ट्रैवल का नया ट्रेंड : शांति, सुकून और डिजिटल डिटॉक्स

हर समय काम और जिम्मेदारियों में उलझी रहने वाली दुनिया में अब छुट्टियां तनाव कम करने, नई ऊर्जा पाने और अपने लिए समय निकालने का एक अहम जरिया बनती जा रही हैं

सांकेतिक AI इमेज
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पिछले कुछ सालों में यह देखा गया है कि भारतीयों के लिए छुट्टियां अब तनाव कम करने, नई ऊर्जा पाने और अपने लिए समय निकालने का एक अहम जरिया बनती जा रही हैं. मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और 'अनफिक्स योर फीलिंग्स' की संस्थापक आनंदिता वाघानी मानती हैं कि यह समाज में आ रहे बड़े बदलाव का संकेत है.

वे कहती हैं, "बर्नआउट अब इतना सामान्य हो गया है कि लोग इससे निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं. भले ही वह कुछ समय के लिए ही क्यों न हो. अब लोगों को यह समझ आने लगा है कि आराम करना आलस नहीं बल्कि खुद की देखभाल का हिस्सा है. यात्रा हमें वह देती है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में मिलना मुश्किल है."

आनंदिता वाघानी का मानना है कि यात्राएं कुछ नया अनुभव करने का मौका देने के साथ ही अपनी भूमिकाओं और जिम्मेदारियों से थोड़ी दूरी और बिना किसी तय उद्देश्य के कहीं रहने की आजादी देती हैं. यह रुझान खासकर युवा पेशेवरों और जेन-जी यात्रियों में साफ दिखाई दे रहा है.

अब वे यात्रा का फैसला पारंपरिक पर्यटन सूची के आधार पर नहीं बल्कि अपनी भावनात्मक जरूरतों को ध्यान में रखकर कर रहे हैं. पहले लोग यह देखते थे कि बाकी लोग कहां जा रहे हैं लेकिन अब वे यह सोचते हैं कि किस तरह की यात्रा उन्हें बेहतर महसूस कराएगी. लोग अब सोच-समझकर और आराम से यात्रा करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं. इसी वजह से धीमी रफ्तार वाले जगहों, सेहत और आराम वाले रिट्रीट, प्रकृति से जुड़े अनुभव और डिजिटल डिटॉक्स वाली छुट्टियों में रुचि बढ़ रही है.

वाघानी के मुताबिक, यात्रा का सबसे बड़ा मानसिक लाभ रोजमर्रा की दिनचर्या से बाहर निकलना है. वे कहती हैं, "हमारे तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) को भी राहत लेने का मौका मिलता है. दिनचर्या जहां एक ओर सुकून देती है, वहीं दूसरी ओर हमें एक जैसी जिंदगी में बांध देती है. हम नई चीजों को देखना, महसूस करना और समझना कम कर देते हैं लेकिन जब आप अपना माहौल बदलते हैं तो दिमाग फिर से सक्रिय हो जाता है."

माहौल में बदलाव लोगों को वर्तमान पल में जीने का एहसास कराता है जो रोजमर्रा की जिंदगी में अक्सर मुश्किल होता है. यात्रा कुछ समय के लिए हमें अपनी रोज की भूमिकाओं और उनसे जुड़ी अपेक्षाओं से भी दूर कर देती है. वाघानी कहती हैं, "कुछ दिनों के लिए आप किसी के कर्मचारी, माता-पिता या जीवनसाथी नहीं होते. यह मानसिक खुलापन आपको उन बातों से भी रूबरू करा सकता है, जिन पर पहले आपका ध्यान नहीं गया था."

विशेषज्ञों का कहना है कि यात्रा से मिलने वाले मानसिक लाभ सिर्फ लंबी विदेश यात्राओं तक सीमित नहीं हैं. छोटी छुट्टियां, वीकेंड ट्रिप या अच्छी तरह से योजना बनाकर घर के आसपास बिताई गई छुट्टियां (स्टेकेशन) भी उतना ही फायदा पहुंचा सकती हैं.

