साड़ी में 106 पुल-अप्स कर संयुक्ता ने छेड़ी महिलाओं की फिटनेस पर बहस
फिटनेस एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को सिर्फ पुरुषों और बॉडीबिल्डिंग से जोड़कर देखने के कारण महिलाएं इसके कई फायदों से वंचित रह सकती हैं

अभिनेत्री संयुक्ता हेगड़े ने हाल ही में महिलाओं और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को लेकर एक असामान्य मिसाल पेश की. उन्होंने साड़ी पहनकर एक घंटे में 106 पुल-अप्स किए. सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो में हेगड़े ने कहा कि महिलाएं जिम में “किसी पुरुष को हराने” के लिए नहीं बल्कि अपनी सेहत से जुड़े डर पर काबू पाने के लिए जाती हैं.
इस उपलब्धि ने एक बार फिर उस मुद्दे पर बहस छेड़ दी है, जिसकी फिटनेस विशेषज्ञ वर्षों से वकालत करते रहे हैं: महिलाओं को सिर्फ वजन घटाने के लिए नहीं बल्कि शारीरिक ताकत बढ़ाने के लिए भी ट्रेनिंग करनी चाहिए.
दशकों से महिलाओं की फिटनेस को मुख्य रूप से चुस्त दिखने यानी वजन घटाने, कैलोरी बर्न करने और कार्डियो करने के इर्द-गिर्द ही पेश किया जाता रहा है. वहीं स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को अक्सर पुरुषों और बॉडीबिल्डिंग से जोड़कर देखा गया है. फिटनेस एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस सोच के कारण महिलाएं एक्सरसाइज के कुछ सबसे अहम फायदों से वंचित रह सकती हैं.
फिटनेस एक्सपर्ट और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर दीक्षा छाबड़ा कहती हैं, “महिलाएं अक्सर मुझसे कहती हैं कि वे वजन नहीं उठाना चाहतीं क्योंकि उन्हें डर है कि उनका शरीर भारी-भरकम हो जाएगा लेकिन सही तरीके से स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने से किसी महिला का शरीर अचानक भारी-भरकम नहीं हो जाता. इससे मांसपेशियां मजबूत होती हैं, शरीर की ताकत बढ़ती है और बॉडी कंपोजिशन बेहतर होता है. इसलिए ध्यान वजन उठाने से डरने के बजाय सही तकनीक के साथ धीरे-धीरे और निरंतर ट्रेनिंग बढ़ाने पर होना चाहिए.”
शोध भी अब तेजी से इन बातों की पुष्टि कर रहे हैं. 2026 में प्रकाशित 126 अध्ययनों के एक सिस्टमेटिक रिव्यू और मेटा-विश्लेषण में 4,000 से अधिक वयस्क महिलाओं को शामिल किया गया. इसमें पाया गया कि रेजिस्टेंस ट्रेनिंग से मेनोपॉज यानी माहवारी बंद होने से पहले और बाद, दोनों ही अवस्थाओं में महिलाओं की मांसपेशियों की ताकत में काफी सुधार हुआ. इसके साथ ही, काम करने वाली मांसपेशियों की मात्रा में बढ़ोतरी और बॉडी फैट में कमी देखी गई.
महिलाओं की उम्र बढ़ने के साथ इसके फायदे और भी अहम हो जाते हैं. उम्र बढ़ने पर मांसपेशियों का आकार और ताकत कम होने लगती है. वहीं, मेनोपॉज के आसपास एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर गिरने से हड्डियां तेजी से कमजोर होने लगती हैं. रेजिस्टेंस एक्सरसाइज से मांसपेशियों और हड्डियों पर नियंत्रित दबाव पड़ता है, जिससे शरीर खुद को मजबूत बनाने के लिए बदलाव करता है. मेनोपॉज के बाद की महिलाओं पर किए गए कई परीक्षणों के हालिया विश्लेषण में पाया गया कि रेजिस्टेंस ट्रेनिंग से शरीर के अहम हिस्सों, जैसे रीढ़ के निचले हिस्से, कूल्हे (हिप) और जांघ की हड्डी के ऊपरी सिरे (फीमोरल नेक) में हड्डियों का घनत्व बढ़ सकता है.
शरीर का मजबूत होना रोजमर्रा के कामों में भी मदद करता है. सामान उठाना, सीढ़ियां चढ़ना, किराने का सामान या बच्चों को उठाकर ले जाना, फर्श से उठना और शरीर का संतुलन बनाए रखना जैसे काम आसान हो सकते हैं. इसलिए जीवन के शुरुआती दौर में ताकत बढ़ाने को सिर्फ जिम के लक्ष्य के तौर पर नहीं बल्कि आगे चलकर आसानी से चलने-फिरने और दूसरों पर निर्भर हुए बिना अपने काम करने की क्षमता बनाए रखने में भी मदद करता है.
हालांकि लंबे समय तक एक्सरसाइज न करने के बाद सीधे भारी वजन उठाने या सही तकनीक सीखे बिना मुश्किल एक्सरसाइज करने से चोट लग सकती है. हेल्थ और फिटनेस फ्रेंचाइजी एनीटाइम फिटनेस की वाइस प्रेसिडेंट डॉ. ऋचा मिश्रा कहती हैं, “कभी-कभी पर्सनल ट्रेनर की मदद लेना बेहद जरूरी हो सकता है, खासकर तब जब आप एक्सरसाइज शुरू कर रही हों. हर व्यक्ति का शरीर, फिटनेस का पिछला अनुभव और सहनशक्ति अलग-अलग होती है. ट्रेनर यह तय करने में मदद कर सकता है कि आपके लिए किस तरह की एक्सरसाइज, कितना वजन और किस गति से आगे बढ़ना सही रहेगा. वह एक्सरसाइज करने के आपके तरीके को भी सुधार सकता है ताकि बहुत जल्दी बहुत कुछ करने की कोशिश में आपको चोट न लगे.”
एक्सपर्ट्स का कहना है कि महिलाओं के लिए 106 पुल-अप्स करना जरूरी नहीं है. ताकत बढ़ाने वाली एक्सरसाइज अपने शरीर के वजन, रेजिस्टेंस बैंड या हल्के वजन के साथ भी शुरू की जा सकती है. इसके बाद धीरे-धीरे एक्सरसाइज का स्तर बढ़ाया जा सकता है. महिलाओं के लिए सबसे बड़ा बदलाव शायद सिर्फ इतना है कि वे केवल वजन कम करने के लिए एक्सरसाइज करने के बजाय खुद को मजबूत बनाने के लिए भी एक्सरसाइज करना शुरू करें.