‘‘अच्छी सीरीज, अच्छी किताब दो अलग बातें’’

शब्दों में रचे प्रेम को पर्दे पर सांस लेते देखना मुसाफिर कैफे के लेखक दिव्य प्रकाश दुबे के लिए सिर्फ कहानी का रूपांतरण नहीं, हिंदी लेखन की बढ़ती स्वीकार्यता भी

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मुसाफ़िर कैफ़े उपन्यास पर बनी सिरीज के अभिनेता (बाएं से) वेदिका पिंटो, विक्रांत मेसी और महिमा मकवाना

चंदर, सुधा और प्रीति को पहली बार पढ़ते हुए पाठकों ने मन में चेहरे बनाए होंगे. किसी ने चंदर की बेचैनी महसूस की होगी, किसी ने स्वच्छांदाकांक्षी सुधा में अपने समय की कोई स्त्री पहचानी होगी तो कोई प्रीति के भीतर ठहरी-बहती नदी से भीगा होगा. मुसाफिर कैफे की पहली दुनिया यही थी, जहां पात्रों का चेहरा कैमरा नहीं, पाठक तय कर रहा था फिर एक दिन उन चेहरों को चेहरे मिल गए.

मसूरी-भोपाल की लोकेशन मिली, कैमरा मिला, संगीत मिला और एक पूरी टीम उस दुनिया को रचने में लग गई जिसे दिव्य प्रकाश दुबे ने दस साल पहले शब्दों से गढ़ा था. किसी लेखक के लिए यह अपनी कहानी को दोबारा जन्मते देखना है. हालांकि इस बार वह जन्म उसके नियंत्रण में नहीं.

दिव्य प्रकाश दुबे हिंदी के बेस्टसेलर लेखक हैं जो मणिरत्नम की फिल्म पोन्नियिन सेल्वन के हिंदी संवाद लिख चुके हैं. उनके उपन्यास मुसाफिर कैफे पर इसी नाम से बनी रोमांटिक सीरीज हाल ही नेटफ्लिक्स पर आई. इसकी सफलता देख दो सप्ताह के भीतर ही नेटफ्लिक्स ने इसके दूसरे सीजन का ऐलान कर दिया.

दिव्य कहते हैं कि उस दिन जंतर मंतर का जेन ज़ी आंदोलन खत्म हुआ था. माहौल एकदम अलग था. ऐसे में सीरीज को इस तरह की प्रतिक्रिया मिलने की बिल्कुल उम्मीद न थी. पर्दे पर यह सीरीज शरण्या राजगोपाल ने लिखी है और दिव्य भी उसमें शामिल रहे हैं.

यह पूछने पर कि अपने लिखे को किसी और के हाथ पुनर्लेखन के लिए सौंप देना कैसा अनुभव रहा, वे कहते हैं, ''अपनी किताब से तो मेरा ब्रेकअप दस साल पहले ही हो चुका था. एक बार लिखकर मैं आगे बढ़ गया. कमरे में अकेले बैठकर लिखी चीज को जब पहले दिन सेट पर डेढ़ सौ लोग एक्जीक्यूट करने खड़े हों तो बहुत सुंदर एहसास होता है.''

मुसाफिर कैफे का अंतिम शब्द दिव्य प्रकाश दुबे ने 25 जनवरी 2016 को लिखा था. वे झटके में तारीख बताते हुए कहते हैं कि यह कैफे सिर्फ एक जगह नहीं. यह किसी के लिए नौकरी छोड़ने की इच्छा है, किसी के लिए वापस गांव जाकर सुकून से जीने का सपना, किसी के लिए अपनी शर्तों पर जीवन चुनने की आकांक्षा. वह उस जिंदगी का रूपक है जिसे चाहकर हम नहीं जी नहीं पाते यानी तयशुदा जीवन से बाहर निकलने की इच्छा.

