दोनों की वजह से लोकतांत्रिक स्थान का क्षरण हुआ है और यह समाज को फासीवाद की तरफ ले जाने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है.
जोया हसन नई दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज में प्रोफेसर एमेरिटास हैं.