युद्ध की कथा से आगे

महाकाव्य एवं राष्ट्र हमें सोचने के लिए बाध्य करती है कि कोई समाज अपने अतीत को कैसे याद करता है और उस स्मृति के आधार पर अपनी सामूहिक पहचान को किस तरह गढ़ता है

जी.एन. देवी की पुस्तक महाभारत : महाकाव्य एवं राष्ट्र

अजय कुमार यादव

महाभारत को हम जितना पढ़ते हैं, उतना ही वह एक नए प्रश्न की तरह हमारे सामने उपस्थित होता है. वह युद्ध की कथा है, धर्म और अधर्म के संघर्ष का आख्यान है, कृष्ण और अर्जुन के संवाद का ग्रंथ है लेकिन क्या वह केवल इतना ही है? क्या महाभारत को भारतीय समाज के उस दीर्घ सांस्कृतिक अनुभव के रूप में भी पढ़ा जा सकता है, जिसमें समाज अपने अतीत को याद करता, बदलता और पुनर्परिभाषित करता रहा है? जी.एन. देवी की पुस्तक महाभारत: महाकाव्य एवं राष्ट्र इसी बुनियादी सवाल से टकराती है. 

जी.एन. देवी का केंद्रीय प्रश्न यह नहीं है कि महाभारत ‘वास्तव में कब’ लिखा गया, बल्कि यह है कि वह इतने लंबे समय तक भारतीय समाज में जीवित कैसे रहा और भिन्न समुदायों, परंपराओं तथा ऐतिहासिक अनुभवों ने उसे किस तरह पुनर्परिभाषित किया. देवी लिखते हैं, “महाभारत एक असाधारण सांस्कृतिक कृति है.” इसकी यह असाधारणता विराटता से अधिक उसकी पुनर्निर्माण क्षमता में है.

देवी महाकाव्य की पारंपरिक अवधारणा पर भी सवाल उठाते हैं. किसी रचना का लंबा होना या उसमें पात्रों की संख्या का अधिक हो जाना उसे महाकाव्य नहीं बना देता. उनके अनुसार, “महाकाव्य एक ऐसा काव्य है जिसका प्रादुर्भाव एक सभ्यता के प्रारम्भ में होता है और आगे चलकर यह उस सभ्यता का प्रतिबिंब बन जाता है.”

इस दृष्टि से महाकाव्य केवल साहित्यिक विधा नहीं बल्कि सभ्यता के आत्मबोध की संरचना है. महाभारत में कोई एक पात्र संपूर्ण आख्यान का अर्थ निर्धारित नहीं करता. यही बहुकेंद्रीयता और अंतर्विरोध महाभारत के भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में दीर्घजीवी बने रहने का कारण है.

देवी न तो महाभारत को पूरी तरह ऐतिहासिक दस्तावेज मानते हैं और न उसे केवल मिथकीय कल्पना तक सीमित करते हैं. वे कहते हैं, “इतिहास को देखने का तरीका ही महत्वपूर्ण रूप से इस काव्य का एक विशेष लक्ष्य है.”

महाभारत के जीवित रहने की प्रक्रिया में मौखिक परंपरा की केंद्रीय भूमिका पर भी देवी जोर देते हैं. उनके अनुसार, महाभारत को किसी एक क्षण में किसी एक लेखक द्वारा निर्मित स्थिर ग्रंथ के रूप में नहीं समझा जा सकता. अनेक कथाएं और स्मृतियां समय के साथ उसके भीतर जुड़ती गईं.

महाभारत किसी एक धार्मिक या सामाजिक समूह का स्थिर ग्रंथ नहीं रहा; अलग-अलग समुदायों ने इसे अपनी परिस्थितियों और अनुभवों के अनुसार ग्रहण तथा पुनर्निर्मित किया. इसी बहुलता में उसकी सांस्कृतिक शक्ति निहित है.

पुस्तक के शीर्षक में शामिल ‘राष्ट्र’ शब्द उसके सबसे जटिल प्रश्नों में से एक है. आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को प्राचीन महाभारत पर आरोपित करना ऐतिहासिक विसंगति होगी. देवी महाभारत को राजनीतिक राष्ट्र की संहिता के रूप में नहीं बल्कि विविधताओं से भरे समाज को साझा अतीत की अनुभूति से जोड़ने वाली सांस्कृतिक स्मृति के रूप में देखते हैं. इसी अर्थ में वे महाभारत की उपस्थिति को “पिछले दो हजार वर्षों से इस राष्ट्र से संवाद के क्रम में बनी हुई” बताते हैं.

पुस्तक की बड़ी शक्ति उसकी अंतर्विषयक दृष्टि है. साहित्य, इतिहास, मानवशास्त्र, लोकपरंपरा, धर्म और सांस्कृतिक अध्ययन को साथ लेकर महाभारत को समझने की कोशिश की गई है. हालांकि यही अंतर्विषयकता इसकी चुनौती भी है क्योंकि अलग-अलग अनुशासनों के प्रमाणों की प्रकृति अलग होती है. कुछ स्थापनाओं के लिए अधिक विस्तृत प्रमाण और वैकल्पिक इतिहास-दृष्टियों के साथ संवाद अपेक्षित महसूस होता है.

हरि प्रताप त्रिपाठी का हिंदी अनुवाद इस जटिल वैचारिक विमर्श को हिंदी पाठक तक पहुंचाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास है. मूल कृति की प्रश्नाकुलता और अकादमिक गंभीरता सुरक्षित रहती है. हालांकि कहीं-कहीं अंग्रेजी की लंबी वाक्य संरचना और संस्कृतनिष्ठ शब्दावली हिंदी की स्वाभाविक लय को कुछ बोझिल जरूर बनाती है.

अंततः महाभारत: महाकाव्य एवं राष्ट्र हमें सोचने के लिए बाध्य करती है कि कोई समाज अपने अतीत को कैसे याद करता है और उस स्मृति के आधार पर अपनी सामूहिक पहचान को किस तरह गढ़ता है. महाभारत की जीवित शक्ति शायद इसी में है कि हर युग अपने प्रश्नों के साथ उसे फिर से पढ़ सकता है.

महाभारत:
महाकाव्य एवं राष्ट्र
प्रकाशकः राजकमल कीमतः 299 रुपए

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