आवरण कथाः एलआइसी की कितनी कीमत

आइपीओ के जरिए एलआइसी को बाजार में लाने से बहुत कुछ मिलेगा और राजकोषीय घाटे को काबू में लाना भी कम आकर्षक परिणति नहीं है लेकिन इसके लिए कई अड़चनों से पार पाना होगा 

व्यापक दृष्टिकोण मुंबई के नरीमन पॉइंट में स्थित एलआइसी का मुख्यालय
व्यापक दृष्टिकोण मुंबई के नरीमन पॉइंट में स्थित एलआइसी का मुख्यालय

सीतांशु स्वैन

पूरे अंग्रेजी नाम के शुरुआती अक्षरों से मिलकर बना इसका छोटा नाम, यानी एलआइसी और इसका प्रतीक चिन्ह नई सदी से पहले जन्मे भारतीयों के लिए वित्तीय सुरक्षा का प्रतीक रहा है. यहां तक कि अब भी 29 करोड़, यानी हर पांच में से एक भारतीय ने सरकार की मिल्कियत वाले जीवन बीमा निगम से बीमा करवाया है. देश के जीवन बीमा बाजार के 66 फीसद हिस्से पर आज भी इसका कब्जा है, बावजूद इसके कि 1999 में इजाजत मिलने के बाद निजी बीमा कंपनियां दो दशक से भी ज्यादा वक्त से मैदान में हैं.

एलआइसी सरीखी विशालकाय वित्तीय कंपनी देश में दूसरी नहीं है, जिसने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) को अपनी परछाई से ढक लिया है. इसके देश भर में 4,955 दफ्तर हैं, जिनमें से कई इसके स्वामित्व वाली प्राइम रियल एस्टेट संपत्तियां हैं. इसने 1,08,000 लोगों को सीधे रोजगार दे रखा है. इसके अलावा देश भर में फैले इसके 13 लाख एजेंट हैं. इसके प्रबंधन के अधीन 36 लाख करोड़ रुपए की संपत्तियां हैं, जो इसे निजी क्षेत्र की भारत की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकाबले आकार में तीन गुना बड़ी विशालकाय कंपनी बना देती हैं.

भारत की एक के बाद एक सरकारें एलआइसी को पारिवारिक जायदाद मानती रही हैं, यानी परिवार के आधिपत्य की एक ऐसी बेशकीमती चीज जिसे अपने से जुदा करना पाप माना जाता है. इस निगम ने कई अनगिनत मौकों पर सरकार की माली हालत को सहारा दिया है. यह सरकारी प्रतिभूतियों की सबसे बड़ी खरीदार और निवेशक है, जो 31 मार्च 2020 में कुल 17 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गईं और ये एसबीआइ की 10.47 लाख करोड़ रुपए की प्रतिभूतियों के मुकाबले बहुत ज्यादा थीं.

अपने निवेशों के बूते एलआइसी को कई निजी कंपनियों के बोर्ड या निदेशक मंडलों में कुर्सी हासिल है, जिसकी बदौलत सरकार सीधे उन पर असर डाल पाती है. बीते दो दशकों से सरकार—और एलआइसी—विनिवेश की मांगों का प्रतिरोध करती रही थीं. मगर विकट समय, असाधारण उपायों की मांग करता है. यहां तक कि महामारी से पहले भी बढ़ते राजकोषीय घाटे और लडख़ड़ाती अर्थव्यवस्था का सामना कर रही भाजपा-नीत नरेंद्र मोदी सरकार ने 2020 के बजट में आइपीओ (इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग या आरंभिक सार्वजनिक निर्गम) के माध्यम से एलआइसी की 5 से 10 फीसद के बीच हिस्सेदारी छोडऩे के अपने इरादे का ऐलान किया था.

संघ परिवार के कुछ खास हिस्सों की तरफ से और एलआइसी के भीतर से ही प्रतिरोध का सामना करने के कारण बात आगे नहीं बढ़ पाई. मगर अब जब महामारी ने सरकार की आमदनी के रास्तों को अवरुद्ध कर दिया है और राजकोषीय घाटा (सरकार की कुल आमदनी और कुल खर्च के बीच कमी) अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 2020-21 में जीडीपी के 9.5 फीसद पर पहुंच गया है, मोदी सरकार घाटा कम करके 6.8 फीसद पर लाने की गरज से वित्तीय विकल्पों की बेतहाशा छानबीन कर रही है.

अगले वित्तीय साल के लिए राजकोषीय घाटे को उसने इसी स्तर पर लाने का अपने आप से वादा किया है. एलआइसी का जल्द आ रहा आइपीओ सरकार को उसकी मौजूदा बेहद बुरी माली हालत से उबारने के लिए बहुत जरूरी और अहम हो गया है. राजकोषीय लक्ष्य पूरे नहीं कर पाने से अर्थव्यवस्था को नियंत्रण से बाहर जाने से बचाने के लिए भी यह बहुत जरूरी है.

