प्रखर मेधा का पथिक
जाहिर तौर पर जीवनी लेखन में व्यक्ति को नायक के तौर पर दर्शाए जाने की परंपरा रही है जिससे कई व्यक्तियों की जीवनियां व्यक्तिपूजा में बदल जाती हैं

उन्नीस सौ पचास के दशक के बाद भारतीय बौद्धिक जीवन को जिस एक व्यक्तित्व ने काफी प्रभावित किया, वे दामोदर धर्मानंद कोसंबी (डी.डी. कोसंबी) थे. उनकी ख्याति का कोई अकेला एक कारण नहीं है. देश आजाद हुआ तो उसे नवीन बुद्धिजीवी चाहिए थे जो उसकी देश निर्माण परियोजनाओं में सहायता कर सकें, नई प्रकार की पाठ्यपुस्तकें बना सकें, उर्वरक, इस्पात और एटमी उर्जा के संयंत्र लगा सकें.
लेकिन इसके साथ ऐसे बुद्धिजीवियों की भी आवश्यकता थी जो विज्ञान, मानविकी और समाज अध्ययन के इलाके में समालोचनात्मक रवैया भी विकसित कर सकें. कोसंबी ऐसे ही बहुपठित, बहुश्रुत और वैज्ञानिक चेतना संपन्न बुद्धिजीवी थे जो देश की जनता को विज्ञान की नवीनतम प्रगति से सुखी देखना चाहते थे और चाहते थे कि वह अपने अतीत और वर्तमान के प्रति सजग बने.
यह सब एक ऐसे देश-काल-वातावरण में हो रहा था, जहां अंग्रेजी राज की छाया भी थी और एक नया आजाद मुल्क भी. ऐसे में पढ़े-लिखे देशप्रेमी लोगों का कैसा मानस विकसित हुआ होगा? वे एकसाथ उपनिवेश की लाई गई शिक्षा ग्रहण कर रहे थे और उससे मुक्ति की आकांक्षा भी रखते थे, उनकी अपनी पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि थी, पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका की भौतिक और वैज्ञानिक प्रगति थी और उससे कदमताल मिलाते हुए उन्हें खुद आगे जाना था और देश को भी आगे ले जाना था.
इस जटिल वातावरण में उन्होंने क्या किया होगा? इस सबने उनके जीवन को कैसे रचा होगा? इन सवालों का जवाब राम रामास्वामी की किताब डी. डी. कोसंबी: वन लाइफ मेनी वर्ल्ड्स में मिलता है. यह बहुभाषाविद, पाठ-संशोधक, इतिहासकार, मुद्राशास्त्री और जन बुद्धिजीवी की विभिन्न भूमिकाओं में आवाजाही करते व्यक्ति की जीवनी है.
कोसंबी को आमतौर पर भारतीय इतिहासलेखन में मार्क्सवादी व्याख्याओं और प्रविधि को अकादमिक जगत में प्रवेश दिलाने वाले व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है. लेकिन वे केवल यही नहीं थे.
वे एक मराठीभाषी प्रतिभाशाली बौद्ध विद्वान और स्वतंत्रता सेनानी धर्मानंद कोसंबी के बेटे भी थे. वे अपने जमाने के प्रसिद्ध गणितज्ञ भी थे. उनके पर्चे एशिया और यूरोप के अन्य देशों में अनूदित हो रहे थे.
वे जितना त्रिकोणमिति और ब्रह्माण्ड के सवालों पर गणितीय ढंग से सोच विचार कर रहे थे, उतना ही मराठी और संस्कृत साहित्य से जुड़े हुए थे. लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा ख्याति टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च में काम करने के दौरान और 1956 में इंट्रोडक्शन टु द स्टडी ऑफ़ इंडियन हिस्ट्री से मिली.
कोसंबी के जीवनीकार ने इस जीवनी में उनके 41 वर्षों के दौरान सभी प्रकाशित कामों को ब्योरेवार पेश किया है. यह सूची पढ़ते हुए पाठक जान पाता है कि मात्र 59 वर्ष में उन्होंने कितना ज्यादा और कितने प्रकार का काम किया था. यह जीवनी जितनी दामोदर धर्मानंद कोसंबी की है, उतनी ही उनके पिता धर्मानंद कोसंबी की भी है.
यद्यपि सीनियर कोसंबी को पाठकों का एक छोटा समूह उनकी आत्मकथा निवेदन के जरिए जानता रहा है लेकिन इस वृहद जीवनी में पिता-पुत्र के आत्मिक संबंध कहीं व्यापक परिप्रेक्ष्य में सामने आते हैं.
यह आजादी के बाद भारत के राष्ट्रीय जीवन में नेहरूवादी वैज्ञानिक संस्थाओं के निर्माण, उसमें दानशील लोगों की भूमिका और उससे विद्वानों की अपेक्षा तथा उनकी अंदरूनी सुभेद्यताओं को भी बयान करती है.
इस जीवनी को पढ़ते हुए मैं अपने आपको जीवनीकार रामास्वामी की प्रशंसा किए बिना रोक नहीं पाता. इसमें कोसंबी के लिखे लेखों, पुस्तकों, पैम्फलेटों, निजी कागजात और डायरियों का उपयोग बहुत ही सुंदर ढंग से किया गया है. इसमें उन स्रोतों की अवस्थिति भी बताई गई है. इन स्रोतों को कोई दूसरा भी विद्वान जाकर पढ़ सकता है. यह जीवनी लेखन की एक मेहनती और पारदर्शी विधि है.
जाहिर तौर पर जीवनी लेखन में व्यक्ति को नायक के तौर पर दर्शाए जाने की परंपरा रही है जिससे कई व्यक्तियों की जीवनियां व्यक्तिपूजा में बदल जाती हैं. यह जीवनी इस दोष से मुक्त है और कोसंबी को बहुत मानवीय रूप में प्रस्तुत करती है जो बेहद पठनीय होने के साथ ज्ञानप्रद भी है. नौजवान भारतीयों को इसे जरूर पढ़ना चाहिए.
पुस्तक - डी.डी. कोसंबी
लेखक - राम रामास्वामी
प्रकाशक - हार्पर कॉलिन्स
कीमत - 899 रुपए