आवरण कथाः इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा दांव

मोदी सरकार ने राहत पैकेज के बदले देश को तेज आर्थिक विकास की राह पर ले जाने की मंशा से इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए बटुआ खोला, मगर इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए योजनाओं को वाकई जमीन पर उतारना जरूरी.

केंद्रीय बजट 2022
केंद्रीय बजट 2022

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने जब 2022-23 के केंद्रीय बजट की तैयारी शुरू की, तो उनके सामने जबरदस्त चुनौतियां थीं. चुनौतियों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर उन 5.3 करोड़ लोगों के लिए रोजगार जुटाने के तरीके और साधन खोजने थे, जिनकी रोजी-रोटी दिसंबर 2021 तक छिन गई थी. जैसा कि सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के आंकड़ों से जाहिर होता है.

अधिकांश तबाही 2020-21 में हुई, जब महामारी की दो लहरों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया और आर्थिक वृद्धि को गर्त में डुबो दिया—ऐसी बुरी हालत इससे पहले 40 साल पहले आई थी. उससे हर कारोबार मटियामेट हो गया, एमएसएमई (लघु, छोटे और मझोले उद्यम) की तो रीढ़ ही टूट गई, जो बड़े पैमाने पर रोजगार मुहैया कराता है.

उधर ईंधन और खाद्यन्न महंगाई ने अपना बदसूरत सिर उठा लिया, जिसकी एक वजह कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज बढ़ोतरी है और लोगों के लिए मुसीबतें लेकर आया. अच्छी बात यह थी कि हाल में अर्थव्यवस्था में बहाली के संकेत दिखाई देने लगे, हालांकि ओमिक्रॉन से पैदा तीसरी लहर ने थोड़ी अड़चन पैदा की. मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था 8.4 फीसद बढ़ी, लेकिन यह वृद्धि की क्षमता के जरा नजदीक नहीं थी. 

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सीतारमण ने तय किया कि वे खैरात बांटने के बजाए सार्वजनिक खर्च को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देकर आर्थिक गतिविधियों में जान डालेंगी. उन्होंने सरकार के पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) में 35 फीसद की भारी बढ़ोतरी की, जिससे यह 2021-22 में 5.44 लाख करोड़ रुपए के बजटीय खर्च से 2022-23 में 7.5 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया, जो जीडीपी का 2.9 फीसद बैठता है.

इसमें राज्यों को एक लाख करोड़ रुपए का ब्याज मुक्त कर्ज भी शामिल है, जो उन परियोजनाओं के लिए दिया जाएगा जो वे लेना चाहें. सीतारमण ने अधिकांश पूंजीगत खर्च उन क्षेत्रों के बुनियादी ढांचे के लिए रखा है, जिन्हें उन्होंने 'वृद्धि के सात इंजन’ कहा है, सड़क, रेलवे, हवाई अड्डे, बंदरगाह, सार्वजनिक यातायात, जलमार्ग और लॉजिस्टिक्स. उन्होंने कहा, ''ये सातों इंजन मिली-जुली ताकत से अर्थव्यवस्था को आगे खींचेंगे.’’ इन्हें ऊर्जा ट्रांसमिशन, आइटी संचार, पानी और सीवरेज, और सामाजिक बुनियादी ढांचे से बल मिलेगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 फरवरी को कहा, ''बजट ज्यादा बुनियादी ढांचे, ज्यादा निवेश, ज्यादा वृद्धि और ज्यादा नौकरियों की संभावनाओं से भरपूर है.’’ इन वर्षों के दौरान मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण पर ज्यादा से ज्यादा भरोसा करती रही है.

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बजट 2022-23 से पहले के चार वर्षों में भी इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए भारी प्रावधान किया गया—वित्त वर्ष 2020 में 3.36 लाख करोड़ रुपए, वित्त वर्ष 2021 में 4.39 लाख करोड़ रुपए, वित्त वर्ष 2022 में 5.54 लाख करोड़ रुपए और अब वित्त वर्ष 2023 में 7.5 लाख करोड़ रुपए. 2019 में सरकार ने 102 लाख करोड़ रुपए की महत्वाकांक्षी नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (एनआइपी) योजना की शुरुआत की थी. 

