हुड़दंगी और कानून के बीच में फंसा अधिकार
यह शर्मिंदगी की बात है कि पिछले 70 साल के संवैधानिक लोकतंत्र के बाद भी किसी महिला को अपना पति चुनने के लिए अदालत की शरण में जाना पड़ रहा है.

सोलह जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने हमें भरोसा दिलाया था कि जीवनसाथी के चयन के हमारे अधिकार पर कोई खाप पंचायत सवाल खड़े नहीं कर सकेगी. 23 जनवरी, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने हदिया को कहा कि वह एक बालिग स्त्री के पति के चयन के अधिकार पर सवाल खड़े नहीं कर सकता. लेकिन पहले हमें अदालत में अनगिनत लोगों के उस भयंकर हुड़दंग को झेलना पड़ा.
जब वे कहते हैं कि हदिया 'स्टॉकहोम सिंड्रोम' (ऐसी मनोदशा जहां बंधक अपहर्ताओं को ही अपना शुभचिंतक मानने लगता है) से पीड़ित है या खाप जैसी चीजों को किसी के विवाह को चुनौती देने का अधिकार प्राप्त है, तो उनकी भाव-भंगिमा ऐसी थी मानो वे अपने हुड़दंग को इस नेक प्रयास में एक छोटा-सा योगदान मान रहे हों.
ऐसी कहानियां, कानून राजनीति और समाज के बीच के गहरे संबंधों की एक मिसाल हैं जो आज जिस कदर गुत्थमगुत्था दिखती हैं वैसी पहले कभी नहीं थीं क्योंकि राजनैतिक रूप से अपनी धाक रखने वाले लोगों के बौद्धिक आधार में अब एक विचित्र परिवर्तन देखा जा रहा है.
इस राजनैतिक सोच को खाद-पानी उन स्वयंभू नेताओं से मिलती है जो ढिठाई की हद तक कायदे-कानून से दूर हैं. इस प्रकार हमारे नेता पहले से ही काम के बोझ तले दबी हमारी अदालतों की कार्यवाही में और अड़चनें डालते हैं. अदालतों को संवैधानिक आदर्शों को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त मशक्कत करनी पड़ती है जबकि एक सामाजिक वास्तविकता के आगे विवश दिखता राजनैतिक तबका सुधार के लिए कोई प्रयास नहीं करता.
अकेले हदिया मामले में सुप्रीम कोर्ट में नौ तारीखें पड़ीं (केरल हाइकोर्ट की पीठ की तो बात करना ही फिजूल है जिसने अपने फैसले में इस विवाह को रद्द ही कर दिया था) और इतना ही क्यों, केरल में सनसनीखेज 'लव जिहाद' की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) की जांच के किस्से भी तो अपनी जगह हैं.
18वीं सदी के अंग्रेज चिंतक एडमंड बर्क ने ब्रिस्टल के मतदाताओं को आगाह करते हुए कहा था, ''आपका जनप्रतिनिधि आपके प्रति देनदार है, केवल उसके उद्यम नहीं, बल्कि उसके निर्णय भी. अगर वह इसे आपके विचारों पर छोड़ता है तो आपके साथ धोखा कर रहा है.''
विरासत में मिली ऐसी सोच हमारे राजनैतिक वातावरण में कहीं गुम हो जाती है जहां लोकप्रियता की लहर पर सवार नेता, अपने राजनैतिक हित साधने के लिए किसी भी हद तक गिरने को आतुर रहते हैं. यह हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधियों की अपने काम को बखूबी अंजाम न दे पाने की नाकामी का सुबूत है कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसे घिसे-पिटे बयान देने को विवश होना पड़ रहा है.
सरकार का कोई भी सदस्य हमें यह बताने को राजी नहीं कि पहचान की राजनीति की आड़ में जो हिंसा हो रही है उस पर वे क्या कर रहे हैं. कोई नहीं बता रहा कि जिस विभाजनकारी राजनीति के लिए संविधान में कोई स्थान नहीं उसकी क्षतिपूर्ति कैसे होगी. सब स्टॉक बाजार और आर्थिक शक्तियों जैसे विषय पर तो खूब बातें करते हैं लेकिन समाज को अपनी चपेट में लेने के लिए तेजी से बढ़ रही एक खतरनाक बीमारी के स्पष्ट संकेतों को देखने के बाद भी लोग चुप्पी साधे बैठे हैं.
खाप पंचायतों का बलात्कार के आदेश देना (जैसा उत्तर प्रदेश के बागपत में 2015 में हुआ), गोरक्षकों का पीट-पीटकर हत्याएं करना, राजनैतिक असहमतियों से प्रेरित हत्याएं, पेशेवर लोगों, अदाकारों और लेखकों के साथ-साथ युवा प्रेमी जोड़ों को जान से मारने की धमकी, यही हमारे आज के समाज की नई पहचान बनती जा रही है. इन विषयों को उठाने वाले लोग पर्याप्त संख्या में नहीं है ताकि बात हुड़दंगियों और उनके नेताओं तक जोरदार आवाज में पहुंचाई जा सके. यह एक ऐसा परिदृश्य है जब बुद्धिजीवी भी भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं.
मालविका राजकोटिया वकील हैं तथा भारत में विवाह और तलाक के कानून विषय पर एक पुस्तक इंटिमेसी अनडन की लेखिका हैं.
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