क्लाइमेट चेंज हर साल छीन रहा भारतीयों की 64 घंटे की नींद!

मेडिकल जर्नल 'लैंसेट' की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ी गर्मी की वजह से भारतीयों को नींद की कमी के साथ-साथ लू, कामकाजी घंटों के नुकसान और संक्रमण के बढ़ते खतरों से जूझना पड़ सकता है

(इलस्ट्रेशन : सिद्धांत जुमडे)

गर्मियों में रात को ठीक से नींद न आना भारतीयों को थकाने के साथ चिड़चिड़ा भी बना रहा है. इसका असर उनकी सेहत और कामकाज पर भी पड़ रहा है. मेडिकल जर्नल लैंसेट  की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ते तापमान की वजह से भारतीय हर साल औसतन 64 घंटे की नींद खो रहे हैं. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन लोगों की सेहत, काम करने की क्षमता और आजीविका पर लगातार असर डाल रहा है.

27 अक्टूबर को जारी 'द लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज 2026' रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 से 2025 के बीच रात के समय ज्यादा तापमान रहने के कारण भारतीयों की नींद मेंहर साल औसतन 64 घंटे की कमी आई. अगर हर रात आठ घंटे की नींद का हिसाब लगाया जाए तो यह करीब आठ पूरी रातों के बराबर है. यह 1986 से 2005 के बीच दर्ज सालाना औसत से करीब तीन घंटे ज्यादा है.

ये नतीजे उन लोगों के लिए खास तौर पर चिंता की बात हैं जो ऐसे घरों में रहते हैं जहां हवा आने-जाने की अच्छी व्यवस्था नहीं है और एयर कंडीशनर भी नहीं है. आमतौर पर सूरज डूबने के बाद तापमान कम होने लगता है लेकिन कंक्रीट की इमारतें और सड़कें दिनभर की गर्मी को अपने अंदर जमा कर लेती हैं. इस वजह से शहरों के कई इलाकों में देर रात तक गर्मी बनी रहती है और लोगों को राहत नहीं मिल पाती.

अच्छी नींद के लिए शरीर का तापमान कम होना जरूरी है. जब आसपास का तापमान ज्यादा बना रहता है तो नींद आने में मुश्किल होती है. नींद बार-बार टूट सकती है और शरीर को आराम करने का पूरा मौका नहीं मिल पाता.

नींद में कमी मूड और मेटाबॉलिक हेल्थ पर बुरा असर डालती है (सांकेतिक तस्वीर)

बार-बार नींद टूटने से एकाग्रता (कंसंट्रेशन) , मूड और मेटाबॉलिक हेल्थ पर असर पड़ सकता है. लंबे समय तक गर्मी में रहने से दिल और नसों पर भी ज्यादा दबाव पड़ता है. बुजुर्गों और पहले से दिल की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए यह खतरा और बढ़ जाता है.

रिपोर्ट के ये नतीजे हर भारतीय घर में सीधे तौर पर की गई निगरानी पर आधारित नहीं हैं बल्कि आंकड़ों के आधार पर लगाए गए अनुमान हैं. नींद से जुड़े आंकड़े जुटाने के लिए शोधकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय रिसर्च का सहारा लिया. इसमें फिटनेस डिवाइस से मिले अरबों आंकड़ों के साथ तापमान से जुड़े आंकड़ों का भी इस्तेमाल किया गया.

शोधकर्ताओं ने माना है कि ऐसे डिवाइस रखने वाले लोग आमतौर पर आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में होते हैं. इस वजह से गरीब परिवारों पर पड़ने वाला असली असर इन आंकड़ों में कम दिखाई दे सकता है.

नींद में कमी भारत में बढ़ती गर्मी से होने वाली परेशानी का सिर्फ एक हिस्सा है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2025 के बीच भारतीयों ने हर साल औसतन 10.6 दिन लू (हीटवेव) का सामना किया. इनमें से आधे दिन मानव-जनित जलवायु परिवर्तन (ह्यूमन-ड्रिवेन क्लाइमेट चेंज) के कारण थे. दूसरे शब्दों में, अगर जलवायु परिवर्तन नहीं होता तो भारतीयों को हर साल हीटवेव का सामना करीब पांच दिन ही करना पड़ता.

गर्मी लोगों की आजीविका पर भी भारी पड़ रही है. 2016 से 2025 के बीच भारत में हर साल करीब 193 अरब कामकाजी घंटों का नुकसान हुआ. इसकी वजह यह थी कि ज्यादा तापमान के कारण शारीरिक मेहनत करना मुश्किल या असुरक्षित हो गया था. वर्किंग आवर्स का यह नुकसान 1990 के दशक के सालाना औसत से 75 फीसदी ज्यादा है.

इसका आर्थिक नुकसान भी काफी बड़ा है. 2025 में गर्मी के कारण वर्किंग कैपेसिटी घटने से संभावित कमाई का नुकसान भारत की GDP के 4.2 फीसदी के बराबर रहा, जबकि दुनियाभर में यह आंकड़ा 0.91 फीसदी था. ये आंकड़े संभावित नुकसान के मॉडल-आधारित अनुमान हैं. इनका मतलब यह नहीं है कि मजदूरों की सैलरी से सीधे तौर पर इतनी रकम कम हुई है.

गर्मी से जुड़े सेहत के खतरे सिर्फ लू लगने और नींद पूरी न होने तक सीमित नहीं हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, एडीज एल्बोपिक्टस मच्छर के जरिए डेंगू फैलने के लिए अनुकूल जलवायु परिस्थितियों में 1950 के दशक के मुकाबले 84 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. मलेरिया फैलने के लिए अनुकूल महीनों की संख्या भी बढ़ी है. इससे वह अवधि लंबी हो सकती है, जिसके दौरान संक्रमण फैल सकता है.

भारत के लिए ये नतीजे सेहत से जुड़ी एक ऐसी बढ़ती चुनौती की ओर इशारा करते हैं जिससे निपटने के लिए सिर्फ लू को लेकर चेतावनी जारी करना काफी नहीं होगा. इसके लिए बेहतर घर, शहरों में ठंडी जगहें, पीने के पानी की सुविधा और बाहर काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा जैसे कदम उठाना भी जरूरी हो सकता है. इसकी वजह यह है कि गर्म दिन के बाद रात में भी लोगों को गर्मी से राहत नहीं मिल पा रही है.

Read more!