सहज हुए अब महीने के वे दिन

भारत में माहवारी के दौरान साफ-सफाई के मोर्चे पर पिछले कुछ वर्षों में बड़ा सुधार हुआ है. जागरूकता अभियान और नए प्रॉडक्ट इससे जुड़ी झिझक तोड़कर महिलाओं के लिए महीने के वे दिन ज्यादा सहज बना रहे

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास

कनाडा में पांच साल पढ़ाई और फिर काम करने के बाद 33 वर्षीया फ्रीलांस ग्राफिक डिजाइनर सोनाली मुखर्जी अपने शहर इंदौर लौटीं तो उन्हें पीरियड केयर प्रॉडक्टस में आए बदलावों को देखकर हैरानी हुई.

वे बताती हैं, “पहले पैड जांघों के अंदरूनी हिस्से में रगड़ खाते थे और हमेशा गीलापन तथा बेचैनी महसूस होती थी.अब वे काफी मुलायम और हवादार हैं. हर समय वह असहज करने वाला गीलापन या खुजली नहीं होती. मुझे पता भी न था कि यहां पीरियड पैंटी मिलती हैं.”

शहर में उनकी छोटी कजिन माहवारी पर अब उनसे भी ज्यादा सहजता से और खुलकर बात करती हैं. मुखर्जी जो बदलाव महसूस कर रही हैं वह बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं. यह लगातार और मिलकर की जाने वाली कोशिशों का नतीजा है. आंकड़े भी भारत में माहवारी के दौरान साफ-सफाई की बदली तस्वीर जाहिर करते हैं.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के छठे दौर (एनएफएचएस-6) के मुताबिक, 15 से 24 साल की महिलाओं में माहवारी के दौरान काम आने वाले हाइजिन प्रॉडक्ट्स का इस्तेमाल बढ़कर 79.2 फीसद पर पहुंच गया है. एनएफएचएस-5 में यह 78 फीसद और एनएफएचएस-4 में 57.6 फीसद था.

केरल के ‘शी पैड’ जैसे सरकारी कार्यक्रमों ने लाखों लड़कियों को माहवारी से जुड़ी झिझक तोड़ने और सही साफ-सफाई को समझने में मदद की है. राज्य ने सुरक्षित इस्तेमाल की ट्रेनिंग के साथ मेंस्ट्रुअल कप बांटे हैं. कर्नाटक ने भी 2025-26 की ‘शुचि’ योजना के तहत स्कूली छात्राओं को 10 लाख से ज्यादा मेंस्ट्रुअल कप देने की योजना का ऐलान किया है.

कंपनियों ने भी इस कोशिश में मदद की है और अब उनका ध्यान सिर्फ रक्तस्राव सोखने तक सीमित नहीं. वे ऐसे उत्पाद ला रही हैं जो लाल चकत्तों से बचाते हैं, और जिनका इस्तेमाल रातभर और प्रसव के बाद अधिक स्राव के दौरान किया जाता है. यहां तक कि पर्यावरण का ध्यान रखकर तैयार किए गए विकल्प भी दिए जा रहे हैं.

बाजार अनुसंधान और परामर्श कंपनी मार्कएनटेल एडवाइजर्स के मुताबिक, यह बाजार तेजी से बढ़ा है. भारत का मेंस्ट्रुअल केयर (माहवारी देखभाल) बाजार 2025 में करीब 94 करोड़ डॉलर यानी लगभग 8,000 करोड़ रु. का था. वर्ष 2026 में इसके बढ़कर 1.07 अरब डॉलर यानी करीब 9,000-9,500 करोड़ रु. होने का अनुमान है.

ग्रेटर नोएडा की शारदाकेयर-हेल्थसिटी में प्रसूति एवं स्त्री रोग की कंसल्टेंट डॉ. लिपि शर्मा कहती हैं, “पिछले कुछ वर्षों में माहवारी के दौरान साफ-सफाई को लेकर जागरूकता काफी बढ़ी है.” दिल्ली के द्वारका में मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल में प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की सीनियर डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. शिल्पा घोष कहती हैं, “आज बहुत-सी किशोरियां मेंस्ट्रुअल प्रॉडक्ट्स नियमित रूप से बदलने, अपनी साफ-सफाई और असामान्य लक्षण दिखने पर डॉक्टर की सलाह लेने की अहमियत को समझती हैं.”

सबकी जरूरत का ख्याल

नई कंपनियां उन समस्याओं का समाधान कर रही हैं, जिनके बारे में माहवारी संबंधी अज्ञानता के चलते कभी सोचा भी नहीं जाता था. बेंगलूरू के महिला स्वच्छता स्टार्टअप प्लश की शुरुआत 2018 में हुई.

इसके संस्थापक केतन मुनोत और प्रिंस कपूर ने पाया कि महिलाएं पैड से होने वाले लाल चकत्ते की लगातार शिकायत करती थीं. मुनोत कहते हैं, “इस समस्या ने हमें लंबे समय तक रिसर्च और डेवलपमेंट पर मजबूर किया.” संस्थापकों ने करीब 500 महिलाओं से बात की और पांच दौर की जांच के जरिए पहला उत्पाद बनाने में यही कोई दो साल लगाए.

