'जन गण मन' पर संविधान सभा में नहीं हुई बहस, नेहरू ने मजबूरी में चुना! राष्ट्रगान की पूरी कहानी

संविधान लागू होने से दो दिन पहले, यानी 24 जनवरी, 1950 के दिन संविधान सभा ने 'जन-गण-मन' को राष्ट्रगान के रूप में मान्यता दी थी

संविधान सभा में बहस
संविधान सभा की एक बैठक

संविधान सभा की कार्यवाही 2 साल 11 महीने 18 दिन चली, इसमें 11 सत्र की बैठकें हुई और कुल 165 दिन काम-काज हुआ, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसमें राष्ट्रगान को कितना समय दिया गया? आधे घंटे से भी कम!

'वंदे मातरम... इन द हाउस, ऑन द रिकॉर्ड' किताब के लेखक अखिलेश झा के अनुसार, संविधान सभा के 3 साल के कार्यकाल में राष्ट्रगान पर 8 मिनट से भी कम बहस हुई. वहीं इसके 299 सदस्यों में से केवल 20 लोगों ने बहस में गंभीर या अनौपचरिक रूप से हिस्सा लिया. 

संविधान लागू होने से दो दिन पहले, यानी 24 जनवरी, 1950 के दिन संविधान सभा ने 'जन-गण-मन' को राष्ट्रगान के रूप में मान्यता दी. ऐसे में कुछ सवाल दिमाग में आते हैं- राष्ट्रगान जो किसी भी देश की पहचान है, उसे संविधान सभा में इतना कम महत्व क्यों दिया गया और इसके लागू होने की कहानी क्या है?

रवींद्रनाथ टैगोर ने  11 दिसंबर 1911 को ‘जन गण मन’ के मूल गीत 'भारोतो भाग्यो बिधाता' की बंगाली में रचना की थी. इसी महीने 26 से 28 दिसंबर तक कांग्रेस का 26वां राष्ट्रीय अधिवेशन था. इसी समय ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम भारत की यात्रा पर आए थे. ब्रिटिश हुकूमत ने इसी समय दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला लिया था और बंगाल विभाजन का फैसला रद्द कर दिया था. चूंकि ये अधिवेशन कोलकाता में था तो इस फैसले का स्वागत करने के लिए रामानुज चौधरी द्वारा रचित गीत गाया गया. इसके अलावा 'एक राष्ट्र'के रूप में भारत की स्तुति के लिए एक और गीत चुना गया- 'जन गण मन' (तब यह मूल रूप से बांग्ला में गाया गया था). यानी 26 दिसंबर 1911 को पहली बार 'जन गण मन' गया गया. 

लेकिन समस्या ये हो गई कि इंग्लैंड के अखबार इस गीत को जॉर्ज पंचम के सम्मान में गाए गए गीत के रूप में प्रचारित करने लगे. कुछ लोगों ने तर्क देना शुरू कर दिया कि यह गीत 'इंग्लैंड के राजा के गुणगान में लिखा गया था.' हालांकि इसपर अपने मित्र पुलिन बिहारी सेन को लिखे एक पत्र में टैगोर ने साफ कर दिया कि उन्होंने ‘जन गण मन’ में हिंदुस्तान को भाग्य विधाता बताया है और वे कभी भी ब्रिटिश शासन की प्रशंसा में गीत लिखना स्वीकार नहीं करेंगे.

इस विवाद से निकलने के बाद फरवरी 1919 में इस गीत का अंग्रेजी अनुवाद किया गया जिसका इसका शीर्षक था- “द मोर्निंग सॉन्ग ऑफ इंडिया’. कैप्टन आबिद हसन सफरनी ने हिंदुस्तानी अनुवाद में इसे शीर्षक दिया- ‘शुभ सुख चैन’. 'भारोतो भाग्यो बिधाता' पांच छंदों का गीत है जिसमें से पहले स्टेंजा के हिंदी अनुवाद को बाद में राष्ट्रगान के रूप में चुना गया. 

भारतीय राष्ट्रगान 'जन गण मन' का प्रथम अंग्रेजी अनुवाद

1912 में यह गीत तत्वबोधिनी पत्रिका में 'भारत बिधाता' शीर्षक से प्रकाशित हुआ. यह ब्रह्म समाज का आधिकारिक प्रकाशन था और टैगोर ही इसके संपादक थे. कलकत्ता के बाहर, यह गीत पहली बार  28 फरवरी, 1919 को आंध्र प्रदेश में मदनपल्लेके बेसेंट थियोसोफिकल कॉलेज में गाया गया था. कॉलेज प्रशासन इस गीत से इतना खुश हुआ कि इसके इंग्लिश वर्जन को प्रार्थना गीत बना लिया, जो आज तक गाया जाता है. 

