'साइलेंट किलर' क्यों हैं हेपेटाइटिस B और C, कैसे करें इनकी पहचान?
हेपेटाइटिस B और C लंबे समय तक चुपचाप बढ़ सकते हैं. हाई रिस्क वाले लोगों के लिए समय रहते स्क्रीनिंग कराना गंभीर लिवर बीमारी से बचाव में अहम है

हेपेटाइटिस B और C अक्सर वर्षों तक बिना किसी लक्षण के बढ़ते रहते हैं और चेतावनी के संकेत दिखने से काफी पहले लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं. फोर्टिस हॉस्पिटल्स, मुंबई के सीनियर कंसल्टेंट-हेपेटोलॉजी और लिवर ट्रांसप्लांट सर्जरी डॉ. विक्रम राउत बताते हैं कि लिवर सिरोसिस, लिवर फेल्योर और लिवर कैंसर से बचाव के लिए समय रहते जांच क्यों जरूरी है.
ज्यादातर लोगों को लगता है कि अगर उन्हें लिवर की कोई गंभीर बीमारी है तो उन्हें पीलिया, तेज दर्द या स्पष्ट लक्षण जरूर दिखाई देंगे. लेकिन हेपेटाइटिस B और हेपेटाइटिस C के मामले में ऐसा नहीं है.
इन संक्रमणों को अक्सर ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है क्योंकि ये बिना कोई खास लक्षण पैदा किए वर्षों तक चुपचाप लिवर को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
इसका एक बड़ा कारण लिवर की बहुत अधिक कार्यक्षमता और दोबारा खुद को बनाने की क्षमता है. शरीर के कामकाज के लिए हमें सामान्य लिवर के सिर्फ 30 फीसदी हिस्से की जरूरत होती है. भारत में 30 करोड़ लोग हेपेटाइटिस B या C के साथ जी रहे हैं और उन्हें पता ही नहीं है कि वे संक्रमित हैं.
कई लोगों को इस बीमारी का पता तब चलता है, जब उन्हें लिवर सिरोसिस, लिवर फेल्योर या यहां तक कि लिवर कैंसर हो जाता है.
इन संक्रमणों को नजरअंदाज किए जाने की सबसे बड़ी वजहों में से एक यह है कि शुरुआती लक्षण स्पष्ट नहीं होते और उन्हें आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाता है. व्यक्ति को हल्की थकान, भूख कम लगना, कभी-कभार मितली, शरीर में दर्द या कमजोरी महसूस हो सकती है.
इन लक्षणों को आमतौर पर तनाव, नींद की कमी, बढ़ती उम्र या व्यस्त जीवनशैली से जोड़ दिया जाता है. शुरुआती चरण में आमतौर पर दर्द, बुखार या पीलिया नहीं होता इसलिए लोग लिवर की जांच कराने के बारे में शायद ही सोचते हैं.
एक और चुनौती जागरूकता की कमी है. बहुत से लोगों को लगता है कि हेपेटाइटिस सिर्फ शराब पीने या खराब खान-पान और स्वच्छता की वजह से फैलता है. हकीकत में हेपेटाइटिस B संक्रमित खून, असुरक्षित यौन संपर्क या प्रसव के दौरान संक्रमित मां से उसके बच्चे में फैल सकता है.
हेपेटाइटिस C मुख्य रूप से संक्रमित खून के जरिए फैलता है. इसका संक्रमण असुरक्षित इंजेक्शन, बिना स्टेरलाइज किए गए चिकित्सा या दंत चिकित्सा उपकरणों, संक्रमित उपकरणों से टैटू बनवाने या सुई साझा करने से हो सकता है.
कई संक्रमित लोगों को ठीक-ठीक पता नहीं होता कि उन्हें यह संक्रमण कब या कैसे हुआ. अच्छी बात यह है कि दोनों संक्रमणों का पता एक साधारण ब्लड टेस्ट से लगाया जा सकता है. हेपेटाइटिस B को आधुनिक एंटीवायरल दवाओं से प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है. इससे लिवर को होने वाले नुकसान को रोकने में मदद मिलती है.
हेपेटाइटिस C को अब ज्यादातर मामलों में कुछ महीनों तक खाने वाली दवाओं से पूरी तरह ठीक किया जा सकता है. समय रहते बीमारी का पता चलने से लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर का खतरा काफी कम हो जाता है.
कुछ लोगों को विशेष रूप से सतर्क रहना चाहिए. इनमें हेपेटाइटिस B का पारिवारिक इतिहास रखने वाले लोग, स्वास्थ्यकर्मी, वे लोग जिन्हें नियमित जांच शुरू होने से पहले खून चढ़ाया गया हो, डायलिसिस कराने वाले मरीज, एक से अधिक यौन साथी रखने वाले लोग, इंजेक्शन के जरिए नशीली दवाओं के इस्तेमाल का इतिहास रखने वाले लोग और ऐसे लोग शामिल हैं जिनकी लिवर फंक्शन टेस्ट रिपोर्ट लगातार असामान्य आती रही है.
हेपेटाइटिस B से टीकाकरण के जरिए भी बचा जा सकता है. हर नवजात को हेपेटाइटिस B का टीका दिया जाना चाहिए. जिन वयस्कों को कभी यह टीका नहीं लगा है उन्हें अपने डॉक्टर से टीकाकरण के बारे में बात करनी चाहिए. फिलहाल हेपेटाइटिस C का कोई टीका उपलब्ध नहीं है. हालांकि सुरक्षित चिकित्सा प्रक्रियाओं और खून की जांच से नए संक्रमण के मामलों में काफी कमी आई है.
कुल मिलाकर संदेश सीधा है : लक्षणों का इंतजार न करें. अगर आप ज्यादा जोखिम वाले समूह में आते हैं या आपने कभी जांच नहीं कराई है, तो अपने डॉक्टर से हेपेटाइटिस B और C की जांच के बारे में पूछें.
आज ब्लड टेस्ट कराने में लगाए गए कुछ मिनट कल होने वाली जानलेवा लिवर बीमारी से बचा सकते हैं. समय रहते पता चलने पर इन खामोश संक्रमणों को नियंत्रित किया जा सकता है और हेपेटाइटिस C के मामले में अक्सर पूरी तरह ठीक भी किया जा सकता है. इससे लोग लंबी और स्वस्थ जिंदगी जी सकते हैं.