महाराष्ट्र: उपज भरपूर, फिर भी सपने चूरचूर
भरपूर पैदावार के बावजूद महाराष्ट्र के किसान दाने-दाने को मोहताज. उपज के कम दाम मिलने से जेबें खाली.

हौशीराम माटोले पुणे के पास कौठाड़ी गांव स्थित अनार के अपने खेत में
महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के राहुरी में कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी) के गोदाम का चप्पा-चप्पा प्याज के बोरों से अटा पड़ा है. गर्व से भरे किसान कहते हैं कि इस साल ''बंपर" फसल हुई, पर उनकी आवाज में वह लाचारगी भी झलकती है जो उनकी उपज के कम दाम मिलने से पैदा हुई है. पिछले साल किसानों ने औसतन 18 रुपए प्रति किलो कीमत में प्याज बेचा था. इस साल इसकी कीमत घटकर 5 रुपए प्रति किलो पर आ गई (इसमें प्याज पर सरकार से मिलने वाली 1 रुपए प्रति किलो की सब्सिडी और जोड़ लें).
पारनेर के किसान राजेंद्र रोकड़े 20 क्विंटल प्याज 68 किमी दूर राहुरी लेकर आए, महज इसलिए कि यहां उन्हें दूसरी मंडी समितियों (6.50 रुपए प्रति किलो) की बनिस्बत 50 पैसे प्रति किलो ज्यादा दाम मिल रहे थे. इतनी मेहनत के बाद भी उन्होंने फकत 1,000 रुपए ज्यादा कमाए. कंधे झटकते हुए वे कहते हैं, ''50 पैसे ज्यादा मिलें तभी मैं अपने परिवार के लिए किराने का सामान खरीद सकता हूं. खर्चे चलाना भी मुश्किल होता जा रहा है."
रोकड़े किसानों के उस तबके की नुमाइंदगी करते हैं जो इस साल मुश्किल में फंसेे हैं. इंद्र्र देवता ने तो उन पर खासी मेहरबानी की, पर सरकारी व्यवस्था ने उसे बेकार कर दिया. महाराष्ट्र में कृषि क्षेत्र ने पिछले पांच साल में सबसे ज्यादा 12.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की है. पिछले साल 110 फीसदी बारिश और उसकी वजह से अनुकूल माहौल के चलते तुअर, सोयाबीन, प्याज और ज्वार सरीखी पारंपरिक फसलों की उपज में बेमिसाल बढ़ोतरी हुई है.
इस साल 1.17 करोड़ क्विंटल तुअर पैदा हुई, जबकि पिछले साल 50 लाख क्विंटल ही हुई थी. मगर कीमतों में जबरदस्त गिरावट की वजह से किसानों की जेबें एक बार फिर खाली ही रह गईं. उन्हें निजी व्यापारियों को 3,700 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से तुअर बेचनी पड़ रही है, क्योंकि सरकारी केंद्रों पर 5,050 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से तुअर खरीदी जरूर जाती है, पर वहां खरीद में कम से कम एक हफ्ते का वक्त लग जाता है.
विपक्ष देवेंद्र फडऩवीस की अगुआई वाली सरकार पर किसानों की कर्ज माफी का ऐलान करने के लिए दबाव डाल रहा है. मगर खुद किसानों को भी लगता है कि कर्ज माफी से महज फौरी राहत ही मिलेगी, यह स्थायी समाधान नहीं है. अपनी प्याज की फसल बेचने राहुरी आए विलास सागरे कर्ज माफी की तुलना भीख मांगने से करते हैं. वे कहते हैं कि इसकी बजाए सरकार को हरेक फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का ऐलान करना चाहिए.
जिला सहकारी बैंक से 1.25 लाख रुपए का कर्ज लेने वाले सागरे कहते हैं, ''हमें खैरात नहीं, बाजार में अच्छी कीमत चाहिए. अगर हम 20 फीसदी मुनाफा भी कमा लें तो हमें किसी भी बैंक से कर्ज लेने की जरूरत नहीं होगी."