ऐसे समय जब आर्थिक वृद्धि के दो प्रमुख चालक—उपभोक्ता मांग और निजी निवेश—महामारी की वजह से काफी कमजोर पड़ गए हैं, केंद्र का लक्ष्य आपूर्ति पक्ष में जान डालकर अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की है. इससे, सीतारमण मानती हैं कि मध्य से लंबी अवधि  में वृद्धि के लिए काफी अवसर पैदा होंगे. और फिर, उनके हिसाब से, ज्यादा नौकरियों और रोजगार की राह खुलेगी, जिससे उपभोक्ता खर्च और मांग में इजाफा हो सकता है.

वित्त सचिव टी.वी. सोमनाथन ने इंडिया टुडे से कहा, ''बजट की व्यापक थीम वृद्धि बहाल करना और फायदेमंद रोजगार का सृजन करना है. हमारा मानना है कि रोजगार वृद्धि के जरिए पैदा होंगे, न कि खैरातों से. वृद्धि रोजगार की सबसे अच्छी जननी है और ऐसा करने के लिए हमने पूंजीगत खर्च में भारी बढ़ोतरी की है और यह मानी हुई बात है कि इसका अर्थव्यवस्था पर बहुगुणक प्रभाव होता है.’’ इसीलिए उनका कहना है कि सरकार के पास मौजूद सीमित संसाधन इस दिशा में लगाए गए हैं.

वृद्धि के सात इंजन
सरकार के खर्च में इस भारी बढ़ोतरी को अंजाम देने के लिए केंद्र ने जिस साधन के इस्तेमाल का मनसूबा बनाया है, वह है 'पीएम गतिशक्ति’, जो आर्थिक वृद्धि के लिए संपूर्ण कायापलट का नजरिया अपनाता है. आर्थिक कायापलट अबाध मल्टीमोडल कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक दक्षता के लिए पीएम गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के दायरे में सातों इंजन आएंगे. गतिशक्ति मास्टर प्लान के मुताबिक इसमें राज्य सरकारों द्वारा किया जा रहा इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास भी शामिल होगा.

मास्टर प्लान का केंद्र-बिंदु विश्वस्तरीय आधुनिक बुनियादी ढांचा और लोगों तथा वस्तुओं दोनों की आवाजाही के विभिन्न साधनों तथा परियोजना स्थलों को जोड़ना होगा. इन्फ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञ और इन्फ्रास्ट्रक्चरर पर सीआइआइ की नेशनल काउंसिल के चेयरमैन विनायक चटर्जी कहते हैं, ''मांग दबे होने की स्थिति में नीति निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के सामने दो विकल्प होते हैं. एक, लोगों के हाथ में पैसे देकर मांग को जिंदा किया जाए. दूसरा रास्ता बड़े पैमाने पर सार्वजनिक कामों से होकर जाता है. भारत ने बेशक सार्वजनिक निवेश के जरिए वृद्धि को बल देने का विकल्प चुना है.’’

अर्थशास्त्रियों और उद्योगपतियों का कहना है कि पूंजीगत खर्च के प्रस्तावों में, जो ज्यादातर बुनियादी ढांचे से जुड़े हैं, रोजगार की ज्यादा गुंजाइश और निजी खपत पर अत्यधिक बहुगुणक प्रभाव की क्षमता है. पीरामल ग्रुप के चेयरमैन अजय पीरामल कहते हैं, ''पूंजीगत खर्च से काफी निजी निवेश आने और आर्थिक वृद्धि को सहारा मिलने की संभावना है. कैपेक्स के हर एक करोड़ रुपए से आर्थिक उत्पादन 2.45 करोड़ रुपए बढ़ जाता है.’’

