मध्य वर्गः ये कैसा सिला दिया!
कभी आर्थिक विकास का इंजन रहा मध्य वर्ग अब महामारी में पिस रहा. बजट 2022 में उसे रत्ती भर भी राहत न मिली.

केंद्रीय बजट 2022 मध्य वर्ग
निर्मला सीतारमण उतनी ही मध्यवर्गीय हैं जितना भारत में कोई मध्यवर्गीय हो सकता है. चेन्नै और तिरुचिरापल्ली से स्कूल की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने तमिलनाडु के सीतालक्ष्मी रामस्वामी कॉलेज से अर्थशास्त्र में बैचलर और फिर जेएनयू से मास्टर्स डिग्री ली. भाजपा प्रवक्ता से मोदी सरकार में बड़े मंत्रालय संभालने तक उनकी तरक्की जितनी भी तेज रही हो, उन्हें भारत के विशाल मध्यवर्गीय खेमे का ही हिस्सा माना जाता है.
वही मध्य वर्ग, जिसमें करीब 38 करोड़ या भारत की कुल आबादी के एक-चौथाई लोग हैं. इस फलते-फूलते मध्य वर्ग को 1991 के सुधारों के बाद भारत के असाधारण आर्थिक उभार के प्रतीक के तौर पर देखा जाता रहा है. पर अब नहीं.
अपने तीसरे साल में चल रही कोविड-19 महामारी की तीखी मार भारत के 'मध्य वर्ग’ ने खास तौर पर झेली है. अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर के अनुमान के मुताबिक, 2020 में मध्य वर्ग की तादाद 3.2 करोड़ लोग कम हो गई. उसका यह भी कहना है कि महामारी के बाद भारत में गरीबों की तादाद के दोगुनी हो जाने का अनुमान है जबकि मध्य वर्ग एक तिहाई घट गया.
कई सर्वे और अध्ययन महामारी की वजह से मध्य वर्ग पर पड़ने वाली आर्थिक मार की पुष्टि करते हैं. प्यू की मानें तो कोविड से उपजी मंदी के चलते भारत में गरीबों—रोज 150 रु. या उससे कम कमाने वाले—की आबादी 7.5 करोड़ बढ़ने का अनुमान है. दुनिया भर में बढ़ी गरीबी का यह करीब 60 फीसदी है.
हालांकि मिडल क्लास की कई परिभाषाएं हैं—अमूमन 10 लाख रु. से 1 करोड़ रु. सालाना कमाने वाले—लेकिन जिधर देखिए, महामारी के जख्मों के निशान साफ दिखाई देते हैं. दिल्ली के 54 वर्षीय संजीव शुक्ल को ही लें. महामारी ने जिस वक्त धावा बोला, कॉर्पोरेट जगत में 30 साल बिता चुके मार्केटिंग प्रोफशनल शुक्ल मुथूट फाइनेंस में चीफ मार्केटिंग ऑफिसर के पद पर सालाना एक करोड़ रुपए कमा रहे थे.
दूसरे तमाम लोगों की तरह शुरुआती महीनों में ही उनकी नौकरी चली गई. नौकरी गंवाने वाले कई दूसरों के मुकाबले हालांकि वे ज्यादा संपन्न हैं (उनकी पत्नी अब भी नौकरी में हैं, 30 साल की बचत, दूसरी संपत्तियां वगैरह भी हैं). पर इस परिवार ने भी बड़ी मार झेली. उन्हें कार बेचनी पड़ी और खर्चों में भारी कटौती करनी पड़ी. अब वे महंगे विश्वविद्यालयों में पढ़ते बच्चों की फीस, औचक इलाज और बुढ़ापे में जरूरी पैसों को लेकर परेशान हैं. बजट 2022 ने शुक्ल को कोई राहत नहीं दी. उन्हें ''आयकर के स्लैब में कुछ बदलाव की उम्मीद थी, उससे मदद मिलती.’’