जीवन बीमा निगम अर्थव्यवस्था को कैसे बचा सकता है
दो तिमाहियों में नकारात्मक जीडीपी वृद्धि के बाद अब अर्थव्यवस्था में बहाली के संकेत दिखाई दे रहे हैं लेकिन उसके बाद भी राजकोषीय घाटे का 6.8 फीसद का लक्ष्य हासिल कर पाना मुश्किल काम है. मुंबई के एक अर्थशास्त्री कहते हैं कि बजट के मुताबिक चलें तो राजस्व प्राप्तियों में 2.33 लाख करोड़ रुपए का इजाफा होना चाहिए. वित्त मंत्रालय के अफसर करों से प्राप्त राजस्व और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से मिलने वाले लाभांश में बढ़ोतरी के जरिए और सबसे अहम यह कि विनिवेश के 1.75 लाख करोड़ रुपए के लक्ष्य को पूरा करके, यह लक्ष्य हासिल करने की उम्मीद कर रहे हैं.

सरकार ने 2020-21 के वित्त वर्ष में 2.10 लाख करोड़ रुपए के विनिवेश का लक्ष्य तय किया था, जिसमें से महज 32,000 करोड़ रुपए ही हासिल होने की संभावना है. ऐसे में सरकार विनिवेश की महत्वाकांक्षा को हासिल करने की अपनी क्षमता में बहुत भरोसा नहीं उपजाती. बजट दस्तावेजों में उसने आइपीओ लाने का वादा पुरजोर दोहराया है. हालांकि औपचारिक तौर पर मूल्य निर्धारण का काम अभी हाथ में नहीं लिया गया है पर एलआइसी के आइपीओ में 1 लाख करोड़ रुपए उगाहने की क्षमता और संभावना है. यह उस 15,200 करोड़ रुपए से छह गुना ज्यादा है जो सरकारी कंपनी कोल इंडिया ने 2010 में अपने आइपीओ के जरिए उगाहे थे और वह देश में अब तक की ऐसी सबसे ज्यादा रकम है. 

धन उगाहने की इस भारी कवायद से सरकार को विनिवेश के लक्ष्य और इसके जरिए अपने राजकोषीय लक्ष्य के बड़े हिस्से को पूरा करने में मदद मिलेगी. यह कदम सार्वजनिक क्षेत्र के इस बंद, अपारदर्शी, सुस्त और निढाल एकांगी संगठन को अपने कामकाज में बेहद जरूरी और वांछित पारदर्शिता के साथ चुस्त और फुर्तीली विश्वस्तरीय बीमा कंपनी में बदल सकता है और तब इसका बाजार पूंजीकरण (शेयर बाजार की तरफ से निर्धारित कंपनी का मूल्य) रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और एचडीएफसी बैंक सरीखी फर्मों के बराबर हो सकता है.

मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के सीएमडी मोतीलाल ओसवाल कहते हैं, ''एलआइसी के विनिवेश से भारत की सबसे मूल्यवान सूचीबद्ध संस्थाओं में से एक के निर्माण और विदेशी पूंजी के विशाल निवेश को आकर्षित करने की संभावना है.’’ एलआइसी का आइपीओ अगले वित्तीय वर्ष में बाजार में आने की उम्मीद है और इससे करीब 1 करोड़ निजी निवेशकों को भी भारतीय शेयर बाजारों में लाने में मदद मिलेगी, जिससे उनका खुदरा आधार बड़ा होगा. वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने फरवरी में राज्यसभा को बताया कि सरकार एलआइसी के आइपीओ इश्यू का 10 फीसद तक कंपनी के पॉलिसीधारकों के लिए रिजर्व रखेगी.

सरकार ने साथ ही साथ एक और अहम घोषणा यह की कि वह निजी बीमा कंपनियों में एफडीआइ (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) की सीमा मौजूदा 49 फीसद से बढ़ाकर 74 फीसद करेगी. विशेषज्ञ इसे बड़े आर्थिक सुधार के तौर पर देखते हैं, जो न केवल सरकारी मिल्कियत वाली बीमा कंपनियों और खास तौर पर एलआइसी के लिए निजी क्षेत्र की तरफ से प्रतिस्पर्धा का सूत्रपात करेगी, जिसकी बेहद जरूरत है, बल्कि यह भारतीय बीमा क्षेत्र में छिपी विशाल क्षमता और संभावनाओं के दरवाजे भी खोल देगी, जिनमें रोजगार भी शामिल है. अलबत्ता यह कदम उठाने की बात करना जितना आसान है उतना आसान इसे उठा पाना नहीं है. साथ ही, यह चुनौतियों से भरा पड़ा है.

फायदे में एलआइसी
इन चुनौतियों को समझने के वास्ते पहले यह समझना होगा कि एलआइसी को इसकी शुरुआत से ही इतना ऊंचा और प्रतिष्ठित दर्जा आखिर कैसे और क्यों दिया गया. इसकी स्थापना 1 सितंबर, 1956 को जीवन बीमा निगम कानून के जरिए हुई थी. इस कानून ने बीमा क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. 245 से ज्यादा बीमा कंपनियों और भविष्य निधि या प्रोविडेंट सोसाइटियों का विलय करके यह विशालकाय कंपनी बनाई गई थी.