यही नहीं, पीरामल यह भी कहते हैं कि आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और मल्टीमोडल कनेक्टिविटी से माल ढुलाई और लोगों की आवाजाही में मदद मिलेगी, जो सभी कारोबार के लिए जरूरी है. ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज के एमडी वरुण बेरी का कहना है कि कैपेन्न्स में बढ़ोतरी ''बड़े उद्योगों और एमएसएमई से सेवाओं और निर्मित इनपुट की मांग को उकसाएगी और बेहतर बुनियादी ढांचे के जरिए किसानों की मदद करेगी.’’

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कायापलट के सात इंजनों को सरकार किस तरह बढ़ावा देने का मनसूबा बना रही है? एक संक्षिप्त विश्लेषण—

वृद्धि का राजमार्ग
बुनियादी ढांचे में मोदी सरकार का ज्यादातर जोर राजमार्गों पर है. 2022-23 में केंद्र की योजना राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क का 25,000 किलोमीटर विस्तार करने यानी इसे कुल 1,36,440 किलोमीटर के पांचवें हिस्से तक बढ़ाने की है. सार्वजनिक संसाधनों के अलावा 20,000 करोड़ की धनराशि 'वित्तपोषण के नए-नवेले’ तरीकों से जुटाई जाएगी. अगले वित्त वर्ष के लिए सड़क और राजमार्गों पर पूंजीगत खर्च 2021-22 के संशोधित अनुमान से केवल 0.8 फीसद ज्यादा है.

क्रिसिल का एक विश्लेषण कहता है कि पूरे 1.88 लाख करोड़ रुपए सकल बजटीय सहायता से आएंगे, जो मौजूदा वित्त वर्ष से 55 फीसद ज्यादा है. सड़कों के लिए सरकार ने बाहरी बजटीय संसाधनों का प्रावधान नहीं किया है. क्रिसिल की डायरेक्टर ईशा चौधरी बताती हैं कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के तेजी से बढ़ते कर्ज को देखते हुए सरकार सीधे धन खर्च करेगी. जहां सड़कें और राजमार्ग सफलता से पूरे हो चुके हैं, वहां दस फीसद धन संपत्तियों के मौद्रिकीकरण से आएगा.

निजी क्षेत्र को साथ लाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती हो सकती है, तब भी जब वह सार्वजनिक खर्च पर जबरदस्त जोर देकर निजी निवेश में भी अच्छी बढ़ोतरी की उम्मीद कर रही है. केंद्र सरकार में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के पूर्व सचिव विजय छिब्बर कहते हैं कि सरकार ने इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण पर जोर देने का इरादा तो साफ कर दिया, लेकिन ''हमें निजी क्षेत्र को आंखों से ओझल नहीं होने देना चाहिए.

सरकार तो अपनी तरफ से बढ़-चढ़कर काम कर रही है, आवंटन करके अच्छा काम किया गया है. इतना ही विशेष प्रयास निजी क्षेत्र को लाने के लिए भी किया जाना चाहिए.’’ संसद में सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के एक लिखित उत्तर के अनुसार, नवंबर 2021 तक सड़क निर्माण में निजी क्षेत्र का निवेश 15,164.2 करोड़ रुपए था; 2020-21 में यह 12,475.5 करोड़ रुपए और 2019-20 में 21,926 करोड़ रुपए था.

मोदी सरकार पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी के अलग-अलग मॉडल के साथ काम करती रही है और पीपीपी के तहत सड़क निर्माण के विभिन्न माध्यमों के आदर्श रियायत समझौतों की लगातार समीक्षा कर रही है. चिंता की एक बात यह है कि मौजूदा वित्त वर्ष के नौ महीनों में जब औसतन 6,000 किमी और पिछले वित्त वर्ष में 13,200 किमी राजमार्ग बने हों, तो 2022-23 में राजमार्गों का 25,000 किमी विस्तार ज्यादा ही महत्वाकांक्षी हो सकता है.

हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल परियोजनाओं में योग्यता का मानदंड कम करने और रियायत पाने वाले को काम के आधार पर भुगतान करने के बजाए मासिक भुगतान करने सरीखे उपायों से मदद मिली. क्रेडएवेन्यू के एक अध्ययन से पता चला कि 2024-25 तक पूरी की जाने वाली केवल 5 फीसद परियोजनाएं नवंबर 2020 तक पूरी हुई थीं. 2020-21 में पूरे भारत में 13,298 किमी राजमार्गों का निर्माण हुआ था.

तेज पटरी पर
वित्त वर्ष 2022-23 में जिस एक और बुनियादी ढांचे पर जोर होगा, वह है रेलवे, जो पिछले साले के मुकाबले करीब 2.5 गुना ज्यादा 895.5 करोड़ यात्रियों के अलावा 147.5 करोड़ टन माल ढोने के लिए कमर कस रही है. रेलवे ने 2022-23 के लिए 2.39 लाख करोड़ रुपए का राजस्व लक्ष्य तय किया है, जो 2021-22 के मुकाबले 18 फीसद ज्यादा है.

सीतारमण ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव की दो दुलारी योजनाओं के लिए भी प्रावधानों का ऐलान किया. उनमें से एक स्वदेश में ही विकसित सिग्नल प्रणाली 'कवच’ है, जबकि दूसरी वंदे भारत ट्रेनों की संख्या बड़े पैमाने पर बढ़ाना और अगले तीन साल में ऐसी 400 नए ट्रेन सेट शुरू करना है.

इस साल रेलवे को 1,40,367 करोड़ रुपए का बजटीय आवंटन मिला, जो पिछले साल के 1,20,065 करोड़ रुपए के संशोधित अनुमान से 16.9 फीसद ज्यादा है. रेलवे को इसके अलावा अतिरिक्त बजटीय सहायता, कर्ज और सार्वजनिक उपक्रमों की आय वगैरह से करीब एक लाख करोड़ रुपए मिलते हैं. यह सार्वजनिक ट्रांसपोर्टर आंतरिक साधनों से भी करीब 10,000 करोड़ रुपए जुटाता है.

समर्पित माल गलियारे (डीएफसी) के लिए बजट में 15,710.44 करोड़ रुपए रखे गए हैं. परिचालन और रखरखाव के लिए रेलवे गलियारे की संपत्तिडयों का मौद्रिकीकरण भी करेगा. मगर जब तक निजी निवेश आए, वैष्णव पीएसयू से काम करवा रहे हैं और उनके लिए धन आवंटित करवाया है.

वैष्णव को उम्मीद है कि 400 ट्रेन सेट चलाने का लक्ष्य अगले तीन साल में पूरा कर लिया जाएगा. ये ट्रेन सेट यात्रियों को नया अनुभव देंगे, क्योंकि अन्य सुविधाओं के अलावा इनमें बंद गलियारे में सफर किया जा सकेगा, जिससे धूल-मुक्त वातावरण मिलेगा. ये ट्रेनें तेजी से रफ्तार पकड़ सकती और तेजी से रफ्तार कम कर सकती हैं, इसलिए यात्रा का समय और गंतव्य पर पहुंचने का कुल समय पारंपरिक ट्रेनों के मुकाबले कम होगा.

कवच कार्यक्रम के तहत इस साल 2,000 किमी ट्रैक के सिग्नल अपग्रेड किए जाएंगे. वैष्णव कहते हैं, ''उद्देश्य यह है कि देश में ही टेक्नोलॉजी का विकास किया जाए और निर्यात के लिए इसे विश्वस्तरीय बनाया जाए. इसका निर्यात उन देशों को किया जाएगा जो पहले ही बहुत अच्छे रेल नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं.’’

