भारत में बच्चे के जन्म के बाद मांओं की मुश्किलें कम क्यों नहीं हो पा रहीं?
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक, गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान जरूरी मेडिकल देखभाल तो मिल रही है लेकिन छह महीने से कम उम्र के बच्चों के लिए ब्रेस्ट फीडिंग की दर घट रही है

NFHS-6 में ब्रेस्ट फीडिंग से जुड़े चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं (सांकेतिक तस्वीर)
भारत में गर्भावस्था और डिलीवरी के दौरान महिलाओं को मिलने वाली मेडिकल सुविधाएं बेहतर हुई हैं लेकिन बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती महीनों में मां और बच्चे को मिलने वाली देखभाल में वैसा सुधार नहीं आया है.
2023-24 में हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 (NFHS-6) के आंकड़ों के मुताबिक, 95.9 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान जरूरी मेडिकल देखभाल मिल रही है. वहीं, 90.6 प्रतिशत बच्चों का जन्म अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों में हो रहा है. 2019-21 में हुए NFHS-5 में ये आंकड़े 92.6 प्रतिशत और 88.6 प्रतिशत थे.
इसके बावजूद, छह महीने से कम उम्र के बच्चों को सिर्फ मां का दूध पिलाने की दर में तेज गिरावट आई है. 2023-24 में यह आंकड़ा 55.8 प्रतिशत रहा, जबकि 2019-21 में 63.7 प्रतिशत था. हालांकि, बच्चे के जन्म के तुरंत बाद ब्रेस्टफीड कराने के मामले में सुधार हुआ है. अब 50.1 प्रतिशत बच्चों को जन्म के एक घंटे के अंदर ब्रेस्टफीड कराया जाता है, जबकि पहले यह आंकड़ा 41.8 प्रतिशत था लेकिन ये आंकड़े बताते हैं कि गर्भावस्था और डिलीवरी के दौरान मां को मिलने वाली मेडिकल देखभाल और बच्चे के जन्म के बाद ब्रेस्टफीड कराने में मिलने वाली मदद के बीच अंतर बढ़ रहा है.
2023 में द लैंसेट में छपी एक रिसर्च के मुताबिक, सिर्फ मां का दूध पीने वाले बच्चों में दस्त, सांस से जुड़े संक्रमण और अस्पताल में भर्ती होने का खतरा कम रहता है. इससे बच्चे की सेहत और विकास भी बेहतर तरीके से होता है.
नई दिल्ली के अपोलो क्रैडल की लैक्टेशन एक्सपर्ट दिव्या मलिक धवन ब्रेस्टफीड के एक और फायदे के बारे में बताती हैं. धवन का कहना है, "लोग यह नहीं समझते कि ब्रेस्टफीड सिर्फ बच्चे के लिए ही जरूरी नहीं है. इससे मां की सेहत को भी कई फायदे मिलते हैं."
ब्रेस्टफीड कराने पर शरीर में ऑक्सीटोसिन हार्मोन रिलीज होता है. इससे बच्चे के जन्म के बाद गर्भाशय को सिकुड़ने में मदद मिलती है और ज्यादा ब्लीडिंग का खतरा कम होता है. लंबे समय तक ब्रेस्टफीड कराने वाली महिलाओं में आगे चलकर ब्रेस्ट और ओवरी के कैंसर, टाइप 2 डायबिटीज और दिल की बीमारियों का खतरा भी कम देखा गया है.
डॉक्टरों का कहना है कि ब्रेस्टफीड की दर में कमी की वजह शरीर से ज्यादा बदलता हुआ रहन-सहन है. कई शहरी महिलाएं बच्चे के जन्म के कुछ ही महीनों बाद काम पर लौट जाती हैं. उन्हें ब्रेस्टफीड के लिए सही मदद नहीं मिल पाती या बच्चे के जन्म के शुरुआती दिनों में उन्हें लगता है कि उनका दूध कम बन रहा है.
ऐसे में कई बार बच्चे को जल्दी ही फॉर्मूला दूध देना शुरू कर दिया जाता है. इसके अलावा, सोशल मीडिया पर बच्चे को कितनी देर में दूध पिलाना चाहिए, वह कितनी देर सोता है और उसका वजन कितना बढ़ रहा है, ऐसी बातों को लेकर वे अक्सर दूसरी माताओं से अपनी तुलना करने लगती हैं. इससे उनकी चिंता और बढ़ जाती है.
सीनियर कंसल्टेंट ऑब्स्टेट्रिक्स और गायनेकोलॉजी (गर्भावस्था और स्त्री रोग विशेषज्ञ) डॉ. प्रीति प्रभाकर शेट्टी के मुताबिक, "मां के फैसले को सिर्फ उसकी सुविधा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए. हमें यह समझना होगा कि ब्रेस्टफीड के दौरान उसे किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. इसके लिए ऐसी मदद और सुविधाओं को बेहतर करना जरूरी है, जो मां को सफलतापूर्वक ब्रेस्टफीड कराने में मदद कर सकें."