त्वचा की जलन घटाने के लिए प्लश के सैनिटरी पैड में सिंथेटिक कपड़े के बजाए 100 फीसद अमेरिकी कॉटन की ऊपरी परत इस्तेमाल होती है. कंपनी का राजस्व वित्त वर्ष 2023-24 में करीब दोगुना हो गया और उसने 2025 में 40 करोड़ रुपए उगाहे.

नए तरह के उत्पाद अपनाना भी आसान हो रहा है. पी सेफ मेडिकल-ग्रेड सिलिकॉन से बने, दोबारा इस्तेमाल योग्य मेंस्ट्रुअल कप बेचती है, जो लंबे समय तक उपयोग के लिए सुरक्षित हैं. कंपनी ने 2024 के सिर्फ छह महीनों में करीब 10 लाख पीरियड पैंटी बेचीं.

ये चारों ओर से रिसाव सोखती हैं और कई सैनिटरी पैड के बराबर सुरक्षा देती हैं. वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी का राजस्व तेजी से बढ़ा, जिससे संकेत मिलता है कि कभी चुनिंदा लोगों तक सीमित ये प्रॉडक्ट अब आम ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं.

सिरोना कंपनी ने पोर्टेबल मेंस्ट्रुअल कप स्टरलाइजर सरीखे प्रॉडक्ट उतारे हैं. यह करीब एक मिनट में कप को कीटाणुमुक्त करता है और साफ-सुथरे स्टोरेज केस का काम भी करता है. गुड ग्लैम ग्रुप ने सिरोना को 450 करोड़ रु. के सौदे में खरीदा था, मगर जल्द ही संस्थापकों ने इसे वापस खरीद लिया.

डॉ. घोष इस बदलाव का स्वागत करती हैं. उनके शब्दों में, “माहवारी के दौरान उपयोग में आने वाले प्रॉडक्ट्स के बढ़ते विकल्प महिलाओं की अलग किस्म की जरूरत को रेखांकित करते हैं. स्कूली किशोरियों, खिलाड़ी, कामकाजी महिला और नई मां—सभी को नितांत अलग किस्म के प्रॉडक्ट की जरूरत हो सकती है.”

अब प्रॉडक्ट्स से भी आगे की बात

दरअसल, डॉक्टरों का कहना है कि अब सबसे बड़ी चुनौती उत्पादों तक पहुंच नहीं, बल्कि सोच-समझकर सही चुनाव करना है. डॉ. घोष कहती हैं, “मार्केटिंग के दावे और सोशल मीडिया पर दिखने वाली चीजें लोगों पर उत्पाद बदलने का दबाव बना सकती हैं, भले ही वे उनके लिए उपयुक्त न हों.”

चेन्नै के वीएस हॉस्पिटल्स की वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. इंदिरा नेदुमारन के मुताबिक, माहवारी के दौरान प्रॉडक्ट समय पर बदलना, निजी अंगों की सफाई और इस्तेमाल प्रॉडक्ट्स को ठीक से ठिकाने लगाना जरूरी है.

वे इंटिमेट वॉश या एंटीसेप्टिक उत्पादों के ज्यादा इस्तेमाल से बचने की सलाह देती हैं. वे कहती हैं, “ये योनि की रक्षा करने वाले अच्छे बैक्टीरिया को खत्म कर सकते हैं. ज्यादातर महिलाओं के लिए साबुन और पानी काफी हैं.”

बहुत देर तक एक ही पैड पहनने या दोबारा इस्तेमाल होने वाले उत्पादों को साफ न करने से लाल चकत्ते, फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है. कुछ मामलों में मूत्र या जनन तंत्र में इन्फेक्शन भी हो सकता है.

2015 में पीएलओएस वन में छपे अध्ययन में ओडिशा की महिलाओं में माहवारी की साफ-सफाई की आदतों और मूत्र-जनन संबंधी बीमारियों के बीच सीधा संबंध मिला. 2018 में बीएमसी इन्फेक्शस डिजीजेज में छपे अध्ययन ने खराब माहवारी स्वच्छता को निचले जनन तंत्र के संक्रमण से जोड़ा.

डॉ. नेदुमारन कहती हैं, “जागरूकता भी अहम है. माता-पिता को पहली माहवारी के बाद नहीं, बल्कि किशोरावस्था के शुरुआती संकेत दिखते ही इस बारे में बात शुरू कर देनी चाहिए. लड़की को पहले से तैयार करने पर वह डर के बजाए आत्मविश्वास से इस बदलाव का सामना करती है.”

उनकी सलाह है कि माहवारी शुरू होने पर लड़कियां पहले सैनिटरी पैड या पीरियड पैंटी इस्तेमाल करें. मेंस्ट्रुअल कप और टैम्पॉन बाद में आजमाए जा सकते हैं.

वैसे, अभी लंबा रास्ता तय करना है. डॉ. शर्मा कहती हैं, “जागरूकता काफी बढ़ी है, लेकिन खासकर ग्रामीण इलाकों में बहुत-सी लड़कियां अब भी भ्रामक जानकारी और सामाजिक झिझक का शिकार हैं. मेंस्ट्रुअल प्रॉडक्ट्स और सैनिटेशन फैसिलिटीज तक उनकी पहुंच भी सीमित है.” पहुंच इतनी बढ़नी चाहिए कि भारत में किसी लड़की को पैड मांगने में कोई भी झिझक या डर न रहे.

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