2001 में सेक्टर के उदारीकरण के बाद जीवन बीमा क्षेत्र के प्रीमियम में 16 गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है. 2000-01 में 36,071 करोड़ रुपए के आधार से जीवन बीमा उद्योग का प्रीमियम हर साल 15.6 फीसद के सीएजीआर (चक्रवृद्धि सालाना वृद्धि दर) से बढ़कर 2019-20 में 5,72,910 करोड़ रुपए पर पहुंच गया. एलआइसी ने भी उदारीकरण का फायदा उठाया और यह हर साल 13.2 फीसद के सीएजीआर से बढ़ा.

फिलहाल 7.63 लाख करोड़ रुपए (आइआरडीएआइ या भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण के मुताबिक) के भारतीय बीमा क्षेत्र में 67 कंपनियां हैं, जिनमें 24 जीवन बीमा और 10 वैश्विक रिइंश्योरेंस कंपनियां हैं. एलआइसी जीवन बीमा करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की अकेली कंपनी है. 2019-20 में इसकी कुल आमदनी 6,15,883 करोड़ रुपए और शुद्ध मुनाफा 2,713 करोड़ रुपए था. निजी क्षेत्र की जीवन बीमा फर्मों की बाजार हिस्सेदारी एलआइसी की 66 फीसद हिस्सेदारी के मुकाबले बहुत ही कम दिखती है.

निजी क्षेत्र की पांच शीर्ष बीमा कंपनियों (नए बिजनेस प्रीमियम के लिहाज से) में एसबीआइ की सहयोगी कंपनी एसबीआइ लाइफ की बाजार हिस्सेदारी 7.68 फीसद, एचडीएफसी बैंक की शाखा एचडीएफसी लाइफ की 7.23 फीसद, एक्सिस बैंक के 12 फीसद हिस्से वाली मैक्स लाइफ की 2.3 फीसद, बजाज फिनसर्व तथा जर्मनी की बड़ी कंपनी अलायंज के संयुक्त उद्यम बजाज अलायंज लाइफ इंश्योरेंस की 2.04 फीसद और आदित्य बिड़ला ग्रुप तथा कनाडा की बड़ी कंपनी सन लाइफ फाइनेंशियल के बीच संयुक्त उद्यम आदित्य बिड़ला सन लाइफ इंश्योरेंस की बाजार हिस्सेदारी 1.64 फीसद है. 

दुनिया भर में कुल प्रीमियम में जीवन बीमा कारोबार की हिस्सेदारी 2019 में 46.34 फीसद थी. इसके मुकाबले भारत में कुल प्रीमियम में जीवन बीमा कारोबार का हिस्सा कहीं ज्यादा 74.94 फीसद था. ज्यूरिख स्थित बीमा कंपनी स्विस रे के आंकड़ों के अनुसार, जीवन बीमा के प्रीमियम से होने वाली आय के लिहाज से भारत 88 देशों में 10वीं पायदान पर है. विश्व के जीवन बीमा बाजार में भारत की हिस्सेदारी 2.73 फीसद थी. 2019 में भारत में जीवन बीमा प्रीमियम 9.63 फीसद था, जबकि वैश्विक जीवन बीमा प्रीमियम में महज 1.18 फीसद का इजाफा हुआ.

एलआइसी को अपने भीतर बने कुछ निश्चित फायदे हासिल हैं जिनकी वजह से उसका दबदबा कायम है. निजी बीमा कंपनियों की पॉलिसियों के विपरीत, एलआइसी की पॉलिसियों के साथ एक संप्रभु गारंटी जुड़ी है जिसकी परिकल्पना एलआइसी अधिनियम 1956 की धारा 37 के तहत की गई थी और जो इसे कहीं ज्यादा भरोसेमंद बनाती है. आयकर अधिनियम 1961 की संशोधित धारा 80सी जीवन बीमा पॉलिसियों में निवेश करने वाले लोगों को 1,50,000 रुपए तक की छूट देती है.

यही वजह है कि भारत में बचतों का बहुत बड़ा हिस्सा जीवन बीमा में जाता है. नई कंपनियों के विपरीत, एलआइसी जो पॉलिसियां बेचता है उनमें से बहुत सारी पॉलिसियां बचत-सह-जीवन कवर पॉलिसी के तौर पर बेची जाती हैं. ये उत्पाद अपने स्वरूप में ‘भागीदारी वाले’ हैं. ‘भागीदारी वाली’ पॉलिसी की बदौलत पॉलिसी धारक बोनस या लाभांश की शक्ल में बीमा कंपनी के मुनाफों में साझेदारी कर पाता है. इस तरह एलआइसी अद्वितीय बिक्री प्रस्ताव के तौर पर बहुत विशाल संख्या पर ध्यान देता है.