शेट्टी के अनुसार, सी-सेक्शन से होने वाली डिलीवरी का बढ़ना, बच्चे के जन्म के बाद मां और बच्चे का तुरंत स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट न होना, मां की थकान, बच्चे को जल्दी फॉर्मूला दूध देना, ट्रेनिंग पाए लैक्टेशन काउंसलर की कमी और काम पर जल्दी लौटने का दबाव, इन सभी वजहों से बच्चे को सिर्फ मां का दूध पिलाना मुश्किल हो जाता है.
एक और समस्या लोगों की सोच से जुड़ी है. डॉ. प्रीति प्रभाकर शेट्टी के मुताबिक, "सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह है कि ब्रेस्टफीडिंग अपने आप और बिना किसी परेशानी के हो जानी चाहिए. लेकिन मां और बच्चे दोनों को इसे सीखना पड़ता है. इसके लिए सही सलाह, धैर्य और मदद जरूरी है."
ब्रेस्टफीड में दिक्कत होने पर कई महिलाओं को लगता है कि उनका दूध बच्चे के लिए पर्याप्त नहीं है. ऐसे में वे बच्चे को फॉर्मूला दूध देना शुरू कर देती हैं.
चेन्नई के कावेरी अस्पताल में ऑब्स्टेट्रिक्स और गायनेकोलॉजी की कंसल्टेंट डॉ. पारिमला देवी बताती हैं कि एक और गलतफहमी यह है कि महंगे और प्रीमियम इन्फेंट फॉर्मूला दूध ज्यादा अच्छे होते हैं, क्योंकि उनमें DHA (डोकोसाहेक्साएनोइक एसिड), प्रोबायोटिक्स और दूसरे पोषक तत्व मिलाए जाते हैं. उनका कहना है, "वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के मुताबिक, फॉर्मूला दूध की कीमत चाहे कितनी भी हो, मां का दूध उससे बेहतर होता है."
रिसर्च के मुताबिक, फॉर्मूला दूध पीने वाले बच्चों में आगे चलकर मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज और सांस व पेट से जुड़े संक्रमण होने का खतरा ज्यादा रहता है.
कई महिलाएं केवल इसलिए ब्रेस्टफीड बंद नहीं करतीं कि वे बच्चे को दूध नहीं पिला सकतीं बल्कि शुरुआती कुछ हफ्तों की परेशानियां उनके लिए संभालना मुश्किल हो जाती हैं. कावेरी अस्पताल में रिप्रोडक्टिव मेडिसिन के डायरेक्टर डॉ. पी.एम. गोपीनाथ के मुताबिक, "सी-सेक्शन के बाद शुरुआती कुछ दिनों में ब्रेस्टफीड कराना थोड़ा मुश्किल हो सकता है. बच्चे को ब्रेस्टफीड कराने में शुरुआत में दिक्कत हो सकती है. मां ऑपरेशन के बाद ठीक हो रही होती है और उसके लिए बच्चे को सही तरह से पकड़कर ब्रेस्टफीड कराना भी मुश्किल हो सकता है. लेकिन ये परेशानियां कुछ समय की होती हैं. सही मदद मिलने पर ज्यादातर माताएं बच्चे के जन्म के शुरुआती कुछ हफ्तों में सफलतापूर्वक ब्रेस्टफीड करा पाती हैं."
विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे के जन्म के बाद मां को सही मदद मिलना इस समस्या को दूर करने में अहम है. डॉ. परिमला देवी का कहना है, "सी-सेक्शन से बच्चे को जन्म देने वाली 95 प्रतिशत से ज्यादा माताएं बच्चे के जन्म के तुरंत बाद स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट, बच्चे को अपने साथ रखने और लैक्टेशन कंसल्टेंट की मदद से सफलतापूर्वक ब्रेस्टफीड करा सकती हैं."
सिर्फ मां का दूध पिलाने की दर बढ़ाने के लिए अस्पताल में और डिलीवरी के बाद भी माताओं को ब्रेस्टफीड कराने में सही मदद मिलना जरूरी है. शेट्टी के मुताबिक, "गर्भावस्था के दौरान मेडिकल देखभाल मिलने से यह तय नहीं होता कि मां बच्चे को सफलतापूर्वक ब्रेस्टफीड करा पाएगी. सिर्फ मां का दूध पिलाना इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे के जन्म के बाद के घंटों, दिनों और हफ्तों में मां को कैसी मदद मिलती है."