जहां बारिश नाकाफी हुई, वहां तो किसान और भी ज्यादा दुखी हैं. पुणे में बारामती के नजदीक कौठाड़ी गांव में किसान हौशीराम माटोले अपनी अनार की सूख चुकी फसल की तरफ उंगली उठाकर इशारा करते हैं. पांच एकड़ के अपने खेत में उन्होंने 7.5 लाख रुपए लगाए थे और अब तक बस 80,000 रुपए कमाए हैं. वे कहते हैं, ''अगर सरकार कर्ज माफ कर देती है तो पिछली बार की तरह इस बार मैं इससे इनकार नहीं करूंगा. मगर केवल कर्ज माफी से मदद नहीं मिलेगी. हमें आगे खेतों में लगाने के लिए नकद रकम की भी जरूरत है.
और वह हम तभी कमा सकते हैं जब हमें अपनी उपज के बेहतर दाम मिलें. कोई भी कड़ी मेहनत करने वाला किसान कर्ज माफी के लिए सरकार के आगे हाथ नहीं फैलाएगा." दिलचस्प बात यह है कि माटोले ने 2008 में सरकार की कर्ज माफी के बाद भी 9 लाख रुपए का एक कर्ज चुकाया था. वे कहते हैं, ''उस समय बाजार अच्छा था तो मैंने चुका दिया."
नजदीक के जितेगांव के समाधान मिरगल हालांकि कर्ज माफी के हक में हैं. उनके ऊपर 1.5 लाख रुपए का कर्ज है. यह उन्होंने अपने पांच एकड़ के खेत में ड्रिप सिंचाई की पाइप बिछाने के लिए लिया था. बारिश नाकाफी होने की वजह से केवल ज्वार बो पाए. कीमतें 1,800 रु. से घटकर 1,200 रु. प्रति क्विंटल पर आ गईं. मिरगल कहते हैं, ''अगर मैंने कोई और नकदी फसल बोई होती तो मैं कहता कि मुझे कर्ज माफी की जरूरत नहीं है. मगर अब मैं कर्ज भला कैसे चुकाऊं?"
उत्तर प्रदेश सरकार की किसानों की कर्ज माफी के बाद यह बहस अब और तीखी हो गई है. महाराष्ट्र की भाजपा सरकार कर्ज माफ नहीं करने के अपने रुख पर अड़ी है, तो नगर निकायों के चुनाव में सफाए के बाद बैकफुट पर आ चुके विपक्ष ने अपनी खोई जमीन फिर हासिल करने की गरज से इसे मुद्दा बना दिया है. कांग्रेस और एनसीपी ने इस मुद्दे को लेकर छह दिनों तक रैलियां निकालीं. आंदोलन का दूसरा चरण 15 अप्रैल से शुरू हुआ.
फडऩवीस का कहना है कि कर्ज माफी इस मसले का कोई हल नहीं है. वे कहते हैं कि सरकार वादे के मुताबिक किसानों को पानी और बिजली की सुरक्षा मुहैया करवाएगी ताकि वे अपनी फसलों की पैदावार बढ़ा सकें. उनके शब्दों में, ''हम ऐसी व्यवस्था बना रहे हैं जिसमें कर्ज किसानों को बोझ नहीं लगेगा." वे यह भी जोड़ते हैं कि इस क्षेत्र में सरकार के ''निवेशों" का फायदा तकरीबन पांच साल में मिलने लगेगा. मुख्यमंत्री फडऩवीस बताते हैं कि कर्ज माफी का फायदा किसानों से ज्यादा जिला सहकारी बैंकों को होता है. उनके मुताबिक, ''यह बात पिछली बार भी हमारे ध्यान में आई थी. कर्ज माफी का हमारा फैसला अलग-अलग मामलों के आधार पर होगा."
फडऩवीस की बात में दम है. राज्य के तकरीबन 90 फीसदी किसानों के खाते जिला सहकारी बैंकों में हैं. उस्मानाबाद जिला बैंक के प्रशासन ने फसल बीमा रकम की अदायगी के लिए केंद्र से मिले 10 करोड़ रुपए में से 4 करोड़ रु. का ''दुरुपयोग" किया. बैंक ने यह रकम किसानों को बांटने की बजाए ब्याज कमाने में लगा दी. राज्य के वित्त मंत्री सुधीर मुनगंटीवार कर्ज की रकम सीधे किसानों के खातों में जमा किए जाने के हक में हैं.