निजी कंपनियों के विपरीत, एलआइसी का दावा है कि उसके यहां भूल-चूक, कालातीत पॉलिसियां और ज्यादा प्रीमियम वाली पॉलिसियों के जारी नहीं रहने के मामले बनिस्बतन कम हैं. हालांकि कई लोग इस दावे को नहीं मानते. एलआइसी करीब 94 फीसद व्यक्तिगत मृत्यु दावों का निपटारा दावा किए जाने के 30 दिनों के भीतर करता रहा है. इसी वर्ग के लिए निजी क्षेत्र का तुलनात्मक आंकड़ा 85 फीसद है. निजी क्षेत्र के मुकाबले मृत्यु दावों के कहीं ज्यादा तेज निपटारे ने जनता के दिमाग में एलआइसी की बेहद अच्छी और सकारात्मक छवि बनाई है. बहुत कम करके भी आंका जाए तो एलआइसी को अगले 20 सालों में नवीनीकरण प्रीमियम के तौर पर ही 75,000 करोड़ रुपए से ज्यादा रकम मिलने की संभावना है.

टॉप 10 आइपीओ

एलआइसी विनिवेश की राजनीति
एलआइसी के आइपीओ से धन जुटाने की योजना नई नहीं है. जून 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुआई में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सत्ता संभालने के बाद जल्द ही तब के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट से पहले के सलाह-मशविरे के लिए व्यापार और उद्योग के दिग्गजों से मुलाकात की थी. इनमें पीएसयू बैंकों और बीमा कंपनियों के कुछ प्रमुख भी शामिल थे. जेटली का पूरा ध्यान जहां राजकोषीय घाटे (2014-15 में 4 फीसद) को नीचे लाने के तरीकों और उपायों पर केंद्रित था.

वहीं कोटक महिंद्रा बैंक के एमडी और सीईओ उदय कोटक ने सुझाव दिया कि सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए आइपीओ के जरिए एलआइसी में विनिवेश करे. मगर उन चर्चाओं का कोई नतीजा नहीं निकला. कयास यह लगाया गया कि एलआइसी को चूंकि व्यापक तौर पर सरकार के सामाजिक उद्देश्य पूरा करने वाली संस्था के रूप में देखा जाता है, लिहाजा इसके विनिवेश को कड़े राजनैतिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है.

इतिहास में और पीछे जाएं तो अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली एनडीए-1 सरकार में जेटली के समकक्ष यशवंत सिन्हा ने दिसंबर 1999 में आइआरडीएआइ कानून को आगे बढ़ाते वक्त जोर देकर कहा था कि सरकार और सरकारी एकाधिकार के हक में नहीं है. इसी आइआरडीएआइ कानून ने भारत के बीमा क्षेत्र के दरवाजे निजी क्षेत्र और विदेशी कंपनियों के लिए खोलने का रास्ता साफ किया था. सिन्हा ने एलआइसी और सरकारी साधारण बीमा कंपनियों में सरकार का हिस्सा घटाने से जुड़ी आशंकाओं पर यह कहकर विराम लगाया था कि इन निगमों को निजी हाथों में सौंपने का सरकार का कोई इरादा नहीं है.

एलआइसी को भीमकाय बनाने वाले तथ्य

2015 में संसद को दिए गए सिन्हा के आश्वासन को जेटली ने कुछ हद तक उस वक्त उलट दिया जब मोदी सरकार ने सामान्य बीमा व्यवसाय (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम 1972 में संशोधन करके पांच सरकारी साधारण बीमा कंपनियों में विनिवेश की इजाजत दे दी. ये पांच कंपनियां थीं: जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (जीआइसी आरई), न्यू इंडिया एश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी और नेशनल इंश्योरेंस कंपनी.

सरकार ने इस कानून में नया खंड—10बी—और जोड़ दिया, जिसके मुताबिक जीआइसी आरई और बीमा कंपनियां सॉल्वेंसी मार्जिन तथा केंद्र सरकार की तरफ से उपयुक्त समझे गए दूसरे उद्देश्यों को पूरा करने के लिए ग्रामीण और सामाजिक क्षेत्रों में कारोबार बढ़ाने की खातिर पूंजी उगाह सकती थीं. यहां भी संशोधनों को पारित करवाते वक्त जेटली ने सदन को भरोसा दिया था कि एलआइसी पूरी तरह सरकार की मिल्कियत वाला संस्थान बना रहेगा.

विशालकाय कंपनी की बेडिय़ां खोलना
बहुत ज्यादा बढ़ते राजकोषीय घाटे ने मोदी सरकार को एलआइसी के बारे में अपने विचार बदलने को मजबूर जरूर कर दिया है, लेकिन अभी उसे कई बाधाओं से पार पाना है. सबसे पहले उसे आइपीओ का रास्ता साफ करने के लिए एलआइसी अधिनियम 1956 में संशोधन करना होगा. आर्थिक मामलों के सचिव तरुण बजाज के मुताबिक, सरकार ने यह काम शुरू भी कर दिया है.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2021 के साथ जो वित्त विधेयक 2021 प्रस्तुत किया, उसमें पूरे 27 संशोधनों का रास्ता साफ किया जा रहा है ताकि दोनों सदन इसे तेजी से और सुचारू ढंग से पारित कर सकें. संशोधन के विषय में अलग विधेयक लाने पर शायद संशोधनों की ज्यादा छानबीन की जाती और शायद विरोध भी होता.

