चुनावी हलचल-विरोधी साझेदार
भाजपा गठबंधन में बड़ी सहयोगी हो गई है, तो शिवसेना को अपने बागी नेताओं से निपटना पड़ रहा.

अकेले चुनाव लडऩे के अपने पूर्व के प्रस्ताव को दरकिनार करते हुए शिवसेना ने आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा के साथ हाथ मिलाने का फैसला लिया. इसके कुछ ही दिनों बाद दोनों दलों के बीच दरार फिर से उभरकर सामने आने लगी. शिवसेना नेता तथा पशुपालन और मत्स्य पालन राज्यमंत्री अर्जुन खोतकर ने घोषणा की है कि वे जालना लोकसभा सीट से वहां से सांसद और महाराष्ट्र भाजपा अध्यक्ष रावसाहेब दानवे के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे. खोतकर जालना से तीन बार विधायक रहे हैं, वहीं पिछले लोकसभा चुनाव में दानवे ने चैथी बार यह सीट जीती थी.
खोतकर ने ऐसे समय में यह घोषणा की जब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा है कि उनकी पार्टी सभी मतभेदों को दरकिनार करते हुए भाजपा के साथ मिलकर काम करेगी. दानवे के साथ खोतकर की दुश्मनी जगजाहिर है, पिछले दो वर्षों से वे भाजपा नेता को उनके गढ़ में पटखनी देने के लिए लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं. स्पष्ट रूप से, यहां लड़ाई व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की है.
लेकिन दानवे और खोतकर की लड़ाई कोई इकलौता मामला नहीं है. ठाणे में, 22 भाजपा पार्षदों ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस को पत्र लिखकर शिवसेना के सांसद राजन विचारे की उम्मीदवारी का विरोध किया है. हालांकि, एक सूत्र का कहना है कि इस विद्रोह को शिवसेना नेता और पीडब्ल्यूडी मंत्री एकनाथ शिंदे ने हवा दी है. शिंदे विचारे की जगह अपने बेटे श्रीकांत, जो वर्तमान में कल्याण से सांसद हैं, को ठाणे सीट से चुनाव लड़ाना चाहते हैं. वहीं औरंगाबाद में, स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं ने शिवसेना सांसद चंद्रकांत खैरे के लिए काम करने को लेकर अपनी अनिच्छा और परेशानियों से पार्टी को अवगत करा दिया है.
चंद्रपुर में शिवसेना के विधायक सुरेश धनोरकर ने घोषणा की है कि अगर केंद्रीय मंत्री हंसराज अहीर को टिकट दिया गया तो वे भाजपा के खिलाफ काम करेंगे. वहीं, मुंबई नॉर्थ-ईस्ट सीट पर भाजपा सांसद किरीट सोमैया को शिवसेना कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है.
1989 से दोनों दल एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं और शिवसेना ने राज्य में कई वर्षों तक गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका निभाई है.
पर 2014 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के सत्ता में आने के बाद शिवसेना उसकी कड़ी आलोचना करने लगी थी. एक शिवसेना नेता का कहना है कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता भाजपा को गठबंधन पर हावी होने देने के मूड में नहीं हैं.
दोनों दलों का वरिष्ठ नेतृत्व अपने-अपने कैडर और स्थानीय नेताओं के बीच मतभेद को पाटने की भरसक कोशिशें कर रहा है. उदाहरण के लिए, उद्धव ने कैडरों को चेतावनी दी है कि जहां कहीं भी गठबंधन में आपसी झगड़े नजर आएंगे, पार्टी उन सीटों पर चुनाव ही नहीं लड़ेगी.
दानवे ने अपनी ओर से इस झगड़े को खत्म करने की पहल करते हुए भाजपा में खोतकर के करीबी मित्र और राज्य के सहकारिता मंत्री सुभाष देशमुख से कहा है कि वे खोतकर को मनाएं. बाद में, खोतकर ने भी कहा था कि वे अपनी पार्टी अध्यक्ष के फैसले का सम्मान करेंगे.
राहुल शेवाले (शिवसेना) और पूनम महाजन (भाजपा) जैसे सांसद भी हैं, जिन्हें इस बात का पूरा यकीन है कि उन्हें दोनों दलों के कार्यकर्ताओं का भरपूर समर्थन मिलेगा. इस रस्साकशी पर आबकारी मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले कहते हैं, 'मुझे इन विवादों की कोई वजह नहीं दिखती.''शिवसेना-भाजपा गठबंधन में पहले शिवसेना हावी रहती थी. अब शिवसेना के नेता नहीं चाहते कि भाजपा गठबंधन में हावी हो.
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