हादसों के ढेर पर

हमारे शहरों की नागरिक व्यवस्था में हादसे लिखे हुए हैं. सारा ध्यान इन हादसों के होने पर बस उसके प्रभावों से निपटने तक सीमित रह जाता है

गौतम भाटिया दिल्ली में आर्टिटेक्ट हैं
गौतम भाटिया दिल्ली में आर्टिटेक्ट हैं

कुछ साल पहले की बात है. कनाडा से आए मेरे एक अंकल दक्षिण दिल्ली के एक खुले मैनहोल में गिर गए. वे रात के खाने के बाद टहलने के लिए निकले थे पर 11 घंटे बाद लौटे. उनकी चीख-पुकार सुनकर वहां से गुजरते एक व्यक्ति ने उन्हें बचाया. बाद में उन्होंने कहा, अगर यह सब टोरंटो में हुआ होता तो शहर के अधिकारियों पर लाखों डॉलर का मुकदमा ठोक देता. वे भाग्यशाली थे कि उन्हें मामूली चोटें आईं और वे बच गए. गनीमत रही कि उनके ऊपर कोई और नहीं गिरा. अगले दिन के अखबार में मैनहोल से जुड़ी तीन अलग-अलग दुर्घटनाओं का जिक्र था.

यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत के शहर ऐसी विस्फोटक स्थिति में हैं जहां कभी भी, कुछ भी हो सकता है. मुंबई में इमारतों का ढहना, कोलकाता की सड़कों पर बाढ़, दिल्ली में कचरे का अंबार, ये सब आगे चलकर हादसों के कारण बनते हैं. ये हादसे इतने नियमित होते हैं कि इनके होने पर किसी को हैरत नहीं होती. किसी हादसे को लेकर स्थानीय निकायों का पूरा विधान उसके बाद के प्रभावों से निपटने और उसके दोबारा होने का इंतजार करने तक सीमित होता है. हाल में टेक्सास में बाढ़ से जितने लोगों की मृत्यु हुई, उससे ज्यादा लोग तो मुंबई में एक इमारत के ढहने से मर गए. मुंबई में ऐसी कई इमारतें हैं जो सौ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं. एक ऐसा शहर, जहां सिर पर छत होना ही बड़ी बात है, चाहे वह कितनी भी अस्थायी और खतरनाक क्यों न हो, इन हालात को बदलने की चिंता न तो नागरिक प्रशासन को है और न ही खतरनाक इमारतों में रह रहे लोगों को. ऐसे में हैरत नहीं कि दिल्ली में कचरे के 18 मंजिल जितने ऊंचे पहाड़ की ओर लोगों का ध्यान तब तक नहीं जाता, जब तक यह भरभरा कर ढह नहीं जाता.

वे कुछ अजीब किस्म के ही अफसरशाह होंगे जो 15 साल पहले ही अपनी पूरी क्षमता तक भर चुके लैंडफिल के प्रति उदासीन बने रहे. पिछले साल उत्तरी दिल्ली में एक खुले मैनहोल में गिरने से एक स्कूली छात्रा की मौत के बाद ही अधिकारियों ने उसे ढकने की जरूरत महसूस की. न तो निगम और न ही उस गली में रहने वाले लोगों को लगा कि वे किसी भी तरह उस लड़की की मौत के लिए जिम्मेदार थे. अगर वह लड़की छोटी-मोटी चोटों के साथ बच गई होती, तो शायद उस मैनहोल को ढंकने की जहमत भी नहीं उठाई जाती. इस बेरहम असंवेदनशीलता का कारण हमारे दिलो-दिमाग में घर कर गई यह बात है कि आम लोगों के जीवन का शायद ही कोई मोल है.

ऐसी लापरवाही हर जगह है. शिमला और अल्मोड़ा के बीच चार लेन वाले राजमार्ग के निर्माण में पहाडिय़ों को काटकर लंबी-लंबी पट्टियां निकाली गई हैं. ये पट्टियां भूस्खलन के लिहाज से काफी संवेदनशील हैं और इनकी भरपाई नहीं की जा सकती. हिमाचल में दूरदराज के शहरों में छह से आठ मंजिल वाले होटल बनाए जा रहे हैं, खतरनाक पहाड़ी ढलान पर अपार्टमेंट बनाकर इन्हें पहाड़ों में दूसरे घर के रूप में बेचा जा रहा है. इसी तरह बेंगलूरू के पास ऊटी और कुनूर में इलायची और चाय बागानों को धनी लोगों के अवकाश गृहों के तौर पर विकसित किया जा रहा है. जैसे ही आप शिमला, सोलन, दार्जिलिंग या गंगटोक में घुसेंगे, आपका सामना मानवीय ज्यादती की दास्तां बयां करते बेतरतीब और एक-दूसरे से सटी इमारतों के जाल से होगा. यहां कभी भी कोई हादसा हो सकता है.

जब भी मानव-निर्मित आपदा होती है, वह स्पष्ट संकेत करती है कि शहरों के साथ-साथ नाजुक पारिस्थितिकी वाले इलाकों में विनाशकारी तरीके से हो रहा निर्माण अपनी चरम सीमा तक पहुंच चुका है. पिछले साल चेन्नै की बाढ़, इस साल मुंबई और कुछ साल पहले कश्मीर की बाढ़, केदारनाथ में जल प्रलय. ये सभी संकेत करते हैं कि सरकार को स्थानीय पारिस्थितिकी और इसके संरक्षण के अनुकूल बसावट के बारे में सोचना ही होगा. महज मांग या पर्यटन नीति के मद्देनजर निर्माण की अनुमति नहीं दी जा सकती.

देश में हर तरफ आधा-अधूरा और बेतरतीब-सा नजारा है. भारतीय परिदृश्य में परख की जमीन लगातार निर्मित हो रही है, जिसे संतुलन और विवेक का इंतजार है. लेकिन जनसंख्या, उच्च प्रदूषण और साफ-सफाई की खराब स्थिति को नियंत्रित करने और भविष्य में दस्तक देती बीमारियां, बाढ़ तथा कचरे के अंबार को तब गंभीरता से नहीं लिया जा सकता जब देश की प्राथमिक जरूरत रोजगार, नए आप्रवासियों को साथ लेकर चलना, नई कारें, वैधानिक और अस्थायी फैक्टरियां लगाने तथा अपना प्रभाव बढ़ाने की हो. विकास के त्रासद परिणामों का सामना हाथ झाड़ते हुए मजबूती के साथ किया जाना चाहिए.

(गौतम भाटिया दिल्ली में आर्टिटेक्ट हैं)

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