समृद्ध इतिहास की पुनर्खोज
भारत की सांस्कृतिक धरोहरों की अनछुई पर्यटन क्षमता और इस क्षेत्र में दूसरे देशों से आगे बढ़ने पर आर्किटेक्ट आभा नारायण लांबा ने क्या कुछ कहा इंडिया टुडे हिंदी पर पढ़िए

भारत की सांस्कृतिक धरोहरों की अनछुई पर्यटन क्षमता और इस क्षेत्र में दूसरे देशों से आगे बढ़ने पर आर्किटेक्ट आभा नारायण लांबा ने भारत के पर्यटन उद्योग की कड़वी सचाइयों के बारे में बेबाक बात रखी.
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की पुरातात्विक और सांस्कृतिक धरोहरों की अपार संभावनाओं का 'पूरा उपयोग' नहीं हुआ है, और इससे जुड़े लोग इसकी जबरदस्त क्षमताओं से अनजान हैं.
दो तथ्य इस निराशाजनक स्थिति की तस्दीक करते हैं. पहला, पेरिस का लूव्र संग्रहालय देखने हर साल करीब उतने ही लोग आते हैं, जितने उसी अवधि में कुल विदेशी पर्यटक भारत आते हैं. दूसरा, भारत में राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित स्मारकों की संख्या महज 3,900 है, जो यूनाइटेड किंगडम से काफी कम है. यूके आकार में उत्तर प्रदेश से छोटा है फिर भी वहां ऐसे एक लाख स्थल हैं.
लांबा का कहना है कि अगर भारत अपनी अर्थव्यवस्था में पर्यटन का योगदान बढ़ाना चाहता है तो यूनेस्को के टैग हासिल करना इसका सही तरीका है. वे ध्यान दिलाती हैं कि अपनी धरोहरों के डोजियर तैयार करने में चीन दूसरे देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा सक्रिय है. लांबा की हमनाम कंपनी ने कई सफल डोजियर तैयार किए हैं, जिनमें रवींद्रनाथ टैगोर का शांति निकेतन और खान-पान के लिए ख्यात रचनात्मक शहर लखनऊ शामिल है. अब बारी सारनाथ की है.
याद रखने वाली बातें
> यात्रियों को बेहतर अनुभव देने के लिए पर्यटन विभाग को शहरी विकास, संस्कृति, पुरातत्व, धरोहर और नगर नियोजन विभागों के साथ मिलकर काम करना होगा.
> यूनेस्को का दर्जा किसी शहर और देश को दुनिया के सामने पहचान दिलाने का सबसे प्रभावी तरीका है. इस दिशा में सीरियल नॉमिनेशन कारगर रणनीति है. मुंबई का विक्टोरियन और 83 इमारतों वाला आर्ट डेको इसका उदाहरण है
> केवल पर्यटकों की संख्या से ज्यादा गुणवत्ता, उनका खर्च और लोकल इकोनॉमी पर उनका प्रभाव ज्यादा महत्वपूर्ण है
> धरोहर और सांस्कृतिक संरक्षण को समुदाय के सशक्तीकरण के रूप में देखा जाना चाहिए