कमल संदेश: वैचारिक संवाद तंत्र पर जोर
पार्टी के प्रकाशन माध्यमों को दुरुस्त कर बीजेपी सदस्यों को बौद्धिकता से लैस करने के लिए शाह ने बनाई दीर्घकालिक नीति.

अगर हमारे यहां पढऩे-लिखने का काम बंद होगा तो बीजेपी भी कांग्रेस हो जाएगी." बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी के पुस्तकालय निर्माण और प्रकाशन से जुड़ी बैठकों में की गई अपनी इस टिप्पणी को मूर्त रूप देना शुरू कर दिया है. अब तक पार्टी में प्रकाशन विभाग को उपेक्षित और वोट के लिए काम न आने वाले अंग के तौर पर देखा गया. लेकिन शाह ने इसे दीर्घकालिक रणनीति के तहत पुनरोद्धार करने की मुहिम-सी छेड़ी है. 6 दिसंबर को उन्होंने प्रकाशन प्रमुखों की राष्ट्रीय बैठक में पार्टी के मुखपत्र कमल संदेश को नए कलेवर में लॉन्च किया तो प्रकाशन विभाग को फंड या किसी अन्य प्रकार की कठिनाई को दूर करने की जिम्मेदारी सीधे राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल को सौंप दी.
बीजेपी ने कमल संदेश समेत सभी पत्रिकाओं की सदस्यता का लक्ष्य पार्टी के कुल 11 करोड़ सदस्यों का 5 फीसदी रखा है. यानी पार्टी 50 लाख लोगों तक इसे पहुंचाना चाहती है. लेकिन यहां दिलचस्प तथ्य यह भी है कि पार्टी अपने महासंपर्क अभियान में करीब-करीब इतने ही सदस्यों को जमीन पर ढूंढ पाई थी. बीजेपी को अपने इस लक्ष्य में सदस्यों को ढूंढने के अलावा फंड की समस्या भी है. सभी सक्रिय सदस्य स्वाभाविक रूप से पत्रिका के भी ग्राहक होते हैं और उसका शुल्क देना पड़ता है. इसलिए पार्टी ने अब विज्ञापन लेने की छूट दे दी है. साथ ही शाह यह भी निर्देश दे चुके हैं कि इसे पार्टी की पत्रिका बनाया जाए, किसी सरकार या नेता का नहीं. शाह इसे बौद्धिक प्रशिक्षण का सशक्त माध्यम तो मानते हैं, लेकिन यह भी तथ्य है कि व्यक्ति पूजा की महत्ता जिस तरह से पार्टी में बढ़ी है उससे पेशेवर अंदाज में स्वतंत्र वैचारिक तंत्र खड़ा करना आसान नहीं है.