नेहरू और राष्ट्रगान

15 अगस्त 1947 यानी भारत के आजाद होने का दिन आ चुका था, लेकिन अब तक भारत का अपना कोई आधिकारिक राष्ट्रगान नहीं था. आजादी मिलने के तुरंत बाद ऑर्केस्ट्रा और बैंड को राष्ट्रगान की धुन बजानी थी, लेकिन अब तक किसी ऐसी धुन के बारे में नहीं सोचा गया था. ब्रिटिश अपना राष्ट्रगान 'गॉड सेव द किंग' बजाते थे, लेकिन भारत की आजादी के समय ब्रिटिश राष्ट्रगान बजाना उचित नहीं माना जा रहा था. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू 25 अगस्त 1948 को संविधान सभा में अपने भाषण के दौरान कहते हैं, "हमसे लगातार पूछा जा रहा था कि ऐसे मौकों पर क्या धुन बजानी चाहिए. हम जवाब नहीं दे पाए क्योंकि आखिरकार ये संविधान सभा द्वारा तय किया जाना था."

'जन-गण-मन' की धुन अब तक भारत में काफी लोकप्रियता हासिल कर चुकी थी और दक्षिण पूर्व एशिया में भारतीय राष्ट्रीय सेना इसी धुन का प्रयोग कर रही थी. नेहरू अपने इसी भाषण में आगे कहते हैं, "1947 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की महासभा के मौके पर ये मामला एकदम सामने आकर खड़ा हो गया. हमारे प्रतिनिधिमंडल से एक खास मौके पर ऑर्केस्ट्रा के लिए राष्ट्रगान बजाने के लिए कहा गया. प्रतिनिधिमंडल के पास 'जन-गण-मन' की रिकॉर्डिंग थी तो उन्होंने ऑर्केस्ट्रा को वही रिकॉर्डिंग दे दी. जब यह बजा तो लोगों और कई देशों के प्रतिनिधियों ने इसे अधिकांश देशों के राष्ट्रगानों से बेहतर माना और खूब तारीफ की.

जवाहरलाल नेहरू के साथ रविंद्र नाथ टैगोर

नेहरू ने इस भाषण में ये भी बताया कि कैसे उन्हें राष्ट्रगान के रूप में 'जन गण मन' को अस्थाई मान्यता देने के लिए तैयार होना पड़ा. वे कहते हैं, "तारीफों से हटकर देखें तो हमारे पास उस समय ज्यादा विकल्प नहीं थे. कोई ऐसा खास राष्ट्रगान या धुन नहीं थी, जिसे हम विदेश भेजते. उस समय मैंने सभी प्रांतीय गवर्नर्स को चिट्ठी लिखी और पूछा कि 'जन गण मन' को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने के बारे में उनके क्या विचार हैं. मैंने उनसे कहा कि जवाब देने से पहले वे अपने प्रधानमंत्रियों से भी राय ले लें. हालांकि मैंने यह स्पष्ट कर दिया था कि आखिरी फैसला संविधान सभा ही लेगी, लेकिन विदेशों में राष्ट्रगान भेजने की तात्कालिक जरूरत को देखते हुए एक अस्थाई फैसला लेना होगा."

नेहरू बताते हैं कि मध्य प्रांत के राज्यपाल को छोड़कर सभी ने 'जन-गण-मन' पर अपनी स्वीकृति दे दी. इसके बाद कैबिनेट ने विचार करके फैसला किया कि जब तक संविधान सभा अंतिम निर्णय नहीं ले लेती, तब तक अस्थायी तौर पर 'जन-गण-मन' को राष्ट्रगान की धुन के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा. नेहरू ने अपने इस भाषण में साफ कह दिया था कि राष्ट्रगान पर अंतिम फैसला संविधान सभा लेगी. वे चाहें तो नया राष्ट्रगान भी चुन सकते हैं या कोई नई धुन उपलब्ध हो तो उसपर विचार कर सकते हैं. 