दूसरी अड़चन पूंजी बाजारों में दस्तक देने से पहले सही मूल्य निर्धारण करवाने की तकनीकी कसरत है. एलआइसी सरीखी जीवन बीमा फर्म के मामले में, जिनकी प्रीमियम से आमदनी बहुत लंबी मियाद तक फैली होती है, मूल्य निर्धारण के लिए उनकी 'एम्बेडेड वैल्यू’ या 'अंतर्निहित मूल्य’ (ईवी) का पता लगाना होता है (देखें मूल्य तय करने की माथापच्ची). ईवी 'एंटरप्राइज वैल्यू’ या उद्यम मूल्य का ही दूसरा रूप है, जिसकी गणना आइपीओ लाने वाली गैर-बीमा कंपनियों के लिए की जाती है.

नंबर एक

सरकारी मिल्कियत वाली कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी का प्रबंधन करने वाले डीआइपीएएम या निवेश और सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग ने एलआइसी के एम्बेडेड मूल्य के सही आकलन के लिए अमेरिका की बीमांकक (एक्चुएरियल) फर्म मिलिमैन एडवाइजर्स का चयन किया है जबकि डेलॉइट और एसबीआइ कैप्स को आइपीओ पूर्व सलाहकार नियुक्त किया है.

एसबीआइ लाइफ के एमडी और सीईओ महेश शर्मा कहते हैं, ''हमारे यहां भारत में फिलहाल केवल तीन सूचीबद्ध जीवन बीमा कंपनियां हैं इसलिए एलआइसी को सूचीबद्ध करवाने की दिशा में आगे बढऩे का सरकार का फैसला स्वागत योग्य कदम है, क्योंकि इससे शेयर बाजारों में बीमा क्षेत्र को और ज्यादा गहराई मिलेगी और इनकी पारदर्शिता में भी इजाफा होगा.’’

अलबत्ता डीआइपीएएम जहां प्रशासनिक सहायता मुहैया करेगा, वहीं वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) एलआइसी के विनिवेश का संचालन करेगा. सरकार ने मूल्य निर्धारण करने वालों की टीम नियुक्त की है. सूत्रों का कहना है कि संभावित मूल्य निर्धारण के अलग-अलग आकलन हैं जो 2-3 लाख करोड़ रुपए से लेकर 20 लाख करोड़ रुपए तक जाते हैं. सरकार के भीतर इस मोर्चे पर पहले ही खींचतान शुरू हो गई है और दो खेमे बन गए हैं. एक खेमा कम मूल्य निर्धारण होने पर भी विनिवेश की राह पर आगे बढऩा चाहता है जबकि दूसरा चाहता है कि पहले इस विशालकाय बीमा कंपनी का सही मूल्य निर्धारण पक्का किया जाए.

इस उद्योग से जुड़े और प्रधानमंत्री कार्यालय को सलाह देने वाले एक सूत्र का कहना है कि जहां पीएमओ एलआइसी में हिस्सेदारी बेचने को लेकर बहुत उत्सुक है, वहीं वह सही मूल्य निर्धारण करवाने को लेकर चिंतित भी है. ऐसा एलआइसी की मुनाफे में हिस्सेदारी की मौजूदा व्यवस्था के अनूठे स्वरूप की वजह है. जीवन बीमा निगम कानून की धारा 24 कहती है कि मूल्य निर्धारण अधिशेष के लाभों का 95 फीसद पॉलिसी धारकों को हस्तांतरित कर दिया जाए (कराधान के बाद) और बाकी 5 फीसद लाभांश की शक्ल में सरकार को दे दिया जाए.

आइआरडीएआइ के बाद के नियमों ने हालांकि इसे घटाकर 90 फीसद पॉलिसी धारकों को और 10 फीसद शेयर धारक (सरकार) को देना तय किया पर पॉलिसी धारकों और सरकार के बीच अधिशेष के बंटवारे के मामले में अब भी पुराने 95:5 के फॉर्मूले पर ही चल रही है. दूसरे शब्दों में, कानून के तहत एलआइसी के मुनाफों पर शेयर धारकों का नहीं बल्कि पॉलिसी धारकों का पहला हक है. सरकार को जो दिया जाता है वह शुद्ध मुनाफा कहा जाता है, जो यह भी बताता है कि एलआइसी के प्रतिधारित लाभ (पिछले साल 2,713 करोड़ रुपए) और आरक्षित निधियां बहुत कम क्यों हैं.

आंकड़ो का आईना

आइपीओ के बाद के परिदृश्य में जब और भी ज्यादा शेयर धारक एलआइसी के हिस्सेदार बन जाएंगे, तब इस ढांचे को बदलना होगा. अगर नहीं बदला जाता है, तो एलआइसी के शेयर संभावित शेयरधारकों के लिए इतने आकर्षक नहीं होंगे और उन दूसरी सूचीबद्ध बीमा कंपनियों से तुलना में कहीं पीछे छूट जाएंगे जो शेयर धारकों को अपने मुनाफे का ज्यादा बड़ा हिस्सा देने का वादा करती हैं.

