जब सारंगी ने नबील ख़ां को चुना

चार सौ साल की विरासत से टाइम्स स्क्वायर तक, एक ऐसे युवा कलाकार की कहानी जो सारंगी को संगत से निकाल दुनिया के बड़े मंच पर एकल आवाज देना चाहता है

नबील ख़ां
सारंगीवादक नबील ख़ां (फोटो- नबीलसारंगी डॉट कॉम)

राजेंद्र शर्मा

सारंगी की आवाज़ में कुछ ऐसा है जो सीधे मनुष्य के भीतर उतरता है. उसमें कंठ की करुणा है, मींड की तरलता है और उन भावों को व्यक्त करने की क्षमता है, जिन्हें शब्दों में बांधना कठिन है. लेकिन यही वाद्य साधना की दृष्टि से अत्यंत कठिन भी है. सदियों पुरानी इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और दुनिया के सामने उसकी स्वतंत्र पहचान स्थापित करने का बीड़ा दिल्ली के युवा सारंगी वादक नबील ख़ां ने उठाया है.

2 सितंबर 1999 को नई दिल्ली में जन्मे नबील ख़ां मुरादाबाद सेनिया घराने की सारंगी परंपरा की आठवीं पीढ़ी से आते हैं. उनके परिवार की संगीत-परंपरा चार सौ वर्ष से अधिक पुरानी बताई जाती है और इसकी जड़ें मियां तानसेन की परंपरा तक जाती हैं. वे पद्मभूषण से सम्मानित महान सारंगी वादक उस्ताद साबरी ख़ां के नवासे और उस्ताद नासिर ख़ां के पुत्र हैं.

संगीत उनके लिए कोई चुना हुआ पेशा नहीं था. वह तो उनके घर की हवा में घुला हुआ था. दिल्ली के पैतृक घर में सारंगी, तबला, तानपुरा और सितार की ध्वनियों के बीच उनका बचपन बीता. सात वर्ष की उम्र में उन्होंने नाना उस्ताद साबरी ख़ां से सारंगी की शिक्षा शुरू की. आगे पिता उस्ताद नासिर ख़ां और मामा उस्ताद कमाल साबरी से भी प्रशिक्षण मिला. उनके जीवन में गुरु-शिष्य परंपरा केवल संगीत सीखने का माध्यम नहीं रही, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया भी बनी.

सारंगी मैंने नहीं चुनी

बचपन में नबील क्रिकेटर बनना चाहते थे. तबले के उस्ताद ज़ाकिर हुसैन से भी वे बेहद प्रभावित थे. लेकिन धीरे-धीरे सारंगी उनके जीवन का ऐसा हिस्सा बनी कि उनके अपने शब्दों में, “मैंने सारंगी को नहीं चुना, बल्कि सारंगी ने मुझे चुना.”

यह वाक्य उनके संगीत-दर्शन को समझने की कुंजी है. उनके लिए सारंगी कोई निर्जीव वाद्य नहीं, बल्कि संवेदनशील साथी है. वे इसे भारतीय शास्त्रीय वाद्यों की ‘रानी’ कहते हैं, जो कलाकार से धैर्य, संवेदनशीलता और पूर्ण समर्पण मांगती है.

इस रिश्ते की नींव उनके नाना ने रखी. लगभग नौ वर्षों तक उन्हें अपने नाना उस्ताद साबरी ख़ां का निकट सान्निध्य मिला. सबसे भावुक स्मृति उस लगभग दो सौ वर्ष पुरानी पारिवारिक सारंगी से जुड़ी है जिस पर उनके नाना ने स्वयं अभ्यास शुरू किया था और जिस पर नबील ने भी अपनी साधना आरंभ की. पहला राग उन्होंने भैरव सीखा.

नाना से मिली सबसे बड़ी सीख हालांकि किसी राग या तकनीक से संबंधित नहीं थी. नबील बताते हैं कि उनके नाना उस्ताद साबरी ख़ां कहा करते थे कि महान कलाकार बनने से पहले अच्छा इंसान बनना जरूरी है. यही कारण है कि नबील आज अपनी विरासत को उपलब्धि से अधिक जिम्मेदारी मानते हैं.