वाघानी कहती हैं, "समय से ज्यादा महत्वपूर्ण आपकी मंशा होती है. अगर आप वीकेंड पर सचमुच काम से अलग होकर ऐसा कुछ करते हैं, जिससे आपको सुकून मिलता है, तो उसका असर समुद्र किनारे बैठकर दो हफ्ते तक लगातार ऑफिस के ईमेल देखने से कहीं ज्यादा होगा. असली बात यह नहीं कि आप कितनी दूर गए, बल्कि यह है कि आप उस अनुभव में कितनी पूरी तरह शामिल हुए."

यात्रा की पसंद तय करने में प्रकृति की भी बड़ी भूमिका है. पहाड़, जंगल, नदियां और समुद्र तट जैसी जगहें उन लोगों को ज्यादा आकर्षित कर रही हैं, जो शोर-शराबे की बजाय शांति चाहते हैं. इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं. शहरों का शोर, ट्रैफिक और भीड़भाड़ हमारे दिमाग को लगातार सतर्क बनाए रखते हैं, जबकि प्राकृतिक वातावरण दिमाग को आराम और फिर से ऊर्जा हासिल करने का मौका देता है.

वाघानी 'अटेंशन रेस्टोरेशन थ्योरी' का जिक्र करती हैं. इस सिद्धांत के मुताबिक, प्रकृति में समय बिताने से दिमाग की थकी हुई मानसिक क्षमता फिर से मजबूत होती है. खासकर पानी के आसपास रहना तंत्रिका तंत्र को शांत करने में मदद करता है. वे कहती हैं, "धीमी रफ्तार वाली जगहें उस अदृश्य दबाव को कम कर देती हैं, जिसमें हम हर समय कुछ हासिल करने या साबित करने की कोशिश करते रहते हैं."

इस बदलाव की एक और वजह 'माइंडफुल ट्रैवल' का बढ़ता चलन है. आज कई युवा छुट्टियों की योजना बनाते समय मानसिक और भावनात्मक सेहत को प्राथमिकता दे रहे हैं. वाघानी कहती हैं, "जेन-जी और मिलेनियल्स मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पहले की किसी भी पीढ़ी से ज्यादा जागरूक हैं. वे अब खुद से पूछते हैं कि क्या यह मेरे लिए सही है? पहले की पीढ़ियों को इस तरह सोचने के लिए कभी प्रोत्साहित नहीं किया गया था."

हालांकि वे यह भी चेतावनी देती हैं कि असली मानसिक सुख और दिखावे वाली वेलनेस को एक जैसा नहीं समझना चाहिए. वे कहती हैं, "इस रुझान का बेहतर रूप यह है कि लोग सचमुच अपनी रफ्तार धीमी करना सीख रहे हैं, सिर्फ दिखावे के लिए ऐसा नहीं कर रहे."

हर समय ऑनलाइन रहने की आदत से दूर होने की चाहत भी डिजिटल डिटॉक्स यात्राओं को बढ़ावा दे रही है. वेलनेस रिट्रीट, बिना तकनीक वाली छुट्टियां या स्क्रीन टाइम पर सीमाएं तय करके अब कई लोग लगातार जुड़े रहने की मजबूरी से राहत पाने की कोशिश कर रहे हैं.

शायद यही वजह है कि आज सफल छुट्टियों का पैमाना यह नहीं रह गया है कि आपने कितने पर्यटन स्थल देखे या सोशल मीडिया पर कितनी तस्वीरें साझा कीं. अब यह इस बात से तय होता है कि यात्रा से लौटने के बाद आप कितना तरोताजा, वर्तमान में जीने वाला और खुद से पहले से ज्यादा जुड़ा हुआ महसूस करते हैं.

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