अब 100 साल की उम्र में भी सर्जरी मुमकिन, कैसे बदल रहा मेडिकल साइंस?

उम्र बढ़ने के साथ बड़ी सर्जरी का जोखिम बढ़ता है लेकिन आधुनिक तकनीक ने तस्वीर बदली है. अब डॉक्टर उम्र से ज्यादा मरीज की कुल सेहत पर ध्यान देते हैं

बुजुर्ग मरीजों को अब ज्यादा समय तक बिस्तर पर नहीं रखा जाता (सांकेतिक तस्वीर)

104 साल की उम्र में ज्यादातर लोग मानेंगे कि बड़ी सर्जरी का सवाल ही नहीं उठता. लेकिन सऊदी अरब के नागरिक ताहेर अली अलहाशिम, घुटनों की गंभीर समस्या के कारण बिस्तर पर रहने को मजबूर हो गए थे. उम्र के इस पड़ाव होने के बावजूद मुंबई के पवई स्थित डॉ. एल. एच. हीरानंदानी अस्पताल में एक ही दिन उनके दोनों घुटनों का प्रत्यारोपण किया गया.

अलहाशिम के सर्जन डॉ. संजीव जैन ने बताया कि उनकी हड्डियां मजबूत थीं और कुल मिलाकर स्वास्थ्य भी अच्छा था. इसी वजह से उम्र के बावजूद उन्हें सर्जरी के लिए उपयुक्त माना गया. सर्जरी के बाद वे दोबारा चलने लगे.

इस मामले से एक बड़ा सवाल उठता है: क्या चिकित्सा विज्ञान ने सर्जरी के लिए डॉक्टरों की नजर में ‘बहुत ज्यादा उम्र’ की परिभाषा बदल दी है? अब सिर्फ उम्र को निर्णायक नहीं माना जाता. डॉक्टर इसके बजाय शारीरिक कमजोरी, दिल और फेफड़ों की सेहत, मानसिक क्षमता, हड्डियों की मजबूती, पोषण और बीमारी से पहले मरीज कितनी स्वतंत्रता से जीवन जी रहा था, इन सबको देखते हैं.

बुजुर्गों की सर्जरी के साथ ही उनका रिकवरी प्लान भी तैयार किया जाता है (सांकेतिक तस्वीर)

चिकित्सा क्षेत्र में हुए पांच बड़े बदलावों ने बहुत अधिक उम्र में भी बड़ी सर्जरी को संभव बनाने में मदद की है.

डॉक्टर शरीर की वास्तविक स्थिति देखते हैं

सर्जरी से पहले मरीज की जांच अब ज्यादा विस्तृत हो गई है. किसी 80, 90 या यहां तक कि 100 साल के व्यक्ति को सिर्फ उम्र के आधार पर सर्जरी के लिए अयोग्य नहीं माना जाता. डॉक्टर उसकी शारीरिक कमजोरी, पहले से मौजूद बीमारियों, दवाओं, चलने-फिरने की क्षमता और शरीर की बीमारी या सर्जरी से निपटने की क्षमता का आकलन करते हैं. 

अलहाशिम के मामले में उनकी हड्डियों की मजबूती और कुल मिलाकर अच्छी सेहत यह तय करने में अहम रही कि सर्जरी की जा सकती है.

एनेस्थीसिया अब ज्यादा सुरक्षित

आधुनिक एनेस्थीसिया को बुजुर्ग मरीज के दिल और सांस से जुड़ी स्थिति के हिसाब से तैयार किया जा सकता है. शरीर के किसी खास हिस्से को सुन्न करने की तकनीक, नसों को सुन्न करने वाली दवाएं और बेहतर निगरानी की मदद से एनेस्थीसिया देने वाले डॉक्टर ऑपरेशन के दौरान दर्द को नियंत्रित करते हुए शरीर पर पड़ने वाले दबाव को कम कर सकते हैं. 

लगातार निगरानी से रक्तचाप, ऑक्सीजन के स्तर या दिल की धड़कन में होने वाले छोटे बदलावों का भी तुरंत पता लगाया जा सकता है.

सर्जरी ज्यादा सटीक हो गई है

बेहतर उपकरणों, कंप्यूटर की मदद से सर्जरी की योजना बनाने और रोबोट की सहायता वाली तकनीकों से डॉक्टर हड्डी को काटने और प्रत्यारोपण को सही जगह लगाने की प्रक्रिया को पहले से कहीं ज्यादा सटीक तरीके से कर सकते हैं. 

2025 में घुटना प्रत्यारोपण से जुड़े 21 अलग-अलग चिकित्सा परीक्षणों के नतीजों का विश्लेषण किया गया. इन परीक्षणों में कुल 2,692 मरीज शामिल थे. विश्लेषण में देखा गया कि रोबोट की मदद से की गई सर्जरी में पारंपरिक सर्जरी की तुलना में घुटने के प्रत्यारोपण की स्थिति में गलतियां कम हुईं.

हालांकि इससे कम समय में मरीज की कार्यक्षमता बेहतर होने का कोई लगातार स्पष्ट फायदा नहीं मिला. फिर भी जटिल मामलों में और ऐसे मरीजों में जहां डॉक्टर अनावश्यक रूप से टिश्यू को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहते हैं, ज्यादा सटीकता उपयोगी हो सकती है.

दर्द आसानी से मैनेज किया जाता है

पहले घुटना प्रत्यारोपण में काफी खून बहता था मरीजों को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ता था और दर्द की दवाओं पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ता था. अब खून की कमी को नियंत्रित करने की बेहतर तकनीकों, सर्जरी के बेहतर तरीकों और अलग-अलग तरीकों से दर्द कम करने वाली दवाओं के इस्तेमाल से इनमें से कुछ परेशानियां कम हुई हैं. 

बुजुर्गों के लिए दर्द को बेहतर तरीके से नियंत्रित करना खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वे जल्द चलना-फिरना शुरू कर सकते हैं. लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहने से मांसपेशियों की ताकत, चलने-फिरने की क्षमता और आत्मनिर्भरता तेजी से कम हो सकती है.

रिकवरी अब बहुत पहले शुरू हो जाती है

शायद सबसे बड़ा बदलाव सर्जरी के बाद की प्रक्रिया में आया है. बुजुर्ग मरीजों को अब आम तौर पर कई दिनों तक बिस्तर पर नहीं रखा जाता. फिजियोथेरेपिस्ट मरीज की स्थिति के मुताबिक उसे जितनी जल्दी और सुरक्षित तरीके से संभव हो बैठाने, खड़ा करने और चलाने की कोशिश करते हैं. 

पोषण, खून के थक्के बनने से बचाव, सांस से जुड़े व्यायाम और सर्जरी के साथ ही मरीज की रिकवरी की योजना भी बनाई जाती है. इन्हें बाद में किए जाने वाले काम के तौर पर नहीं देखा जाता.

इसका मतलब यह नहीं है कि हर 100 साल के व्यक्ति या यहां तक कि हर 80 साल के व्यक्ति की बड़ी सर्जरी की जानी चाहिए. अलहाशिम के मामले की खास बात सिर्फ यह नहीं है कि सर्जनों ने इतनी उम्र में सर्जरी करने का फैसला किया. 

असल बदलाव यह है कि आधुनिक चिकित्सा अब तेजी से एक अलग सवाल पूछ रही है: "इस मरीज की उम्र कितनी है?" के बजाय "इस खास मरीज की सेहत और बीमारी से उबरने की क्षमता कितनी अच्छी है?"

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