दिव्य के जीवन में भी इस बेचैनी की एक कहानी है. नौकरी के दिनों में हर सोमवार ऑफिस पहुंचकर उन्हें लगता था, मैं कब तक यह करूंगा? नौकरी अच्छी थी लेकिन भीतर थी एक क्रिएटिव छटपटाहट. कह सकते हैं कि चंदर का 'जंजाल' छोड़ना संभवतः साहित्यिक कल्पना नहीं थी. शायद इसीलिए पाठक को चंदर में अपनी ही किसी बंद खिड़की नजर आती है.

लेखक दिव्य प्रकाश दुबे

सुधा इस कहानी को दूसरी दिशा देती है. आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री अपने जीवन के तमाम जरूरी निर्णय खुद लेना चाहती है. मुसाफिर कैफे  सीरीज प्रेम की कहानी होते हुए भी इस बदलती स्त्री आकांक्षा को दर्ज करती है इसीलिए चंदर, सुधा और प्रीति रिश्तों के तीन अलग-अलग द्वंद्वों- कमिटमेंट, इंडिपेंडेंस, और कंपैनियनशिप के प्रतीक बन जाते हैं. प्रेडिक्टिबल होते प्रेम के दौर में दिव्य का मानना है कि प्यार जितना 'अनरियल' होता है, हम उसकी तरफ उतना ही आकर्षित होते हैं.

धर्मवीर भारती को समर्पित
मुसाफिर कैफे के किरदारों के नाम धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों का देवता से मेल खाते हैं. दिव्य प्रकाश कहानी और पात्रों पर नकल के आरोपों के लिए तैयार थे, ''मैं जानता था ऐसा होगा. उपन्यास के शुरुआती नाम कुछ और थे लेकिन किताब पूरी होने के बाद मैंने ‘कंट्रोल एफ’ किया और नाम बदल दिए. यह जानते हुए कि गुनाहों का देवता पर सीरियल आदि जो भी बना है, वह सफल नहीं हुआ. नामों की तुलना का जोखिम मैंने उठाया ताकि धर्मवीर भारती को ट्रिब्यूट दिया जा सके. हिंदी में ऐसी परंपरा नहीं रही.''

वे कहते हैं कि मुसाफिर कैफे पढ़ने या सीरीज देखने वाला कोई युवा उस रास्ते धर्मवीर भारती तक पहुंच जाए, तो इससे बेहतर श्रद्धांजलि क्या होगी! इसीलिए उपन्यास और सीरीज में केवल गुनाहों का देवता  की स्मृति नहीं है. शेखर एक जीवनी, कितने पाकिस्तान, साये में धूप जैसे कई साहित्यिक संदर्भ आते हैं.

दिव्य की यह कोशिश केवल अपने प्रिय लेखकों को याद करने की नहीं है. वे अपने पाठक को आगे दूसरी किताबों तक भेजना चाहते हैं. उनके लिए साहित्य कोई बंद कमरा नहीं, एक-दूसरे तक पहुंचती हुई किताबों की सुंदर वैचारिक दुनिया है.

क्या यह प्रेम कहानी स्क्रीनप्ले को ध्यान में रखकर लिखी थी. इस पर दिव्य का कहना है, ''किताब को अपने साहित्यिक सत्य के साथ खड़ा होना चाहिए. फिर दस साल बाद कोई उसे ढूंढ़कर स्क्रीन पर लाए या नहीं, यह लेखक के नियंत्रण में नहीं है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अच्छी फिल्म या सीरीज और अच्छी किताब दो अलग बातें हैं. कहानी लेखक के हाथ से निकलने के बाद ही मुसाफिर बनती है.''शायद मुसाफिर कैफे के साथ यही हुआ.

किताब ने एक नई पीढ़ी के सामने दूसरी जिंदगी पाई. दिव्य मानते हैं कि कोई कैमरा उस दुनिया को पूरी तरह नहीं पकड़ सकता जिसे पाठक अपने भीतर बनाता है. फिर भी दृश्यों, कलाकारों और संगीत का अपना संसार होता है जो कई बार चीजें बदल देता है.