इसका अर्थ है कि एलआइसी कानून में प्रस्तावित संशोधनों को मुनाफे में हिस्सेदारी के इस मौजूदा झुकाव से निपटना होगा जो पॉलिसीधारकों के पक्ष में झुका हुआ है. कार्य सलाहकार फर्म आरबीएसए एडवाइजर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर राजीव आर. शाह कहते हैं कि खुदरा भागीदारी इस पर निर्भर करेगी कि सरकार की कीमत तय करने की रणनीति क्या है.

वे कहते हैं, ''अगर वे आम निवेशकों के फायदे के लिए कुछ छोड़ते हैं तो लोग (एलआइसी के आइपीओ में) पैसा लगाएंगे.’’ सरकार को अतीत में दोनों ही तजुर्बे हो चुके हैं: कुछ मामलों में वह खुदरा निवेशकों को उत्साहित करने में नाकाम रही, तो दूसरे मामलों में उसे जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली. शाह कहते हैं, ''यह इस पर निर्भर करता है कि इश्यू की रूपरेखा कैसे तैयार की जाती है.’’ यह प्रक्रिया अलबत्ता आसान नहीं है और इसकी वजह से आइपीओ लाने में देरी हो सकती है.

एलआइसी का कुल निवेश पोर्टफोलियो 31 मार्च, 2020 को 33.7 लाख करोड़ रुपए था यानी निजी बीमा कंपनियों के मिले-जुले आंकड़े से करीब चार गुना. अपने कम पूंजी आधार और कारोबार के आयतन में लगातार बढ़ोतरी—जिससे सॉल्वेंसी या ऋणशोधन जरूरतें भी बढ़ जाती हैं—के बावजूद एलआइसी ने अभी तक आइआरडीएआइ की तरफ से तय किए गए ऋणशोधन मानदंड को पूरा किया है. विश्लेषक बताते हैं कि एलआइसी की गैर-निष्पादित संपत्तियां (एनपीए) बीमा उद्योग के 1.5-2 फीसद के सामान्य स्तर के मुकाबले करीब 6 फीसद हैं. सूचीबद्ध होने पर शेयरधारकों की नजर इस आंकड़े पर होगी और वे इसके कम होने की उम्मीद करेंगे.

सार्वजनिक क्षेत्र की सामान्य बीमा कंपनी न्यू इंडिया एश्योरेंस (एनआइए) के पूर्व चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर जी. श्रीनिवासन कहते हैं, ''निवेशक कहीं ज्यादा मुनाफे की उम्मीद करते हैं और चाहते हैं कि संगठन इस उद्देश्य की दिशा में अपनी कारोबारी रणनीतियां तय करे. किसी भी सूचीबद्ध कंपनी को मुनाफा देने की अपनी क्षमता पर ध्यान काफी बढ़ाना होगा.’’

एनआइए 2017 में सूचीबद्ध होने वाली बिल्कुल पहली साधारण बीमा कंपनी थी. वे कहते हैं कि एलआइसी पारदर्शिता, खुलासों और अनुपालन के ज्यादा बड़े स्तरों का अभ्यस्त होना होगा और निवेशकों, विश्लेषकों और बाजार की अपेक्षाओं को समझना होगा. एनआइए के आइपीओ की अगुआई में आई चुनौतियों की चर्चा करते हुए श्रीनिवासन ने कहा कि बीमा क्षेत्र को समझना एक चुनौती था क्योंकि उस वक्त इसके कोई मानक नहीं थे.

इसे सही वक्त पर लाना 
आरबीएसए एडवाइजर्स के शाह कहते हैं कि भारतीय बाजार ने इतना विशालकाय आइपीओ (एलआइसी की तरफ से प्रस्तावित) कभी नहीं देखा. बाजार नियामक सेबी (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) का बड़ी कंपनियों को सूचीबद्धता के नियमों में ढील देने का हालिया फैसला एलआइसी के विशालकाय आइपीओ में मदद करेगा. इसके मुताबिक, बड़ी कंपनियां पहले के 10 फीसद के नियम के बजाए, आइपीओ में अब कम से कम 5 फीसद हिस्सेदारी बेच सकती हैं.

यही नहीं, सार्वजनिक निर्गम 25 फीसद तक बढ़ाने के लिए अब उनके पास, तीन के बजाए, पांच साल का वक्त होगा. प्रभावी तौर पर इसका मतलब हुआ कि एलआइसी शुरुआत में छोटा इश्यू—फर्ज कीजिए 50,000 करोड़ रुपए का—ला सकती है और ज्यादा हिस्सेदारी बेचने के फैसले से पहले बाजार के लेन-देनों के जरिए ज्यादा अच्छी कीमत पता लगाने का काम कर सकती है.

