क्यों बढ़ रही है दोस्ती से जुड़े मामलों में थेरेपी की जरूरत ?

थेरेपिस्ट के पास अब दोस्ती से जुड़े मामले पहले के मुकाबले ज्यादा पहुंच रहे हैं. विशेषज्ञ इसकी वजह 'फ्रेंडशिप बर्नआउट' और रिश्तों से बढ़ती भावनात्मक अपेक्षाओं को मान रहे हैं

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इन दिनों दोस्ती के साथ कई चुनौतियां जुड़ गई हैं

जब गुरुग्राम में रहने वाली 30 वर्षीय मार्केटिंग प्रोफेशनल अदिति मेहरा को यह महसूस हुआ कि वे वीकेंड ब्रंच पर जाने से भी बचना चाहती हैं, तब उन्हें समझ आया कि कुछ बदल गया है.

वे कहती हैं, "मैं अकेली नहीं थी बल्कि थक चुकी थी. बहुत सारे वॉट्सऐप ग्रुप, जन्मदिन की डिनर पार्टियां और भावनात्मक बातचीत थीं. जब भी मैं जल्दी जवाब नहीं देती थी या किसी प्लान के लिए मना करती थी तो मुझे अपराधबोध होता था."

पिछले एक साल में उन्होंने जानबूझकर अपना सामाजिक दायरा छोटा कर लिया. वे कहती हैं, "अब मेरे दोस्त कम हैं लेकिन मेरे रिश्ते पहले से ज्यादा स्वस्थ महसूस होते हैं."

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अदिति का अनुभव शहरी भारत के युवाओं में तेजी से उभरते एक नए रुझान को दिखाता है. अकेलेपन के साथ-साथ अब कई लोग एक और समस्या का सामना कर रहे हैं, जिसे 'फ्रेंडशिप बर्नआउट' कहा जा रहा है. यानी ऐसी दोस्तियों से भावनात्मक रूप से थक जाना, जिनमें लगातार समय, ध्यान और भावनात्मक स्वीकार्यता की अपेक्षा की जाती है.

मनोवैज्ञानिक रोहिणी खट्टर कहती हैं कि उन्होंने अपने काम में एक स्पष्ट बदलाव देखा है. वे बताती हैं, "कुछ साल पहले ज्यादातर लोग प्रेम संबंधों की समस्याएं लेकर आते थे. अब दोस्ती से जुड़े मामलों की संख्या कहीं ज्यादा हो गई है."

खट्टर कहती हैं, "लोग धोखा, बदलते रिश्तों और जिसे मैं 'लव-हेट फ्रेंडशिप' कहती हूं, उससे जूझ रहे हैं. वे अपने दोस्तों से गहराई से जुड़े होते हैं लेकिन उन्हीं से सबसे ज्यादा आहत भी होते हैं."

आज दोस्ती से पहले की तुलना में कहीं ज्यादा भावनात्मक अपेक्षाएं जुड़ गई हैं. दोस्तों से उम्मीद की जाती है कि वे थेरेपिस्ट, यात्रा साथी, आपातकालीन संपर्क और किसी बुरे दिन के बाद सबसे पहले फोन करने वाले व्यक्ति भी बनें. सोशल मीडिया ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है. किसी संदेश का जवाब न मिलना, स्टोरी न देखना या किसी को किसी कार्यक्रम में शामिल न करना, जल्दी ही नाराजगी की वजह बन सकता है.

खट्टर कहती हैं कि एक और बात साफ नजर आती है, "लोग चाहते हैं कि दोस्ती वैसी ही बनी रहे जैसी 22 साल की उम्र में थी. जबकि करियर, शादी और जिम्मेदारियों के साथ प्राथमिकताएं स्वाभाविक रूप से बदलती हैं. लोग इस दूरी को अस्वीकृति की तरह देखने लगते हैं."

काम के लंबे घंटे, दूसरे शहर में जाना और व्यस्त दिनचर्या के कारण लोगों के पास दोस्ती निभाने के लिए पहले से कम समय है. इसके बावजूद हर समय उपलब्ध रहने की अपेक्षा बढ़ती जा रही है. यही असंतुलन अब थेरेपी क्लीनिकों तक पहुंच रहा है.

इसका मतलब यह नहीं है कि दोस्ती की अहमियत कम हो रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कुछ बदला है तो वह यह है कि दोस्ती पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण और भावनात्मक रूप से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गई है. जब दोस्त भावनात्मक सहारे के लिए परिवार, समुदाय और कई बार प्रेम संबंधों की जगह लेने लगे हैं तो इन रिश्तों पर दबाव भी बढ़ गया है. आज शहरी भारत के कई लोगों के लिए सबसे बड़ी रिश्तों की चुनौती प्यार ढूंढ़ना नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से थके बिना अच्छी दोस्ती बनाए रखना हो सकती है.

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