सुशासन के पैमाने पर एक नजर

राज्य एक-दूसरे से केंद्र से वित्तीय रियायतें हासिल करने के मामले में नहीं, बल्कि अपने कामकाज और भौतिक तथा सामाजिक बुनियादी ढांचे के आधार पर होड़ करते हैं और उन्हें यकीनन ऐसा करना भी चाहिए.

राज्य
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यह 2003 की बात है. मैं और लवीश भंडारी देश के विभिन्न राज्यों के सालाना प्रदर्शन के आधार पर रैंकिंग के लिए इंडिया टुडे से जुड़े. इसे ''राज्यों की दशा-दिशा" नाम दिया गया. यह सफल प्रयोग रहा, जिसके तहत राज्यों की दशा पर एक वार्षिक अंक केंद्रित होता रहा है और पुरस्कारों का एक आयोजन भी किया जाता रहा है. लेकिन अब इसमें थोड़ा बदलाव किया गया है.

शुरुआत में, अक्सर ऐसे राज्यों की नाराजगी और आलोचना झेलनी पड़ती थी, जिन्हें ऊंची रैंकिंग नहीं मिलती थी. हमें तब सराहना के बजाए गुस्सा झेलना पड़ता था, खासकर जब हम कुछ ऐसी टिप्पणी करते थे, ''आधे से अधिक राज्य औसत से नीचे हैं." हम सीखते गए और हमने खुद को सुधारा और फिर कहा, ''आधे राज्य औसत से ऊपर हैं." धीरे-धीरे हमारे तौर-तरीके को स्वीकृति मिलने लगी.

साल-दर-साल कुछ फर्क के साथ देश की 90 से 95 फीसदी राष्ट्रीय आय का सृजन राज्यों में होता है. यानी ''मेक इन इंडिया" दिल्ली में नहीं, राज्यों में होता है. बाजार से सीधे जुड़े सुधार के जिन मामलों की बात होती है, उनमें अधिकांश राज्य सूची या सातवीं अनुसूची की समवर्ती  सूची में शामिल हैं. राज्य अब वित्तीय रियायतों के मामले में नहीं, बल्कि प्रशासन और भौतिक तथा सामाजिक बुनियादी ढांचे के मामले में होड़ करते हैं और उन्हें ऐसा करना भी चाहिए. वे निवेश और मानव संसाधनों को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं. वे वित्तीय और मानव संसाधनों को कायम रखने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं. अमूमन यह घिसी-पिटी दलील दी जाती है कि भारत बेहद केंद्रीकृत रहा है.

यह केंद्रीकृत था, क्योंकि इसके पीछे औपनिवेशक कारण थे. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यह कहीं अधिक केंद्रीकृत रहा, जिसके पीछे नियोजन संबंधी कारण थे. कई आयोगों ने अपनी रिपोर्ट में इसका जिक्र भी किया है. मौजूदा सरकार ने इस अति-केंद्रीकरण को संस्थागत तरीके से कम करने का काम शुरू कर दिया है. चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों को स्वीकृति मिल चुकी है. मुख्यमंत्रियों के समूह केंद्र प्रायोजित योजनाओं को आकार दे रहे हैं. जीएसटी, स्मार्ट सिटी और अन्य योजनाओं में राज्यों की शिरकत रही है.

वित्तीय मामलों में गैर-बराबरी की बातें थोड़ी ही हैं. गैर-वित्तीय मामलों में निर्णय-प्रक्रिया के विकेंद्रीकरण से संबंधित मुद्दों पर खासा जोर है. वास्तव में सिर्फ राज्यों में यह अधिक देखा जाता है. राज्यों में, खासकर बड़े राज्यों में काफी विविधता होती है. इसलिए निर्णय लेने की प्रक्रिया को जिला स्तर तक नीचे ले जाने, यहां तक कि ब्लॉक और पंचायत स्तर तक ले जाने की बात हो रही है. मैं समझता हूं कि नगरपालिका और ग्राम पंचायतों को अहमियत देने के साथ हम इस विकेंद्रीकरण की ओर भी मुड़े हैं.

राज्यों की रैंकिंग का विस्तार हुआ है. इस प्रतिस्पर्धी माहौल में वे यह जानने के वाजिब स्रोत हैं कि कोई राज्य दूसरे राज्यों की तुलना में कैसा प्रदर्शन करता है और समय के साथ उसका प्रदर्शन कैसा होता है. कई बार, ऐसे अध्ययन कुछ ऐसी अच्छी चीजों को दर्ज करते हैं, जिनसे दूसरे राज्य सीखने की उम्मीद कर सकते हैं और उसे दोहराते हैं. दरअसल इन अध्ययनों में अक्सर भिन्नताएं होती हैं.

ऐसे कुछ अध्ययन राज्यों का आकलन निवेश स्थलों के रूप में करते हैं, तो अन्य मानव विकास या फिर उनकी सामाजिक प्रगति के आधार पर आकलन करते हैं. कुछ आकलन इस आधार पर भी होते हैं कि राज्य रहने लायक है या नहीं. ऐसे हर अध्ययन की अपनी सीमाएं और अपने रुझान होते हैं, जैसा राज्यों की दशा-दिशा में भी हुआ था. हालांकि तमाम अध्ययनों में जब कोई राज्य अच्छा प्रदर्शन नहीं करता तो, साफ संदेश जाता है. अब तकरीबन पचास फीसदी पूंजी का सृजन राज्यों में होता है. चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिश के बाद राज्य और ग्राम सभा तक अधिकारों का हस्तांतरण हुआ है.

हालांकि नतीजे हमेशा सीधे-सीधे लोगों की उम्मीदों के अनुरूप नहीं होते, और अविकसित परिवहन तंत्र जैसे पुराने मुद्दे कायम हैं. ऐसे में लोगों की आकांक्षा और प्रशासन की क्षमता के मूल्यांकन का स्वागत होना चाहिए और यह वांछित भी है. बेशक, खराब कामकाज के लिए मौजूदा सरकार को लोग अपने वोट से दंडित कर सकते हैं. दरअसल ''कामकाज" इतना व्यापक शब्द है कि कुछ आंकड़ों को जोड़कर ही उसे ठीक-ठीक समझा जा सकता है. 2003 से ''राज्य की दशा-दिशा" सर्वेक्षण ऐसा करता आया है.

(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष और नीति आयोग के सदस्य हैं. लेख में उनके निजी विचार ही व्यक्त हुए हैं.)

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