हिंदी में लिखकर कमाना संभव
लंबे समय तक यह धारणा रही कि हिंदी में लिखकर प्रतिष्ठा तो मिल सकती है लेकिन घर नहीं चल सकता. दिव्य प्रकाश की यात्रा इस धारणा को चुनौती देती है. पहली किताब आने के बाद से उन्होंने लगातार लेखन किया और अपनी पहचान हिंदी लेखक के रूप में बनाए रखी. उन्होंने अंजुम रजबअली के यहां स्क्रीनप्ले की क्लास की लेकिन बहुत जल्द वे अपना टेंपरामेंट पहचान गए और केवल संवाद और कथा लेखन में आगे बढ़ने का फैसला किया.

वे मुसाफिर कैफे के राइट्स बिकने का अनुमानित आंकड़ा देते हैं पर यहां निजता को ध्यान में रखते केवल इतना लिखना उचित होगा कि उन्हें काफी...काफी अच्छी रकम मिली है. हालांकि वे बताते हैं कि किताबों की रॉयल्टी से अब तक उससे कहीं ज्यादा कमा चुके हैं.

उनके मुताबिक सीरीज आने के बाद से एमेजॉन पर किताब की 25,000-30,000 प्रतियां बिक चुकी हैं. हालांकि वे पाइरेसी से चिंतित हैं, ''अनुमान है कि प्रकाशन वर्ष से अब तक मेरी करीब ढाई से तीन लाख पाइरेटड किताबें बिक चुकी हैं अगर उन किताबों की आधी बिक्री भी वैध रूप से होती तो मेरी सालाना रॉयल्टी लगभग 80 लाख से एक करोड़ रुपए तक पहुंच जाती.''

यह सिर्फ एक लेखक की कमाई का आंकड़ा नहीं है. यह बदलते हिंदी लेखन और बाजार की वह दुनिया है जिसे ओटीटी और सोशल मीडिया ने खूब जगह दी है. दिव्य प्रकाश अपनी किताबों के लिए पारंपरिक लोकार्पण समारोहों पर निर्भर नहीं रहते. वे इंस्टाग्राम का जमकर सहारा लेते हैं, स्टोरीटेलिंग, वर्कशॉप्स करते हैं जो पाठकों से संवाद करने में उनकी मदद करता है. वे खुद को “मोहल्ले का वह लड़का” कहते हैं जो गलती से लेखक बन गया लेकिन मोहल्ले को नहीं भूला.

युवा लेखकों को उनकी सलाह है, ''कहानी इस हिसाब से मत लिखिए कि कभी उस पर फिल्म या वेब सीरीज बनेगी बल्कि जितना संभव हो, उसे अनफिल्मेबल लिखिए.'' उनके अनुसार, आज के निर्देशक सब-टेक्स्ट और कॉम्प्लैक्सिटी को पर्दे पर उतारना चाहते हैं. इसलिए लेखक को अपनी किताब पहले से स्कीनप्ले की तरह लिखने की जरूरत नहीं. ऐसा करने पर न किताब ईमानदार रहेगी, न स्क्रीनप्ले ही पूरी तरह तैयार होगा.

वे मानते हैं कि लेखक को अपनी कहानी के समय की सचाई पकड़नी चाहिए और समय की सचाई हमेशा अखबार की खबर नहीं होती; उसकी एक 'खामोश सचाई' भी होती है.

दिव्य प्रकाश रोजाना करीब एक घंटा जरूर पढ़ते हैं. इन दिनों वे धर्मवीर भारती के पुष्पा भारती को लिखे पत्र पढ़ रहे हैं. स्वदेश दीपक की कहानियां भी उनके वर्तमान पाठ का हिस्सा हैं. जल्द मुसाफिर कैफे सीजन 2 के अलावा इस हिंदी लेखक का एक और प्रोजेक्ट हम सबके सामने होगा.

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