हालांकि, सीतारमण ने बजट भाषण में भारत की आर्थिक वृद्धि में मध्य वर्ग का योगदान माना, पर बजट में कइयों को अपने लिए उम्मीद दिखाई नहीं देती. 26 वर्षीय यतिन भारद्वाज ने जनवरी 2020 में दिल्ली में जिम खोला था, पर तभी कोविड की वजह से उनकी आकांक्षाओं पर भी लॉकडाउन लग गया. महीनों तक कमाई लॉकडाउन की भेंट चढ़ गई. दो साल बाद भी आधा ही यानी 15,000 रुपए कमा पाते हैं.
ड्राइवर का काम कर रहे उनके पिता की भी नौकरी चली गई. सो उनके कंधों पर मां-बाप समेत चार परिजनों की जिम्मेदारी आ गई. वे कहते हैं, ''मैंने प्रोटीन शेक पीना बंद कर दिया, महीने में 5,000 रुपए उस पर खर्च हो जाते थे. दो साल से अपने लिए एक चीज नहीं खरीदी.’’ भारद्वाज बजट से निराश हैं: ''आमदनी में सीधी सहायता से बहुत मदद मिलती. पैसा नहीं दे सकते तो कम से कम काम तो करने दें. सावधानियों के साथ हमें जिम खोलने दें.’’
शुक्ल और भारद्वाज सरीखे तमाम मध्यवर्गीय लोगों ने अपनी रोजी-रोटी इसी तरह से मटियामेट होते देखी. इस मुश्किल वक्त से उबारने के लिए बजट 2022 उनकी कोई सीधी मदद नहीं करता, चाहे वह प्रत्यक्ष करों में कमी हो या मनरेगा की तर्ज पर शहरी रोजगार गारंटी योजना. जहां तक नौकरियों के वास्तविक नुक्सान की बात है, सीएमआइई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी) के अनुसार, अप्रैल—अगस्त 2020 के बीच करीब 2.1 करोड़ नौकरियां चली गईं.
पिसता-सिकुड़ता मध्य वर्ग
बीते कुछ दशकों के दौरान भारत के मध्य वर्ग का विकास एक असाधारण किस्म की आर्थिक घटना थी. करोड़ों लोग गरीबी से बाहर निकले, आमदनियां बढ़ीं, भारत फोन और गैजेट से लेकर कारों, घरों और इनके बीच आने वाली तमाम उपभोक्ता वस्तुओं का विशाल बाजार बन गया. इस बढ़ती खपत से आर्थिक वृद्धि को उछाल मिला. बढ़ती आमदनी, बढ़ते उपभोग और बढ़ती आर्थिक गतिविधियों का चक्र और मजबूत हुआ.
विशेषज्ञों का कहना है कि आज कोविड के तीसरे साल में चिंता की बात यह है कि अगर मध्य वर्ग सिकुड़ गया, तो खपत भी कम होगी, जो आर्थिक तरक्की का सबसे अहम इंजन है. जितने ज्यादा परिवार मध्य वर्ग से गरीबी में उतरेंगे, भारतीय बाजारों मंस उतने ही कम खरीदार होंगे, कंपनियों की कमाई और तनख्वाहें घटेंगी और आर्थिक वृद्धि के रुझान को नीचे खींचेंगी.
महामारी बहाना बन गई वरना इस समस्या के संकेत पहले से ही थे. अर्थशास्त्री अनिरुद्ध कृष्ण और देवेंद्र बाजपेयी ने आमदनीं की बजाए एसेट का विश्लेषण करते हुए पाया कि भारतीय मध्य वर्ग का विस्तार महामारी के कदम पड़ने से पहले ही धीमा पड़ गया था. 2017-18 के आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित एनएसओ (राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय) की 2019 में लीक हुई एक रिपोर्ट से खपत में चार दशक मंव पहली बार गिरावट का पता चला.
एनएसओ के विश्लेषण के निष्कर्ष के बारे में अब पक्के तौर पर कह पाना मुश्किल है कि 2017 में खपत में गिरावट आई थी या नहीं, फिर भी यह डेटा लंबे वक्त में भारत की आर्थिक वृद्धि की राह तय करने में अहम है. लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर मैत्रीश घटक बताते हैं, ''सामान्य रूप से कहंय तो कोविड ने फिर आमदनी और खपत में गिरावट वाले उसी सिलसिले को मजबूत किया जो शायद 2019 से पहले शुरू हुआ था. बहुत अमीर लोगों को छोड़ दें, जिनकी आमदनी श्रम बाजार से नहीं आती और जिन्हें नौकरी की गारंटी है, तो बाकी 95 फीसद अर्थव्यवस्था पर गिरावट की तगड़ी मार पड़ी है.’’