फोकस के अन्य क्षेत्र
शहरों में तेज रफ्तार सफर पक्का करने और सार्वजनिक यातायात सेवाओं को बढ़ावा देने की खातिर सीतारमण ने मेट्रो नेटवर्क बिछाने की गति तेज करने के लिए 19,130 करोड़ रुपए का बजटीय प्रावधान किया है. पिछले साल इन परियोजनाओं पर 18,978 करोड़ रुपए खर्च किए गए. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) के मेट्रो नेटवर्क के अलावा मेट्रो रेल लखनऊ, मुंबई, बेंगलूरू, कोच्चि, हैदराबाद और, बिल्कुल हाल ही में शुरू, कानुपर में चल रही हैं.

इसके अलावा, रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (आरआरटीएस) के जरिए बड़े शहरी केंद्रों को नजदीकी छोटे शहरों से जोड़ने के लिए भी बजट में प्रावधान किए गए हैं. ऐसा अपने किस्म का पहला नेटवर्क एनसीआर में बन रहा है, जिसका निर्माण 4,710 करोड़ रुपए की पूंजीगत लागत से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (एनसीआरटीसी) कर रहा है. 82 किमी लंबे दिल्ली-गाजियाबद-मेरठ आरआरटीएस गलियारे का काम बीते एक साल में आगे बढ़ा है. इसमें दो डिपो और स्टेबलिंग यार्ड सहित 25 स्टेशन होंगे. एनसीआरटीसी ने गलियारे के 56 किमी का निर्माण शुरू कर दिया है.

हवाई अड्डे पीएम गतिशक्ति कार्यक्रम के स्तंभों में से एक हैं. नागरिक विमानन मंत्रालय के लिए 2022-23 के लिए बजट में 10,667 करोड़ रुपए रखे गए हैं, जबकि 600.7 करोड़ रुपए क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की उसकी ध्वजवाहक योजना उड़ान के लिए हैं. 2021-22 में मंत्रालय को 3,224 करोड़ रुपए मिले थे, लेकिन एयर इंडिया के विनिवेश से उसका खर्च ऊंची छलांग लगाकर 72,652 करोड़ रुपए पर पहुंच गया.

महामारी के दो साल बाद जब विमानन क्षेत्र परेशानियों से घिरा है, उम्मीद थी कि एटीएफ (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) पर उत्पाद शुल्क में कटौती की जाएगी, लेकिन बजट ने इस क्षेत्र को कोई सीधी राहत देने से कन्नी काट ली. एयरलाइनों की परिचालन लागत का 25-40 फीसद एटीएफ में चला जाता है. आइसीआरए की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ राज्य एटीएफ पर 25-30 फीसद वैट वसूलते हैं.

भारत का मात्रा के लिहाज से करीब 95 फीसद और मूल्य के लिहाज से 70 फीसद व्यापार समुद्री परिवहन के जरिए होता है. भारत में 12 बड़े और 205 छोटे तथा मध्यम बंदरगाह हैं. सागरमाला राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के तहत छह नए बड़े बंदरगाह विकसित किए जाएंगे. भारत 7,517 किमी लंबी तटरेखा के साथ 16वां सबसे बड़ा समुद्री देश है. बंदरगाह और पोताश्रय निर्माण और रखरखाव के लिए सरकार ने उदार नियमों के तहत 100 फीसद तक एफडीआइ की इजाजत दी है.

उसने बंदरगाहों, अंतर्देशीय जलमार्गों और अंतर्देशीय बंदरगाहों का विकास, रखरखाव और परिचालन करने वाले उद्यमों को 10 साल के कर अवकाश की छूट दी है. केंद्र ने बंदरगाहों, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के लिए 2022-23 के बजट में 16,074.74 करोड़ रुपए रखे हैं, जो 2021-22 के 15,322 करोड़ रुपए के संशोधित अनुमान से ज्यादा हैं.


सीतारमण ने पीएम गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान को जमीन पर उतारने का काम तेज करने के लिए प्रावधान किए. वर्ल्ड बैंक के अनुमान के मुताबिक, भारत में औसत लॉजिटिक्स लागत जीडीपी की करीब 14-16 फीसद है, जबकि अमेरिका और जापान सरीखे विकसित देशों में यह 6-8 फीसद है.