नबील ख़ां

दिल्ली से टाइम्स स्क्वायर तक

भारतीय संगीत में सारंगी का इतिहास गौरवशाली होने के बावजूद उसकी सार्वजनिक पहचान लंबे समय तक मुख्यतः गायकों की संगत करने वाले वाद्य की रही. नबील इस धारणा को बदलना चाहते हैं. उनके वादन में गायकी अंग की भावपूर्णता के साथ तंत्रकारी अंग की ऊर्जा दिखाई देती है. मींड, गमक, आंदोलन और सूक्ष्म श्रुतियों के साथ राग का विस्तार उनकी शैली का महत्वपूर्ण पक्ष है. साथ ही लयकारी और तिहाइयों के प्रयोग से वे प्रस्तुति में आधुनिक गतिशीलता लाते हैं.

उनका लक्ष्य स्पष्ट है, सारंगी को एक स्वतंत्र एकल वाद्य के रूप में स्थापित करना ताकि उसे वायलिन, सेलो या पियानो की तरह दुनिया के बड़े कॉन्सर्ट मंचों पर स्वतंत्र सम्मान मिले. दिल्ली ने नबील को पहला मंच दिया. कमानी ऑडिटोरियम, लिटिल थिएटर ग्रुप और स्पिक मैके जैसे मंचों से शुरू हुई यात्रा आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय संगीत समारोहों तक पहुंची.

वे यूरोप, ब्रिटेन, पश्चिम एशिया, अमेरिका और दक्षिण एशिया के अनेक देशों में प्रस्तुति दे चुके हैं. उनकी आधिकारिक जीवनी में इटली, रूस, नॉर्वे, डेनमार्क, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, श्रीलंका, यूएई और अन्य देशों के आयोजनों का उल्लेख है.

संयुक्त अरब अमीरात उनके लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा. वहां उन्होंने कैंडललाइट कॉन्सर्ट्स और विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों में प्रस्तुति दी. विदेशों में सारंगी के प्रति श्रोताओं की उत्सुकता ने उन्हें यह विश्वास दिया कि भारतीय शास्त्रीय वाद्य संगीत के लिए वैश्विक स्तर पर एक बड़ा नया श्रोता-वर्ग तैयार हो सकता है.

नबील का मानना है कि विदेशी श्रोता लंबे आलाप को भी धैर्य से सुनते हैं. उनके अनुसार भारत में गायन का प्रभाव अभी भी अधिक है जबकि वाद्य संगीत को स्वतंत्र रूप से सुनने की संस्कृति को और विस्तार देने की आवश्यकता है.

अप्रैल 2026 उनके जीवन का ऐसा पड़ाव बना जिसने उनकी यात्रा को वैश्विक दृश्यता दी. न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर के प्रतिष्ठित बिलबोर्ड पर नबील ख़ां की तस्वीर और सारंगी प्रदर्शित हुई. उन्हें वहां प्रदर्शित होने वाला पहला सारंगी कलाकार बताया गया. यह महज एक कलाकार की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी. टाइम्स स्क्वायर पर सारंगी की उपस्थिति उस वाद्य के लिए भी प्रतीकात्मक क्षण थी जिसे दुनिया के बहुत से लोग शायद नाम से भी नहीं जानते थे.

नबील के लिए यह वर्षों की साधना का प्रतिफल था. लेकिन वे इसे अंतिम मंजिल नहीं मानते. उनका कहना है कि यदि इस एक दृश्य से कोई युवा सारंगी सीखने के लिए प्रेरित होता है तो यही सबसे बड़ी सफलता होगी.

