लोग चाहते हैं जैसा चल रहा था वैसा चलता रहेः हसमुख अधिया
कई सारे कर इसमें सम्मिलित कर लिए गए हैं पर कोई उन्हें उनके सरलीकरण को आसान बनाने की नहीं सोच रहा.

लागू होने के तीन माह बाद माल व सेवा कर लागू करने की सारी जिम्मेदारी संभाले राजस्व सचिव हसमुख अधिया का कहना है कि नई कर व्यवस्था के इर्दगिर्द नकारात्मकता का माहौल है. कई छोटे कारोबारी अब तक कर से बचते रहे पर अब इसके दायरे में आ गए हैं. इंडिया टुडे की वरिष्ठ संपादक श्वेता पुंज से उनकी बातचीत के अंशः
1 जुलाई को लागू होने के बाद से जीएसटी को लेकर क्या चुनौतियां और सबक सामने आए हैं?
जीएसटी नए नियमों के साथ एक नया कानून है, ये सभी के लिए नया है. लोगों को इसे समझाना और स्वीकार कराना बड़ी चुनौती है. कर क्षेत्र के लोगों के सीखने को बहुत है. आम लोगों को इससे कोई मतलब नहीं है क्योंकि उनकी कर दरों में खास बदलाव नहीं आया है.
किन खास क्षेत्रों को लेकर करदाताओं में भ्रांतियां हैं?
एक प्रमुख प्रावधान रिवर्स चार्जिंग का है. लोगों को अभी वह समझ में नहीं आया है इसलिए हमने छह महीने के लिए स्थगित कर दिया है. प्रावधान यह कहता है कि अगर कोई पंजीकृत व्यक्ति कोई सामान (रोजाना 5,000 रुपए से ज्यादा मूल्य का) किसी गैर-पंजीकृत व्यक्ति से खरीदता है तो कर अदा करने की जिम्मेदारी पंजीकृत व्यक्ति पर होगी. इसमें कोई अतिरिक्त कर बोझ नहीं है और अनुपालन का बोझ भी बहुत मामूली है. ऐसे मामलों में हर व्यक्ति को किसी गैर-पंजीकृत डीलर से तमाम सारी खरीद के लिए एक ही इनवॉयस बनानी पड़ती और उसे रिटर्न दाखिल करते हुए इनपुट कर क्रेडिट के साथ ही बाहरी देनदारी में दिखाना पड़ता. उसे कोई अतिरिक्त कर नहीं देना पड़ता.
जीएसटी क्या महंगाई बढ़ाने वाला है?
हम नहीं समझते कि कीमतों में तेजी कोई मुद्दा है. लोग दो खास क्षेत्रों को लेकर शिकायतें कर रहे हैं. एक है रेस्तरां—लोग शिकायत कर रहे हैं कि कर तो लगा दिया गया है लेकिन मेनू में कीमतें नहीं घटी हैं. रेस्तरां समूचा कर वसूल कर ले रहे हैं, जो ठीक नहीं है. दूसरा क्षेत्र रियल स्टेट का है. हालांकि उन्हें इनपुट टैक्स क्रेडिट मिलेगा लेकिन कंपनियां सारा कर बोझ उपभोक्ताओं पर लाद दे रही हैं. हमने राज्यों में कमेटियां बनाई हैं जहां लोग इस तरह के मामलों को एंटी प्रॉफिटयरिंग एजेंसी के सामने उठा सकते हैं. केंद्रीय उत्पाद के आयुक्त से भी शिकायत कर सकते हैं.
इस बात को लेकर चिंता है कि अनेक दरों और अनुपालन की वजह से जीएसटी की अवधारणा ही दरअसल खामी वाली है?
कोई खामी नहीं है. पहले हमारे यहां केंद्रीय और राज्य स्तर पर कई कर स्लैब थे. कई सारे करों को मिला दिया गया है लेकिन उसकी तो कोई बात ही नहीं कर रहा. सरलीकरण के बारे में कोई सोच ही नहीं रहा. लोग चाहते हैं, जैसा चल रहा था, वैसा ही चलता रहे.
इतने बदलावों का राजस्व पर क्या असर पड़ेगा?
कंपोजिशन स्कीम के विस्तार की वजह से कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा. लेकिन जब तक ई-वे बिल लागू नहीं हो जाता, अनुपालन की समस्या तो बनी रहेगी. ई-वे बिल बहुत महत्वपूर्ण है—तीन महीने बाद वह आ जाएगा और फिर राजस्व में तेजी आ जाएगी.
ई-वे बिल में देरी क्यों हो रही है?
सॉफ्टवेयर तैयार किया जा रहा है और साथ ही हम हार्डवेयर पर भी काम कर रहे हैं. हम पायलट शुरुआत भी करना चाहेंगे. वित्त मंत्री ने कहा है कि इसे कुछ राज्यों में 1 जनवरी, 2018 के बाद से लागू किया जाएगा और 1 अप्रैल, 2018 से पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा.
कुछ लोगों का कहना है कि क्रियान्वयन का काम बेहतर हो सकता था, जीएसटीएन की संरचना बेहतर तरीके से की जा सकती थी?
नई प्रौद्योगिकी में शुरुआती दिक्कतें तो रहेंगी. कुछ (जीएसटीएन) खाकों को बनने में वक्त लगा. अब उन्हें समय-सारिणी के अनुरूप ही बनाया जा रहा है.
और क्या बदलाव हो सकते हैं?
कर स्लैब में कटौती की संभावना कम है. कुछ वस्तुओं की दरों में बदलाव हो सकता है.
राज्यों के बीच राजस्व बंटवारे का फॉर्मूला क्या कायम रहेगा?
राजस्व में कोई तेजी अभी नहीं है. राजस्व में तेजी तो छह महीने बाद ही लौटेगी.