घटक और राम्या राघवन के एक अध्ययन द कोविड-19 शॉक ऐंड दि इंडियन इकॉनोमी के अनुसार, 2019 और 2020 के बीच भारत की राष्ट्रीय आय सही मायनों में आठ फीसद गिरी. प्रति व्यक्ति के लिहाज से यह गिरावट नौ फीसद थी. स्वतंत्र भारत में, 2020 से पहले भारत की राष्ट्रीय आय में केवल चार बार गिरावट आई—1958, 1966, 1973 और 1980 में. अध्ययन कहता है: 'सबसे बड़ी गिरावट 1980 में (5.3 फीसद) आई, जब देशव्यापी सूखे और ईरान में क्रांति की वजह से तेल के वैश्विक दाम के दोगुने होने के कारण अर्थव्यवस्था में खलबली मची थी.
आशय ये कि 2020-21 आर्थिक सिकुड़न के लिहाज से भारत के इतिहास का बदतरीन साल है.’ प्यू रिसर्च सेंटर के अध्ययन में महामारी के बाद भारत में गरीबों की संख्या दोगुने से ज्यादा होने और मध्य वर्ग में एक-तिहाई कटौती का अनुमान है. अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट के शोधकर्ताओं ने 12 भारतीय राज्यों में मध्य-अप्रैल और मध्य-मई 2020 के बीच स्वनियोजित, अनियत और नियमित दिहाड़ी कामगारों पर एक अध्ययन किया.
2020 के इस अध्ययन ने आमदनी में 64 फीसद गिरावट बताई. दिसंबर 2020 और जनवरी 2021 के बीच किए गए एक और दिल्ली-एनसीआर कोरोनावायरस टेलीफोन सर्वे (एनसीएईआर 2021) ने बताया कि 80 फीसद उत्तरदाताओं ने आर्थिक दुश्वारियों का जिक्र किया, जिनमें वेतन कटौती, नौकरी जाना, काम ढूंढ़ने में मुश्किल, कारोबार ठप होना या कारोबारी आमदनी में गिरावट शामिल थीं. वेतनभोगी कर्मचारियों और छोटे कारोबार मालिकों पर सबसे बुरी मार पड़ी.
पंक्चर होते पहिए
दोपहिया वाहनों की बिक्री में गिरावट एक और इशारा है. सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (एसआइएएम या सियाम) के मुताबिक, वित्त वर्ष ’21 की तीसरी तिमाही में 49 लाख दुपहिए बिके थे जबकि वित्त वर्ष 2022 की तीसरी तिमाही में 36 लाख ही दुपहिए बिके.
एमबीए डिग्रीधारी 30 वर्षीय टी. मोहम्मद की मिसाल लें, जो बताती है कि मांग क्यों गिर रही है. बिहार के एक मध्य वर्गीय परिवार में जन्मे मोहम्मद 15 बरस की उम्र से दिल्ली में रह रहे हैं. 2014 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एमबीए करने के बाद वे पहले कंसल्टेंट के तौर पर प्राइस वाटर हाउस कूपर्स से जुड़े और फिर ईवाइ इंडिया में आ गए. महामारी ने जिस वक्त धावा बोला, वे नई नौकरी में जाने की प्रक्रिया में थे.