जोश से भरा शेयर बाजार शेयरों के किसी भी संभावित सार्वजनिक निर्गम के लिए अच्छा है और इस वक्त जब असल अर्थव्यवस्था उम्मीद से ज्यादा तेजी से बेहतर हो रही है, विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी आइपीओ के लिए यह अच्छा वक्त है. इस वित्तीय साल की तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था मंदी से उबर आई और इसने 0.4 फीसद की सकारात्मक वृद्धि दर्ज की. 2021-22 में जीडीपी की वृद्धि दर के छलांग लगाकर 10.5-11 फीसद पर पहुंच जाने की उम्मीद है, हालांकि यह निचले आधार की वजह से होगा.

शेयर बाजार पिछले दो-एक महीनों से ऐतिहासिक ऊंचाइयों के गवाह रहे हैं, 21 जनवरी को सेंसेक्स 50,000 अंकों के निशान के पार चला गया. एचडीएफसी के मैनेजिंग डायरेक्टर और वाइस-चेयरमैन केकी मिस्त्री के मुताबिक, एलआइसी इस मोड़ पर बहुत अच्छा मूल्य हासिल कर सकता है. तीसरे, खुदरा निवेशकों के बीच भारतीय शेयर बाजार में विश्वास बढ़ रहा है. दिसंबर 2019 से दिसंबर 2020 के बीच निवेशकों ने 1.05 करोड़ नए डिमैट अकाउंट खोले. ज्यादा ऊंचे रिटर्न और ज्यादा तरलता के साथ कम ब्याज दरों के माहौल ने शेयर बाजारों को आम निवेशकों के लिए आकर्षक बना दिया है.

मिस्त्री कहते हैं कि खुदरा और सांस्थानिक निवेशक भारत की सबसे बड़ी बीमा कंपनी में निवेश के इस मौके से चूकना नहीं चाहेंगे. एक बड़े आइपीओ में जैसा कि सरकार ने एलआइसी के लिए प्रस्तावित किया है, बहुत ज्यादा सार्वजनिक दिलचस्पी पैदा होने की संभावना है. पीडब्ल्यूसी में पार्टनर और स्वास्थ्य बीमा की दुनिया भर में अग्रणी शख्सियत जॉयदीप रॉय कहते हैं कि देश की एक बड़ी सूचीबद्ध कंपनी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की प्रतिष्ठा में इजाफा करेगी और अपनी मूल्य निर्माण की संभावनाओं को प्रदर्शित करेगी.

एलआइसी के आइपीओ के तिहरे लाभ होंगे. सरकार कुछ हिस्सेदारी बेचकर पूंजी हासिल करेगी, पूंजी बाजारों को एक ब्लू-चिप स्टॉक मिल जाएगा (जिसके पास उतार-चढ़ाव के वक्तों में राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता होगी) और एलआइसी के ग्राहकों को इसके वित्तीय आंकड़ों में सच्ची पारदर्शिता के दर्शन होंगे, जो फिर पूरे क्षेत्र की साफ-सफाई करेंगे.
लंबे वक्त के दौरान जीवन बीमा निगम अतिरिक्त पूंजी आकर्षित कर पाएगा और समूचे भारत में अपने कारोबार की और ज्यादा गहरी जड़ें फैला पाएगा.

पॉलिसी धारकों को कंपनी की वित्तीय रणनीतियों की बेहतर समझ हासिल होगी. मीडिया और विश्लेषकों की रिपोर्टें कंपनी के कार्य प्रदर्शन का आकलन करने में मदद करेंगी, जिससे ग्राहकों को ज्यादा जानकार फैसले लेने में मदद मिलेगी. खेतान लीगल एसोसिएट्स के पार्टनर साकेत खेतान कहते हैं, ‘‘उम्मीद यह है कि एलआइसी के सूचीबद्ध होने से सरकारी नियंत्रण खत्म भले न हो लेकिन कम होगा और बाजार ज्यादा बड़े खुलासों के लिए मजबूर करेगा, जिसके नतीजतन सवाल-जवाब और छानबीन और इसलिए ज्यादा जवाबदेही होगी, जो कार्य प्रदर्शन में निखार लाएगी.’’

बाजार के नजरिए से देखें तो खालिस आकार को ही देखते हुए यह आइपीओ शेयर बाजारों के आधार को ज्यादा बड़ा बना सकता है और बड़ी तथा मिड-कैप कंपनियों के कामकाज की नाप-जोख करने वाले एमएससीआइ सहित विभिन्न वैश्विक सूचकांकों में भारत के भारांश और रेटिंग में बदलाव ला सकता है.

ओसवाल कहते हैं कि करीब 10 लाख करोड़ रुपए के मूल्य निर्धारण के साथ सरकार 10 फीसद हिस्सेदारी बेचकर 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा जुटाने की उम्मीद कर सकती है. कोल इंडिया के आइपीओ में खुदरा निर्गम 2.1 गुना ज्यादा सब्सक्राइब हुआ था और 1,70,000 से ज्यादा खुदरा निवेशकों ने इसके शेयरों के लिए आवेदन किए थे.