नए रास्ते पर परंपरा

नबील की खासियत यह है कि वे परंपरा के भीतर रहते हुए नए रास्तों से संवाद करते हैं. वे शास्त्रीय रागदारी के साथ सूफ़ी संगीत, ग़ज़ल, लोकप्रिय धुनों और फ़्यूज़न को भी सारंगी की भाषा में प्रस्तुत करते हैं. गायन, लेखन और संगीत-रचना में भी उनकी रुचि है. दुनिया भर में सारंगी का एकल प्रदर्शन करने में मशगूल नबील ख़ां कहते हैं कि सारंगी ने उन्हें वह बनाया जो वे आज हैं और उसी ने उनके संगीतकार रूप को विकसित करने में मदद की.

उनके लिए यह परंपरा से समझौता नहीं बल्कि परंपरा का विस्तार है. उनका विश्वास है कि यदि जड़ें मजबूत हों तो कलाकार नई विधाओं से संवाद करते हुए भी अपनी पहचान नहीं खोता.

इसी दृष्टि से डिजिटल मंच, बड़े संगीत समारोह और नए तरह के कॉन्सर्ट उनके लिए महज मनोरंजन के माध्यम नहीं हैं. वे इन्हें सारंगी के नए श्रोताओं तक पहुंचने के अवसर के रूप में देखते हैं.

नबील संगीत को केवल मंचीय प्रदर्शन नहीं मानते. वे संगीत की भावात्मक और उपचारात्मक शक्ति पर भी विश्वास करते हैं. उनके लिए शास्त्रीय संगीत ने धैर्य, अनुशासन, मानसिक स्थिरता और आंतरिक शांति विकसित करने में भूमिका निभाई है.

वे चाहते हैं कि बच्चों को कम उम्र में संगीत से जोड़ा जाए. उनके अनुसार संगीत का संस्कार केवल कलाकार नहीं बनाता, वह मनुष्य को अधिक संवेदनशील भी बनाता है.

विरासत का भार नहीं, सौभाग्य

चार सौ वर्ष से अधिक पुरानी परंपरा का उत्तराधिकारी होना अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी है. नबील स्वीकार करते हैं कि बचपन में कभी-कभी उन्हें लगता था कि जब दूसरे बच्चे खेल रहे हैं, तब वे सारंगी का अभ्यास क्यों कर रहे हैं. लेकिन समय के साथ यही अभ्यास उनकी पहचान बन गया.

2015 में रूस और यूरोप की प्रस्तुतियों के बाद उन्हें लगा कि उनका रास्ता अलग है और सारंगी के साथ उनका रिश्ता महज प्रशिक्षण का नहीं, जीवन का है. आज वे अपने पूर्वजों से अलग होकर नहीं, बल्कि उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं. मंच पर बैठते समय उन्हें लगता है कि पूरी विरासत उनके साथ प्रस्तुति दे रही है.

उनका अगला सपना व्यक्तिगत प्रसिद्धि से कहीं बड़ा है- सारंगी को विश्व के महान शास्त्रीय वाद्यों की पंक्ति में स्थापित करना. वे हंस ज़िमर और कोल्डप्ले जैसे अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ काम करना चाहते हैं तथा मैडिसन स्क्वायर गार्डन और रॉयल अल्बर्ट हॉल जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर सारंगी की आवाज पहुंचाने का सपना देखते हैं.

नबील ख़ां की यात्रा इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वे विरासत को संग्रहालय की वस्तु नहीं बनने देना चाहते. वे जानते हैं कि परंपरा तभी जीवित रहती है, जब वह अपने समय से संवाद करती है. उनकी सारंगी में अपने नाना उस्ताद साबरी ख़ां की स्मृति है, तानसेन तक जाती परंपरा की गूंज है, दिल्ली की संगीत-संस्कृति की मिट्टी है और वैश्विक मंच पर नई पहचान बनाने का आत्मविश्वास भी.

दुनिया भर में मिले प्रोत्साहन से उत्साहित नबील ख़ां कहते हैं कि सारंगी ने उन्हें चुना था, अब उनका सपना है कि दुनिया भी सारंगी को चुने.

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