विधाओं की बेमानी सीमाएं
ऐन कार्सन को साल 2026 का साहित्य का नोबेल दिए जाने की घोषणा हुई है. उनकी खूबी है कि उन्होंने कविता, उपन्यास, आलोचना, रंगमंच, निबंध और सहोदर कलाओं के बीच की लकीरों को मिटा दिया

कनाडाई लेखिका ऐन कार्सन
गीत चतुर्वेदी
कनाडाई कवि ऐन कार्सन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिलना, अंजोर फैलाती उस मेधा का सम्मान है, जो बरसों से साहित्य के सीवान पर खड़ी होकर प्रचलित मान्यताओं और सुपाच्या रूढ़ियों को चुनौती देती आई हो, और ऐसा करके जिसने कविता, उपन्यास और निबंध की निजी परिभाषाएं बना दी हों. यह उस ‘अवां-गार्द’ (अपने क्षेत्र में अग्रणी, प्रयोगधर्मी) का सम्मान है, जो अपनी दोनों नासिकाओं से पुरातन श्वास-नवीन श्वास के अनुलोम-विलोम को क्रीड़ा-भाव से करती आई हो.
21 जून, 1950 को टोरंटो में जन्मी कार्सन का साहित्यिक जीवन संयोगवश आरंभ हुआ. हाइस्कूल में उनकी लैटिन शिक्षिका एलिस कोवान को महसूस हुआ कि प्राचीन ग्रीक साहित्य में कार्सन की अथाह रुचि है. कोवान ने उन्हें ग्रीक पढ़ाना शुरू किया. दोनों साथ बैठ सैफो की कविताएं पढ़तीं, जिसने कार्सन का जीवन बदल दिया.
बरसों बाद, जब उन्होंने अपनी पहली पुस्तक लिखी, इरॉस द बिटरस्वीट (1986), तो वह सैफो की मान्यताओं का ही विस्तार थी. सैफो के गढ़े शब्द ‘ग्लूकूपिकरॉन’ (अर्थात् प्रेम जितना मीठा है, उतना ही कड़वा भी) से उन्होंने पुस्तक की मूल थीम प्राप्त की कि कामनाओं और दूरी में गहरा संबंध होता है.
प्रेम में थोड़ा-सा अनुपस्थित रहना भी जरूरी है—हाइस्कूल के भोजनावकाश की पढ़ाई और पहली किताब छपने के बीच जीवन की लड़ाई से मिली यह थीम कार्सन के समस्त साहित्यों में व्याप्त है.
वे समकालीन मैदानों के बजाय प्राचीन मैदानों को अपना क्रीडांगण बनाती हैं. वे साहित्य को भाषाई पुरातत्ववेत्ता की तरह देखती हैं. एक साक्षात्कार में उनसे पूछा गया, ‘इन दिनों छपी कौन-सी नई किताब आपने पढ़ी?’ उन्होंने कहा, ‘मैं जो किताबें पढ़ती हूं, वे इन दिनों नहीं, बल्कि ईसा से पांच सौ साल पहले लिखी गई थीं.’ पुरातन को नवीन दृष्टि से देखने की उनकी इस विनोदिनी-वृत्ति को नोबेल समिति ने भी रेखांकित किया है.
वे ग्रीक पुराकथाओं के खंडित कोलाज से आधुनिक मनुष्य की आत्मा का मानचित्र बनाती हैं. अपने ऑटोबायोग्राफी ऑफ रेड (1998) में लाल पंखों वाले पुराकथा चरित्र गेरियन को उन्होंंने आधुनिक अर्थ दिए. इस काव्य-उपन्यास के प्रकाशन ने उन्हें संसार के अग्रणी लेखकों में शुमार कर दिया. कार्सन के यहां अनुपस्थितियां बोलती हैं, वेदनाएं सुनती हैं और घाव नृत्य करते हैं.
उनके लेखन की सबसे आकर्षक खूबी है—विधाओं का कायांतरण. जैसे कैटरपिलर तितली बनकर उड़ जाता है, कार्सन की कविता चलते-चलते अचानक निबंध बनकर तैरने लगती है, लाल पंख लगाकर उपन्यास बन जाती है और उड़ने लगती है, ठेठ शास्त्रीय-अकादमिक आलेख बनकर बूढ़ी, दार्शनिक बिल्लियों की तरह द्वार पर बैठ जाती है, फिर अचानक रंगमंच का प्रयोग बन जाती है और उस आलोचनात्मक टिप्पणी में तब्दील हो जाती है, जो कविता का आस्वाद दे.
अतीत में फरनांदो पेसोआ, वर्जीनिया वुल्फ, डब्ल्यू.जी. जेबाल्ड और गरट्रूड स्टाइन ने विधाओं की बेमानी सीमाओं को ध्वस्त किया है. कार्सन इन्हीं की परंपरा में हैं, और सहर्ष, सगर्व अद्वितीय हैं.
उन्हे किसी इकलौती श्रेणी में रखना कठिन है. वे कवि, कथाकार, उपन्यासकार, चिंतक, दार्शनिक, पुराकथा-विशेषज्ञ, शिक्षक, अनुवादक हैं और इन सबका मिश्रण भी. जिन गुणों को कार्सन के प्रतिबद्ध पाठक बरसों से जानते आए हैं, उम्मीद है कि नोबेल पुरस्कार उन्हें व्यापक पाठक समुदाय तक ले जाएगा.
भाई के निधन पर कार्सन की लिखी नॉक्स मृत्यु पर की गई एक विपश्यना है, जिसमें कविता, संस्मरण, चित्र, पत्र, डायरी, कोलाज आदि हैं