अड़चनों पर नजर
बुनियादी ढांचे पर सरकार का जोर देना संभावनाओं से भरपूर है. बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए स्टील, सीमेंट और अन्य प्रमुख वस्तुओं की मांग बढ़ने की उम्मीद है, जिसके नतीजतन उत्पादन क्षमता का विस्तार होगा और नौकरियां का सृजन होगा. सरकार को अगले पांच साल में साठ लाख नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है.

मगर बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि तमाम परियोजनाओं का काम निर्धारित समयसीमा के भीतर कैसे पूरा होता है. कई परियोजनाएं लाल फीते की भेंट चढ़ जाती हैं और जमीन अधिग्रहण में काफी देर होती है. सीतारमण ने बताया कि मोदी सरकार ने हाल के वर्षों में 25,000 से ज्यादा अनुपालन और 1,486 केंद्रीय कानून खत्म किए हैं, लेकिन कारोबारी सहूलत निवेशकों की बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है.

इस बीच सरकार ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में उपभोक्ताओं के हाथ में ज्यादा धन रखने के उपाय कर सकती है. गिरती ग्रामीण मांग के चलते दिसंबर की तिमाही में एफएमसीजी क्षेत्र मात्रा के लिहाज से साल-दर-साल 1.8 फीसद सिकुड़ा, जो पांच तिमाहियों में पहली गिरावट थी. जब कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हैं, ऊंची महंगाई के चलते मांग के और कमजोर पड़ने की आशंका है.

बजट पर नजर रखने वाले उम्मीद कर रहे थे कि सरकार शहरी रोजगार गारंटी योजना जैसा कुछ लेकर आएगी. ऐसा हुआ नहीं. ईवाइ इंडिया के चीफ पॉलिसी एडवाइजर डी.के. श्रीवास्तव कहते हैं, ''बजट में कुछ चूकें साफ दिखाई देती हैं, जैसे मनरेगा, खाद्यान्न, उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडियों के लिए कम प्रावधान और स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर तथा कोविड टीकाकरण पर नाकाफी ध्यान देना.’’

अलबत्ता वे यह भी कहते हैं कि बजट में अतिरिक्त राजकोषीय गुंजाइश थी, जिसका सरकार ने इस्तेमाल नहीं किया. अगर वह ऐसा करती, तो उपयुक्त अनुपूरक बजटों के जरिए या राजकोषीय मजबूती की रफ्तार तेज करके साल के दौरान कम प्रावधानों की भरपाई कर सकती थी.

आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार का इरादा अपने बटुए के फीते तुरंत कसने के बारे में सोचे बगैर खर्च करते रहने का है, पर ऐसा वह धीरे-धीरे एक अवधि में करेगी. मौजूदा साल में संशोधित राजकोषीय घाटा जीडीपी का 6.9 फीसद रहने का अनुमान है, जबकि इसका बजट अनुमान 6.8 फीसद था. 2022-23 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 6.4 फीसद रहने का अनुमान है.

इसके बारे में सीतारमण ने कहा कि यह राजकोषीय मजबूती के उस व्यापक रास्ते या 'राजकोषीय उड़ान पथ’ के अनुरूप है, जिसकी घोषणा उन्होंने राजकोषीय घाटे को 2025-26 तक 4.5 फीसद के स्तर से नीचे लाने के लिए पिछले साल की थी. सीतारमण ने कहा कि बजट अर्थव्यवस्था के लिए अगले 25 साल का विजन सामने रखता है. इस अवधि को उन्होंने ''अमृत काल’’ कहा, जो भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष की तरफ ले जाती है. कई विशेषज्ञ कहते हैं कि बुनियादी ढांचे की योजनाओं की सफलता की कुंजी उन्हें जमीन पर उतारने में है. 