तमाम जूतमपैजार से दूर पुणतांबा के ग्रामीणों ने एक अनोखा फैसला लिया. ग्राम सभा ने 1 जून से किसानों की हड़ताल का आह्वान किया है. राज्य की बेरुखी के खिलाफ विरोध जताते हुए वे अपनी उपज नहीं बेचेंगे. यह आंदोलन अब चार दूसरे तालुकों—वैजापुर, कोपरगांव, राहता और राहुरी—तक फैल गया है.
किसान नेता धनंजय जाधव कहते हैं कि राज्य के दूसरे इलाकों में भी इस आंदोलन को फैलाने का इरादा है. वे दलील देते हैं कि किसानों की बदहाली पर तब तक गौर नहीं किया जाएगा जब तक शहरों में दूध और दूसरी जरूरी चीजों की कमी पैदा नहीं होगी. भाजपा के कार्यकर्ता जाधव कहते हैं, ''अगर हम 40 फीसदी सप्लाई भी काट देते हैं तो हम इसे अपनी कामयाबी मानेंगे."
जाधव मानते हैं कि अतिरिक्त उपज किसानों के लिए अभिशाप है. उनके शब्दों में, ''हमें अच्छे दाम तभी मिलते हैं, जब कमी होती है. जब कमी पैदा कर दी जाएगी तो सरकार घुटनों पर आ जाएगी." हर कोई किसानों की मांग से इत्तेफाक रखता और इसे जायज बताता है कि एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें वे मुनाफा कमा सकें. सभी की नजरें फडऩवीस सरकार पर हैं कि वह इस पेचीदा पहेली को कैसे सुलझाती है.
पारनेर के किसान राजेंद्र रोकड़े 20 क्विंटल प्याज 68 किमी दूर राहुरी लेकर आए, महज इसलिए कि यहां उन्हें दूसरी मंडी समितियों (6.50 रुपए प्रति किलो) की बनिस्बत 50 पैसे प्रति किलो ज्यादा दाम मिल रहे थे. इतनी मेहनत के बाद भी उन्होंने फकत 1,000 रुपए ज्यादा कमाए. कंधे झटकते हुए वे कहते हैं, ''50 पैसे ज्यादा मिलें तभी मैं अपने परिवार के लिए किराने का सामान खरीद सकता हूं. खर्चे चलाना भी मुश्किल होता जा रहा है."
इस साल 1.17 करोड़ क्विंटल तुअर पैदा हुई, जबकि पिछले साल 50 लाख क्विंटल ही हुई थी. मगर कीमतों में जबरदस्त गिरावट की वजह से किसानों की जेबें एक बार फिर खाली ही रह गईं. उन्हें निजी व्यापारियों को 3,700 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से तुअर बेचनी पड़ रही है, क्योंकि सरकारी केंद्रों पर 5,050 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से तुअर खरीदी जरूर जाती है, पर वहां खरीद में कम से कम एक हफ्ते का वक्त लग जाता है.
विपक्ष देवेंद्र फडऩवीस की अगुआई वाली सरकार पर किसानों की कर्ज माफी का ऐलान करने के लिए दबाव डाल रहा है. मगर खुद किसानों को भी लगता है कि कर्ज माफी से महज फौरी राहत ही मिलेगी, यह स्थायी समाधान नहीं है. अपनी प्याज की फसल बेचने राहुरी आए विलास सागरे कर्ज माफी की तुलना भीख मांगने से करते हैं. वे कहते हैं कि इसकी बजाए सरकार को हरेक फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का ऐलान करना चाहिए.
जिला सहकारी बैंक से 1.25 लाख रुपए का कर्ज लेने वाले सागरे कहते हैं, ''हमें खैरात नहीं, बाजार में अच्छी कीमत चाहिए. अगर हम 20 फीसदी मुनाफा भी कमा लें तो हमें किसी भी बैंक से कर्ज लेने की जरूरत नहीं होगी."