संविधान सभा में राष्ट्रगान

राष्ट्रगान पर फैसले के लिए गेंद संविधान सभा के पाले में थी. नेहरू से पश्चिम बंगाल के प्रधान मंत्री ने कहा था कि उनकी सरकार 'वंदे मातरम' को प्राथमिकता देगी. कुछ हिंदूवादी लोग भी वंदे मातरम के पक्ष में थे, लेकिन कुछ मुस्लिम सदस्यों का मानना था कि चूंकि ‘वंदे मातरम’ देवी दु्र्गा के गुणगान में लिखी गई है, इसलिए संविधान की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति के ढ़ांचे में फिट नहीं बैठता. लेकिन इन सब से इतर सबसे गंभीर मुद्दा ये था कि इस विषय पर चर्चा ही नहीं हो रही थी. 

संविधान सभा में राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज का मामला सबसे पहले सरोजनी नायडू ने 22 जुलाई 1947 को उठाया.  सेठ गोविंद दास ने 05 नवम्बर 1948 को राष्ट्रगान के सवाल पर संविधान सभा की शांति पर चिंता जताई. वहीं 15 नवम्बर 1948 को ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान घोषित करने के सरकार के फैसले के खिलाफ संशोधन प्रस्ताव पेश किया गया, लेकिन बहस नहीं हो पाई. इसके बाद 30 जुलाई 1949 को सेठ गोविंद दास ने मुद्दे पर बहस करने के लिए तारीख निर्धारित करने की मांग की, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ. 

22 जुलाई 1947 को ही संविधान सभा ने राष्ट्र ध्वज का मामला आसानी से सुलझा लिया था. कई सदस्यों का सुझाव था कि राष्ट्रगान और राष्ट्रीय भाषा पर फैसला लेने का अधिकार संसद को दे दिया जाए,लेकिन नेहरू चाहते थे कि राष्ट्रीय ध्वज की तरह राष्ट्रगान पर भी संविधान सभा ही अंतिम फैसला ले.

अखिलेश झा अपनी किताब के आधार पर बताते हैं कि संविधान सभा के लगभग 3 साल के कार्यकाल में एक भी दिन आधिकारिक तौर से राष्ट्रगान पर चर्चा के लिए तय नहीं किया गया था. कुछ लोग बीच-बीच में इसपर चर्ची की मांग करते रहे- हरि विष्णु कामथ, सेठ गोविंद दास, विशम्भर दयाल त्रिपाठी, सुरेश चंद्र मजूमदार, भगवंत राव मंडलोई, शिब्बन लाल सक्सेना और लक्ष्मीकांत मैत्रा. तीन साल के दौरान अभिवादन के रूप में वंदे मातरम् का प्रयोग केवल चार बार किया गया. इसके अलावा 1946 से 1950 के बीच वंदे मातरम केवल दो बार गाया गया. पहली बार औपचारिक तौर पर 14-15 अगस्त की मध्यरात्रि में और दूसरी बार अनौपचारिक तौर पर संविधान सभा के कार्यकाल के आखिरी दिन. 

संविधान सभा में बहस के दौरान की एक फोटो

24 जनवरी 1950 यानी भारत के गणतंत्र बनने से सिर्फ दो दिन पहले, आखिरी अनौपचारिता के रूप में संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने बिना बहस करवाए ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने की संवैधानिक घोषणा कर दी. उन्होंने ‘वंदे मातरम’ को भी वैसा ही सम्मान देने की बात कही. 

इसकी घोषणा करते हुए राजेंद्र प्रसाद कहते हैं, "एक मामला है जो चर्चा के लिए लंबित है- राष्ट्रगान. एक समय सोचा गया था कि इस मामले को सदन के सामने लाया जा सकता है और एक प्रस्ताव के माध्यम से फैसला लिया जा सकता है, लेकिन महसूस किया जा रहा है कि किसी प्रस्ताव के जरिए फैसला लेने के बजाय, अगर मैं राष्ट्रगान के संबंध में सीधे बयान जारी करूं तो बेहतर होगा."

अपने फैसले के बारे में बताते हुए वे कहते हैं, "शब्द और संगीत से बनी रचना जिसे 'जन गण मन' के नाम से जाना जाता है, भारत का राष्ट्रीय गान होगा. सरकार चाहे तो मौका आने पर इसके शब्दों में बदलाव कर सकती है. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले गीत 'वंदे मातरम' को 'जन गण मन' के बराबर का दर्जा मिलेगा. मुझे उम्मीद है कि सदस्य इससे संतुष्ट होंगे."

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