लेखा महानियंत्रक (सीजीए) के आंकड़े बताते हैं कि 30 फीसद 2021-22 के पहले आठ महीनों में (नवंबर 2021 तक के ही आंकड़े मौजूद हैं) खर्च नहीं की जा सकी. सीजीए के अनुसार, नवंबर तक सरकार का कुल खर्च 2021-22 के बजट में तय 34.8 लाख करोड़ रुपए के मुकाबले 20.7 लाख करोड़ रुपए था. सोमनाथन कहते हैं, ''रकम उपलब्ध करवाना एक बात है और परियोजनाओं को पूरा करवाना दूसरी.

जमीन पर अभी काम होने हैं—निविदाओं पर काम सौंपना है, अनुमतियां हासिल करनी हैं. आर्थिक मामलों के विभाग ने पिछले साल कैपेक्स की गहन निगरानी की और इस साल भी वह ऐसा करेगा.’’ ज्यादा तेजी से अमल इसलिए भी जरूरी है ताकि नतीजे भारत को ज्यादा तेज वृद्धि की राह पर ले जा सकें. तभी ज्यादा नौकरियों से सृजन और लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने के व्यापक लक्ष्य भी जल्द से जल्द साकार किए जा सकेंगे.

6.9 %
जीडीपी का राजकोषीय घाटा मौजूदा वर्ष में, बजट अनुमान 6.8 फीसद के मुकाबले
859.5 करोड़
यात्रियों के लिए रेलवे की वित्त वर्ष 2022-23 में तैयारी

''सार्वजनिक खर्च को हर हाल में अगुआई करनी जारी रखनी चाहिए और निजी निवेश तथा मांग को 2022-23 में बढ़ावा देना चाहिए’’
निर्मला सीतारमण
केंद्रीय वित्त मंत्री

''मकसद यह है कि सिग्नल टेक्नोलॉजी का देश में विकास किया जाए और उसे निर्यात के लिए विश्वस्तरीय बनाया जाए, ताकि उन देशों को दिया जा सके, जो अच्छे रेलवे नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं’’
अश्विनी वैष्णव
केंद्रीय रेल, संचार और इलेक्ट्रॉनिक्स तथा आइटी मंत्री

मोदी सरकार के पूंजीगत खर्चों में ज्यादातर जोर राजमार्गों पर है. केंद्र 2022-23 में राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क को 25,000 किमी बढ़ाना चाहता है

'' बजट का व्यापक थीम आर्थिक वृद्धि को बहाल करना और फायदेमंद रोजगार पैदा करना है’’
टी.वी. सोमनाथन
केंद्रीय वित्त सचिव

वित्त वर्ष 23 के लिए बजट में बड़ा जोर रेलवे पर भी है, जिसने अपना राजस्व लक्ष्य 2.39 लाख करोड़ रु. रखा है, जो 2021-22 की तुलना में 18 फीसद अधिक है

बजट में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर इस वादे के साथ है कि पूरी अर्थव्यवस्था पर उसका बहुगुणक असर होगा. स्टील, सिमेंट और दूसरी निर्माण सामग्रियों की मांग बढ़ने से रोजगार में तेजी आएगी

''बजट में कुछ चूकें साफ दिखाई देती हैं, जैसे मनरेगा, खाद्यान्न, उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडियों के लिए कम प्रावधान और स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर तथा कोविड टीकाकरण पर नाकाफी ध्यान देना. बजट में अतिरिक्त राजकोषीय गुंजाइश थी, जिसका सरकार ने इस्तेमाल नहीं किया ‘’
डी.के. श्रीवास्तव, चीफ पॉलिसी एडवाइजर, ईवाइ इंडिया

सीतारमण ने ज्यादातर पूंजीगत खर्च का फोकस 'वृद्धि के सात इंजनों’ पर रखा है. जैसे सड़कें, रेलवे, हवाई अड्डे, सार्वजनिक परिवहन, जल परिवहन और लॉजिस्टिक
इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा दांव

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