केआर चोकसी इनवेस्टमेंट मैनेजर्स के देवेन चोकसी कहते हैं, ‘‘एलआइसी देश के शेयर बाजार के बाजार पूंजीकरण में 5-5.5 लाख करोड़ रुपए जोड़ सकता है. मैं उम्मीद करता हूं कि सांस्थागत निवेशक, जिनमें विदेशी सांस्थागत निवेशक भी शामिल हैं, एलआइसी के शेयरों में पैसा लगाएंगे.’’ उनके मुताबिक, एलआइसी के पास अच्छी तरह परिभाषित निवेश रणनीति है और यह सरकार और अपने ग्राहकों को अच्छा लाभांश अदा करता रहा है.

वे यह भी कहते हैं कि सूचीबद्ध होने पर इसके महज आकार की वजह से ही वैश्विक प्रतिष्ठा हासिल होगी. अलबत्ता सूचीबद्ध होने के बाद भी एलआइसी बाजार पूंजीकरण के लिहाज से चीन की भीमकाय वित्तीय कंपनी पिंग एन इंश्योरेंस से कमतर हो सकती है, फिर भी यह अपने कद की कुछ दूसरी वैश्विक कंपनियों से शायद ज्यादा बड़ी होगी. पिंग एन इंश्योरेंस का बाजार पूंजीकरण दिसंबर 2020 में 17.13 लाख करोड़ रुपए था, जबकि अमेरिका की प्रूडेंशियल फाइनेंशियल इंक और मेटलाइफ कंपनियों का बाजार पूंजीकरण दिसंबर, 2020 में क्रमश: 2.25 लाख करोड़ रुपए और 3.08 लाख करोड़ रुपए था.

अगर एलआइसी को उसकी रियल एस्टेट संपत्तियों को शामिल करने की इजाजत दी जाती है तो उसका मूल्य निर्धारण बेहद भारी-भरकम होगा. एलआइसी के एमडी विपिन आनंद ने कहा कि आइपीओ में एलआइसी के ग्राहकों, कर्मचारियों और एजेंटों के बहुत छोटे-से हिस्से की भागीदारी भी इतनी काफी होगी कि इसकी नैया आसानी से पार लग सकेगी.

बरसों की दुविधा के बाद सरकार ने आखिरकार भारत के बीमा क्षेत्र के मूल्य को जंजीरों से मुक्त करने फैसला कर लिया है. यह प्रक्रिया आसान नहीं भी हो सकती है और इसे पहले ही ट्रेड यूनियनों के प्रतिरोध से टकराना पड़ रहा है, लेकिन यह भारत की सबसे बड़ी बीमा कंपनी को बेडिय़ों से आजाद करने की दिशा में पहला कदम होगा. इस प्रक्रिया में उसे बड़ा राजस्व जुटाने का फायदा भी मिलेगा. एलआइसी का आइपीओ सरकार के विनिवेश कार्यक्रम का सांचा होगा. यह रास्ते में आने वाली चुनौतियों को पार करने में उसकी धुन और लगन और निपुणता की अग्नि परीक्षा भी होगा.

—सीतांशु स्वैन साथ में श्वेता पुंज

‘‘हमें संस्थागत, एफपीआइ (विदेशी संस्थागत निवेशक) और एनआरआइ से जबरदस्त प्रतिक्रिया की उम्मीद है जिससे आइपीओ का नया कीर्तिमान बन जाएगा’’ 
विपिन आनंद, प्रबंध निदेशक, एलआइसी

‘‘एलआइसी देश के शेयर बाजार के बाजार पूंजीकरण में आसानी से 5-5.5 करोड़ रु जोड़ सकता है’’
देवेन चोकसी, एमडी, केआर चोकसी इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स

‘‘एलआइसी का इश्यू भारत का अब तक का सबसे बड़ा आइपीओ होगा. इसका विशाल आकार स्टॉक एक्सचेंज का आधार व्यापक करेगा और वैश्विक सूचकांकों में भारत का वजन और रैंकिंग बढ़ाएगा’’’
मोतीलाल ओसवाल, सीएमडी, मोतीलाल ओसवाल 
फाइनेंशियल सर्विसेज

‘‘एलआइसी के सूचीबद्ध होने से सरकारी नियंत्रण खत्म भले न हो पर कम होगा...बाजार ज्यादा खुलासों के लिए मजबूर करेगा इसलिए ज्यादा जवाबदेही होगी जिससे प्रदर्शन में निखार आएगा’’
साकेत खेतान, पार्टनर, खेतान लीगल एसोसिएट्स

‘‘खुदरा भागीदारी (आइपीओ में) इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार की कीमत तय करने की रणनीति क्या है. अगर आम निवेशकों के फायदे के लिए कुछ होगा तो वे पैसा लगाएंगे’’
राजीव आर. शाह, एमडी, आरबीएसए एडवाइजर्स

बदलाव के खिलाफ
सरकार की हिस्सेदारी बेचने की पहल के खिलाफ कोलकाता में एलआइसी दफ्तर के बाहर प्रदर्शन करते एलआइसी एजेंट.

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