अर्थात्: बजट की कसौटी
बजट में यह देखा जाना चाहिए कि इससे कितने रोजगार पैदा होंगे, क्योंकि विकास का दर्शन इसी पर निर्भर है.

आपको 2014 के बजट की खास बातें याद हैं! यकीन मानिए, गूगल की शरण में गए बिना पिछले बजटों को याद करना मुश्किल है. दरअसल, यही बजटों की सबसे बड़ी उलझन है. उनकी आमद रोमांचक है पर आंकड़े उबाऊ होते हैं इसलिए याद रखने की कोई वजह नहीं होती.
लद गए वे दिन जब बजटों के आईने में अर्थव्यवस्था को देखा जाता था. अब तो अर्थव्यवस्था के आईने में बजट देखे जाते हैं. आंकड़ों, स्वतंत्र आकलनों और ग्लोबल एजेंसियों की निगाह के बीच बजट को जरूरतों पर सौ टका खरा साबित करना सरकार की जिम्मेदारी है, नहीं तो एक हफ्ते बाद ही बजट का पानी उतर जाता है.
यह अर्थात् जब आपके हाथ में होगा तब तक बजट संसद के आंगन में उतर चुका होगा. इसलिए यह रही बजट की कसौटी जिस पर आप मोदी सरकार के चौथे बजट को कस कर देख सकते हैं
पहले देखिए बजट की पृष्ठभूमि
पहला है विराट नोटबंदी जिसने उत्पादन, खपत, मुद्रा प्रणाली और बैंकिंग की चूलें हिला दीं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप डिग्लोबलाइजेशन शुरू कर रहे हैं. वे अमेरिकी अर्थव्यवस्था के दरवाजे बंद करने वाले हैं, जहां से कंपनियां, पूंजी, तकनीक निकलकर भारत समेत दुनिया के विभिन्न देशों के ग्रोथ में बड़ी भूमिका रखती हैं. यह संरक्षणवाद दुनिया के आर्थिक ढांचे को उलट-पलट सकता है.
तीसरा है मोदी सरकार की दो दर्जन से अधिक स्कीमों का वह परिवार जो दो साल में रोजगार और आय बढ़ोतरी के पैमानों पर कोई असर नहीं छोड़ पाया.
इन तीन संदर्भों में बजट के तीन ग्राहक हैः
एक—वे जो मानते हैं कि नोटबंदी जरूरी थी. अब और उपाय आने चाहिए ताकि काले धन पर रोक लग सके.
दो—वे जो मानते हैं कि नोटबंदी गैर जरूरी थी. इसने अर्थव्यवस्था को मुश्किल में डाल दिया. अब सरकार को मंदी दूर करने को खपत बढ़ाने के इंतजाम करने चाहिए.
तीन—वे जिनको लगता है कि मोदी सरकार को कुछ ठोस सुधार करने चाहिए ताकि बदलते ग्लोबल माहौल में भारत की चमक को बनाए रखा जा सके.
यदि आप नोटबंदी को जरूरी और कामयाब मानते हैं तो आपकी तपस्या का इनाम आयकर रियायतों के चूरन में नहीं बल्कि इन फैसलों में होना चाहिएः
आयकर कानून की धारा 13ए में बदलाव ताकि राजनैतिक चंदों पर सख्ती की जा सके.
नकद लेन-देन व नकद रखने की सीमा का निर्धारण ताकि सब कुछ पहले जैसा न हो जाए.
यदि यह नहीं हुआ तो मान लीजिएगा कि नोटबंदी का त्याग सिर्फ आम लोगों के लिए मुकर्रर था.
यदि आप मानते हैं कि नोटबंदी से फायदा नहीं हुआ तो बजट में इनकी तलाश करनी होगीः
सर्विस टैक्स व दूसरे इनडाइरेक्ट टैक्स की दर में अगली बढ़ोतरी पर रोक ताकि खपत को बढ़ावा मिल सके. जीएसटी के स्वरूप में बुनियादी बदलाव ताकि खपत का बोझ घट सके.
बुनियादी ढांचे में सरकारी निवेश बढ़ाने की ठोस परियोजनाएं. स्कीम राज के अलावा सरकार पांच ऐसी बड़ी परियोजनाएं भी नहीं ला सकी है जिनसे अर्थव्यवस्था में मांग को मदद मिलती हो.
ट्रंप युग की शुरुआत के बाद भारत में विदेशी निवेश कम होने और बाजारों से विदेशी पूंजी लौटने का खतरा जायज है. तो फिर बजट में इन सुधारों को खोज करनी होगीः
बैंकिंग सुधार और वित्तीय क्षेत्र का उदारीकरण—बैंकों के एनपीए में निर्णायक कमी, बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी में कमी, नई प्रतिस्पर्धा का प्रारंभ ताकि बदले हुए माहौल में वित्तीय सेवाओं में इनोवेशन हो सके.
सरकारी कंपनियों का एकमुश्त निजीकरण और शेयर बाजार में लिस्टिंग—इससे सरकार को राजस्व मिलेगा और छोटे निवेशकों को कंपनियों में निवेश का मौका.
वित्तीय निवेश के लिए भरपूर रियायतें—नोटबंदी का मकसद यह होना चाहिए कि लोग सोने-जमीन खरीद से बाहर निकलकर वित्तीय उपकरणों में निवेश करें.
अगले छह माह में रेलवे, कोयला और वित्तीय सेवाओं में नियामक संस्थाओं का गठन.
यदि आप आयकर छूट के चुटकी भर प्रसाद पर रीझ जाना चाहते हैं तो यह जान लीजिए कि 2.86 करोड़ करदाताओं को थोड़ी सी रियायत से न बाजार में मांग बढऩी है, न बचत.
रही बात लोगों के खाते में हर माह कुछ धन (यूनिवर्सल बेसिक इनकम) देने की, तो नीति आयोग के प्रमुख अरविंद पानगढिय़ा ने साफ कह दिया है कि इसके लिए संसाधन नहीं हैं. वैसे, ऐसा कोई प्रयोग करने से पहले सोचना होगा कि भारत तरह-तरह की सब्सिडी से लंदा-फंदा देश है और चुनाव में साइकिल, सोना, बकरी, बर्तन बांटने वाली राजनीति इसका कैसा इस्तेमाल करेगी.
बजट का सिर्फ एक ही पैमाना होना चाहिए कि इसमें रोजगार कितने हैं क्योंकि विकास का पूरा दर्शन इसी पर निर्भर है. ध्यान रखना जरूरी है कि तमाम प्रचार-प्रपंच के बावजूद रोजगार की बात पिछले तीन साल में शुरू नहीं हो सकी है.