लगातार बिगड़ते हालात के चलते कंपनी ने पेशकश वापस ले ली और आर्थिक तौर पर वे मुश्किल में आ फंसे. तब से वे दर्जन भर इंटरव्यू दे चुके हैं लेकिन नौकरी नहीं मिली. बेरोजगार हुए दो साल हो गए, बचत खर्च हो चुकी है. बाइक उन्होंने 11,000 रुपए में बेची और कार लोन तथा पर्सलन लोन चुकाने के लिए हाथ-पैर मारे. वे कहते हैं, ''आमदनी है नहीं, मैंने 17 महीनों से पर्सलन लोन की ईएमआइ नहीं चुकाई है.’’ पीएफ की बचत से उन्होंने कार लोन चुका दिया और मकान मालिक इतने रहमदिल निकले कि दो साल से उनसे किराया नहीं ले रहे हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि दुपहिया वाहनों की बिक्री में गिरावट आर्थिक विश्वास में कमी की तरफ इशारा करती है. यह दिखाती है कि उपभोक्ता ऑटो लोन चुकाने के अनिच्छुक या असमर्थ हैं. बीते दो साल में रिजर्व बैंक की कम ब्याज दर की नीति का इस श्रेणी पर कम ही असर पड़े होने का अनुमान है. दुपहिया वाहनों की बिक्री में गिरावट 2018 में शिखर पर पहुंचने के बाद आई, जब मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने के लिए नोटबंदी, जीएसटी की शुरुआत वगैरह के जरिए सर्जरी शुरू की थी.
यह तथ्य बताता है कि उस कोशिश को कामयाब बनाने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है. जब ढांचागत बदलावों से गुजर रही अर्थव्यवस्था को महामारी से होने वाले नुक्सान की बात आती है, तो जेपी मॉर्गन में इमर्जिंग मार्केट इकॉनोमीज के प्रमुख जहांगीर अजीज कहते हैं, ''महामारी से नुक्सान का जो स्थायी निशान पड़ेगा, वह परिवारों और छोटे तथा मझोले उद्योगों की बैलेंस शीट को होने वाला व्यापक नुक्सान है. गरीब ही नहीं, इन तबकों को हुआ नुक्सान भविष्य में भारत की वृद्धि के लिए सबसे बड़ा खतरा है.’’
दिल्ली की 36 वर्षीया साक्षी चानना, जो कम्युनिकेशंस प्रोफेशनल के तौर पर 10 साल बिता चुकी हैं, बैलेंस शीट को हुए इस नुक्सान की मिसाल हैं. महामारी शुरू होने पर ई-टेलर कूव्ज की उनकी नौकरी चली गई. दूसरी नौकरी का ऑफर मिला ही था कि महामारी से हालात बिगड़ने पर वह भी वापस ले लिया गया. वे कहती हैं, ''मुझे नहीं पता, मेरा करियर किधर जा रहा है.’’
नौकरी गंवाने के बाद पहले छह महीने उन्होंने बचत और एफडी वगैरह से जिंदगी चलाई. मकान मालिक ने किराया बढ़ाने का फैसला किया तो कैलाश कॉलोनी में मम्मी-पापा के घर लौट आईं. वे बताती हैं कि पीएफ खाता ही उनका अकेला निवेश है जो बचा हुआ है. ''बचत का बड़ा हिस्सा मैं गंवा चुकी हूं, एफडी मुझे फिर से बनानी पड़ेंगी, मेरा करियर पटरी से उतर गया है. मैं अपनी मानसिक सेहत को लेकर फिक्रमंद हूं.’’
नुस्खे नीतियों के
मध्य वर्ग को सहारा देने के लिए अजीज और घटक सरीखे विशेषज्ञ सबसे ज्यादा संकट में फंसे लोगों की आमदनी में सीधे मदद की सिफारिश करते हैं. कुछ दूसरे लोग—और सरकार—बुनियादी ढांचे पर ज्यादा खर्च करने की दलील देते हैं ताकि उसका प्रभाव छलककर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़े. विशेषज्ञों का कहना है कि कर चुकाने की अवधि में मोहलत, कर राहत या इस तरह की नीतिगत सहायता से मदद मिलेगी, उपभोक्ताओं के हाथ में कुछ ज्यादा नकदी होगी.
कुछ विशेषज्ञ आमदनी में सीधी सहायता के लिए 'शहरी मनरेगा’ का सुझाव देते हैं. मगर केंद्रीय बजट ने अर्थव्यवस्था को लेकर दीर्घकालिक नजरिया अपनाया. इस प्रक्रिया में उन लाखों लोगों की फौरी तकलीफ को दरकिनार कर दिया गया है जो भारत के मध्य वर्ग का निर्माण करते हैं—जो मांग में तेजी लाते हैं, खपत को रफ्तार देते हैं और कर चुकाते हैं.