और वह हम तभी कमा सकते हैं जब हमें अपनी उपज के बेहतर दाम मिलें. कोई भी कड़ी मेहनत करने वाला किसान कर्ज माफी के लिए सरकार के आगे हाथ नहीं फैलाएगा." दिलचस्प बात यह है कि माटोले ने 2008 में सरकार की कर्ज माफी के बाद भी 9 लाख रुपए का एक कर्ज चुकाया था. वे कहते हैं, ''उस समय बाजार अच्छा था तो मैंने चुका दिया."
नजदीक के जितेगांव के समाधान मिरगल हालांकि कर्ज माफी के हक में हैं. उनके ऊपर 1.5 लाख रुपए का कर्ज है. यह उन्होंने अपने पांच एकड़ के खेत में ड्रिप सिंचाई की पाइप बिछाने के लिए लिया था. बारिश नाकाफी होने की वजह से केवल ज्वार बो पाए. कीमतें 1,800 रु. से घटकर 1,200 रु. प्रति क्विंटल पर आ गईं. मिरगल कहते हैं, ''अगर मैंने कोई और नकदी फसल बोई होती तो मैं कहता कि मुझे कर्ज माफी की जरूरत नहीं है. मगर अब मैं कर्ज भला कैसे चुकाऊं?"
उत्तर प्रदेश सरकार की किसानों की कर्ज माफी के बाद यह बहस अब और तीखी हो गई है. महाराष्ट्र की भाजपा सरकार कर्ज माफ नहीं करने के अपने रुख पर अड़ी है, तो नगर निकायों के चुनाव में सफाए के बाद बैकफुट पर आ चुके विपक्ष ने अपनी खोई जमीन फिर हासिल करने की गरज से इसे मुद्दा बना दिया है. कांग्रेस और एनसीपी ने इस मुद्दे को लेकर छह दिनों तक रैलियां निकालीं. आंदोलन का दूसरा चरण 15 अप्रैल से शुरू हुआ.
फडऩवीस की बात में दम है. राज्य के तकरीबन 90 फीसदी किसानों के खाते जिला सहकारी बैंकों में हैं. उस्मानाबाद जिला बैंक के प्रशासन ने फसल बीमा रकम की अदायगी के लिए केंद्र से मिले 10 करोड़ रुपए में से 4 करोड़ रु. का ''दुरुपयोग" किया. बैंक ने यह रकम किसानों को बांटने की बजाए ब्याज कमाने में लगा दी. राज्य के वित्त मंत्री सुधीर मुनगंटीवार कर्ज की रकम सीधे किसानों के खातों में जमा किए जाने के हक में हैं.
तमाम जूतमपैजार से दूर पुणतांबा के ग्रामीणों ने एक अनोखा फैसला लिया. ग्राम सभा ने 1 जून से किसानों की हड़ताल का आह्वान किया है. राज्य की बेरुखी के खिलाफ विरोध जताते हुए वे अपनी उपज नहीं बेचेंगे. यह आंदोलन अब चार दूसरे तालुकों—वैजापुर, कोपरगांव, राहता और राहुरी—तक फैल गया है.
किसान नेता धनंजय जाधव कहते हैं कि राज्य के दूसरे इलाकों में भी इस आंदोलन को फैलाने का इरादा है. वे दलील देते हैं कि किसानों की बदहाली पर तब तक गौर नहीं किया जाएगा जब तक शहरों में दूध और दूसरी जरूरी चीजों की कमी पैदा नहीं होगी. भाजपा के कार्यकर्ता जाधव कहते हैं, ''अगर हम 40 फीसदी सप्लाई भी काट देते हैं तो हम इसे अपनी कामयाबी मानेंगे."
जाधव मानते हैं कि अतिरिक्त उपज किसानों के लिए अभिशाप है. उनके शब्दों में, ''हमें अच्छे दाम तभी मिलते हैं, जब कमी होती है. जब कमी पैदा कर दी जाएगी तो सरकार घुटनों पर आ जाएगी." हर कोई किसानों की मांग से इत्तेफाक रखता और इसे जायज बताता है कि एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें वे मुनाफा कमा सकें. सभी की नजरें फडऩवीस सरकार पर हैं कि वह इस पेचीदा पहेली को कैसे सुलझाती है.