मेरी कमाई घट गई है, न जाने कब हालात सामान्य होंगे

मधुरेश के तिपहिया वाहन का मुंबई का नंबर अपने गृह जिले जौनपुर लौटने की राह में परेशानी का सबब बन गया. उन्हें कोविड संक्रमण वाले इलाके से आता देख ढाबा वालों ने वापस कर दिया

कठिन सवारी: मधुरेश कुमार सिंह, 35 वर्ष, ऑटो-रिक्शा चालक, मुंबई
कठिन सवारी: मधुरेश कुमार सिंह, 35 वर्ष, ऑटो-रिक्शा चालक, मुंबई

मधुरेश कुमार सिंह कोविड लॉकडाउन की दर्दनाक यादों को मिटाना चाहते हैं. उन्हें 2021 में बेहतर दिनों की प्रतीक्षा है. 35 वर्षीय मधुरेश 2012 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर से मुंबई आए थे ताकि वे गांव में रह रही अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ, चार भाइयों का जीवनयापन कर सकें. वे जुहू में दो अन्य ऑटो-रिक्शा चालकों के साथ एक छोटे-से कमरे में रहते थे और प्रति माह 30,000 रुपए कमाते थे. उनका कहना है कि उससे वे आराम से अपने ऑटो-रिक्शा की 5,000 रुपए प्रति माह की किस्त, कमरे का 2,000 रुपए किराया और अन्य खर्चों को पूरा कर सकते थे. हर महीने वे अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा परिवार को भेजते थे. वे कहते हैं, ''मेरी आकांक्षाएं अधिक थीं, फिर भी जीवन सुचारू रूप से चल रहा था.''

मार्च के अंत में लगे लॉकडाउन के बाद मधुरेश के पास काम नहीं था और सारी बचत 10 दिनों में खत्म हो चुकी थी. 7 अप्रैल को मधुरेश और उनके साथ रहने वाले दोस्तों ने अपने ऑटो रिक्शे से ही अपने पैतृक गांव लौटने का फैसला किया. जाते समय, उनके मकान मालिक ने 10,000 रुपए का सिक्योरिटी डिपॉजिट वापस करने से इनकार कर दिया, ऊपर से एक महीने का किराया और मांग लिया. उनके पास पैसे नहीं बचे थे, इसलिए मधुरेश ने अपने भाई से बैंक खाते में 3,000 रुपए जमा करने को कहा, ताकि वे घर तक के 1,500 किलोमीटर लंबे सफर के लिए तेल और भोजन खरीद सकें.

मधुरेश मुंबई से चले थे जो कोविड हॉटस्पॉट था और इस बात ने यात्रा को और अधिक कठिन बना दिया. वे बताते हैं, ''मेरे ऑटो-रिक्शा पर मुंबई का नंबर देखकर, ढाबा मालिकों ने हमें अंदर जाने से मना कर दिया. प्रयागराज पहुंचने से पहले तीन दिनों तक हमें केवल आलू के चिप्स, लस्सी और पानी ही नसीब हुआ था.'' उन्होंने सुना था कि एनजीओ कैंप लगाकर घर लौट रहे प्रवासियों को मुफ्त भोजन बांट रहे हैं, लेकिन पूरे सफर में उन्हें ऐसा कोई कैंप नहीं मिला. जौनपुर पहुंचने पर, उन्हें अपने घर के करीब आधे बीघे खेत में 14 दिनों के लिए क्वारंटीन किया गया.

नई शुरुआत के लिए दृढ़ संकल्प के साथ मधुरेश ने चावल और गेहूं उगाने के लिए दोस्तों से पैसे उधार लिए. वे कहते हैं, ''मेरे पास समय था और खेती में दिलचस्पी थी, लेकिन बड़ी फसल के लिए मेरा खेत बहुत छोटा था.'' हालांकि, परिवार इतने चावल और गेहूं की पैदावार करने में कामयाब रहा जो उनके परिवार के लिए छह महीनों के लिए पर्याप्त था. भोजन का प्रबंध हो गया था, लेकिन उनके बेटों के प्राइवेट ट्यूशन की फीस और उनकी जीवन बीमा पॉलिसियों के प्रीमियम जैसे अन्य खर्चों ने उनको परेशान करना शुरू किया. उन्हें ऑटो-रिक्शे के लिए लिया गया कर्ज भी चुकाना था. वे कहते हैं, ''मुझे उम्मीद थी कि फाइनेंसर ब्याज माफ कर देगा. इसके बजाए, संचित ब्याज समेत कुल बकाया कर्ज की रकम 1.70 लाख रुपए से बढ़कर 2.10 लाख रुपए हो गई.''

जब महाराष्ट्र सरकार ने लॉकडाउन में ढील दी और सितंबर में सार्वजनिक परिवहन को फिर से शुरू करने की अनुमति दी, तो मधुरेश ने वापस मुंबई जाने का फैसला किया. इस बार, वे कहते हैं कि ढाबा मालिकों ने न केवल भोजन परोसा, बल्कि उन्हें स्नान करने और रात बिताने के लिए जगह प्रदान की.

मधुरेश के साथ जुहू के किराए के कमरे में अब चार साथी रहते हैं. वे अपना दिन सुबह 8 बजे शुरू करते हैं और रात में 10 बजे तक अपना ऑटो-रिक्शा चलाते हैं. वे बताते हैं, ''यात्रियों में अभी डर बना हुआ है इसलिए मेरी आय घटकर 20,000 रुपए प्रति माह हो गई है. न जाने कब हालात सामान्य होंगे.''

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