लोगों और एमएसएमई को सलाह देने वाली चार्टर्ड अकाउंटेंसी एसपी कपूर ऐंड कंपनी के सीईओ संजीव शिव कपूर कहते हैं: ''मध्य वर्ग के लिए मुझे (बजट में) कुछ दिखाई नहीं देता. कर दरों में कोई फायदा या बदलाव नहीं है. बल्कि सरकार ने तो 50,000 रुपए से ज्यादा के तोहफों पर अब एक फीसद टीडीएस लगा दिया है.’’
उम्मीद के मुताबिक जब विपक्ष ने मध्य वर्ग के लिए बजट में कुछ न होने को लेकर सरकार से सवाल किए, तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पलटकर कहा, ''क्या किसानों, एमएसएमई, सस्ते घर के खरीदारों में मध्य वर्ग का हिस्सा नहीं है?
हम उनके लिए राहत उपाय लेकर आए. मध्य वर्ग का क्या मतलब है? मध्यवर्गीय किसानों के लिए योजनाएं लाई गई हैं. सस्ते घरों से मध्य वर्ग को फायदा मिलेगा. शेयरों में पैसा लगाने वाले लोगों को फायदा मिलेगा, वे भी तो मध्य वर्ग हैं.’’
पर कई लोगों का मानना है कि वित्त मंत्री को और भी बहुत करना होगा, ताकि मध्य वर्ग को यकीन दिला सकें कि वह जल्द ही फिर खुशहाली के रास्ते पर होगा.ठ्ठ
संजीव शुक्ल , 54 वर्ष
औचक झटका महामारी से पहले संजीव मुथूट फाइनेंस में एक करोड़ रु. सालाना पा रहे थे. शुरू के महीनों में ही नौकरी चली गई. उसके बाद उनके लिए वैसी नौकरी मिल पाना मुहाल हो गया
साक्षी चानना, 36 वर्ष
चुक गया सब कुछ महामारी के शुरुआती महीनों में ही कूव्स में अपनी नौकरी खो देने के बाद चानना ने आत्मनिर्भर बने रहने की बड़ी कोशिश की. पर अंत में बचत चुक जाने पर मजबूर होकर मम्मी-पापा के पास आना पड़ा.
''अपनी बचत का बड़ा हिस्सा मैंने खर्च कर डाला. अपनी एफडी मुझे फिर से बनवानी पड़ेगी. और मेरे करिअर का तो इस समय बाजा ही बज गया है’’
लोग कम हो गए, मध्य वर्ग के कुल आकार से. प्यू रिसर्च का आकलन
इंद्रनील भौमिक , 42 वर्ष
छा गया अंधेरा फोटो-जर्नलिस्ट भौमिक की 2020 में 80 फीसद आय चली गई. वे कहते हैं, ''शुरू के आठ महीने तो मैं कुछ भी न कर सका. कोई काम ही नहीं था तो मैं करता भी तो क्या?’’
''दो साल तक मैंने जागते हुए रातें काटी है’’
2.1 करोड़
नौकरियां गई अप्रैल-अगस्त 2020 में. सीएमआइई का अनुमान
यतिन भारद्वाज, 26 वर्ष
बंद हुए दरवाजे जनवरी 2020 में अपनी बचत लगाकर भारद्वाज ने एक फिटनेस स्टूडियो खोला था. दो महीने बाद देश भर में लॉकडाउन लग जाने पर उनकी आमदनी ठप हो गई. अब किसी तरह 15,000 रुपए महीने की कमाई शुरू हुई है. उन्हें चार लोगों का परिवार संभालना पड़ता है, जिनमें उनके मम्मी-पापा और बहन शामिल हैं.
''मैंने प्रोटीन शेक पीना छोड़ दिया क्योंकिह उस पर 5,000 रुपए महीने जाते थे. पिछले दो साल में अपने लिए मैंने कुछ भी नहीं खरीदा है’’