कैंसर के हॉटस्पॉट की पहचान होगी आसान, देशभर में निगरानी बढ़ाने पर जोर

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद कैंसर को अधिसूचित बीमारी बनाने का दायरा बढ़ सकता है. इससे अलग-अलग राज्यों और इलाकों में कैंसर के मामलों की बेहतर निगरानी होगी और पता चलेगा कि कहां किस तरह के कैंसर का बोझ ज्यादा है

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत में कैंसर की निगरानी और ट्रैकिंग का दायरा बड़े स्तर पर बढ़ सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने उन 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कैंसर को नोटिफाइड यानी अधिसूचित बीमारी घोषित करने पर विचार करने को कहा है, जिन्होंने अब तक ऐसा नहीं किया है. 

देश के बाकी 17 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश पहले ही कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित कर चुके हैं. इस कदम का मकसद कैंसर के मामलों की रिपोर्टिंग में दिखने वाले अंतर को दूर करना और बीमारी की जल्द पहचान और इलाज को बेहतर बनाना है. 

कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित करना इसलिए जरूरी है क्योंकि भारत में कैंसर का बोझ अलग-अलग क्षेत्रों और कैंसर के प्रकार के हिसाब से काफी अलग है.

जनसंख्या आधारित कैंसर रजिस्ट्री (PBCR) किसी तय आबादी में सामने आने वाले कैंसर के सभी नए मामलों का रिकॉर्ड तैयार करती है. इससे शोधकर्ताओं को कैंसर के नए मामलों और उससे होने वाली मौतों की दर का आकलन करने और समय के साथ होने वाले बदलावों पर नजर रखने में मदद मिलती है.

नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम को साल 1981 में शुरू किया गया था लेकिन कैंसर रजिस्ट्री का दायरा लंबे समय से सीमित ही रहा जिसमें शहरी इलाकों का प्रतिनिधित्व ज्यादा रहा है.

मौजूदा रजिस्ट्री के आंकड़े भी भौगोलिक स्तर पर दिखाते हैं कि कैंसर की निगरानी की क्या उपयोगिता है. 7,08, 223 कैंसर के मामलों और 43 PBCRs में हुई 2,06,457 मौतों को कवर करने वाले एक विश्लेषण में अनुमान लगाया गया कि भारत में कैंसर का लाइफटाइम रिस्क लगभग 11 प्रतिशत है. 

मिजोरम में यह जोखिम पुरुषों के लिए 21.1 प्रतिशत और महिलाओं के लिए 18.9 प्रतिशत तक पहुंच गया. आइजोल में आयु-समायोजित घटना दर (age-adjusted incidence rates) प्रति 1,00,000 पुरुषों पर 256.1 और प्रति 1,00,000 महिलाओं पर 217.2 मामले दर्ज की गई. 

आइजोल में पुरुषों में आयु समायोजित कैंसर की दर 2,56.1 मामले प्रति एक लाख और महिलाओं में 2,17.2 मामले प्रति एक लाख दर्ज की गई.

अलग-अलग कैंसर के मामलों में भौगोलिक अंतर और भी स्पष्ट दिखाई देता है. मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स में पुरुषों में भोजन नली के कैंसर की दर 75.4 मामले प्रति एक लाख और महिलाओं में 33.6 मामले प्रति एक लाख दर्ज की गई है. 

इस तरह के मामले बताते हैं कि सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों को पूरे देश में एक समान उपाय के तौर पर लागू करने के बजाय खास आबादी से जुड़ी घटनाओं, जोखिम और उसके कारणों पर केंद्रित होना चाहिए.

पंजाब इसका एक और उदाहरण है. पहले किए गए महामारी विज्ञान संबंधी अध्ययनों में मालवा क्षेत्र में प्रति दस लाख लोगों पर कैंसर की दर 1,089 बताई गई थी. इसकी तुलना में दोआबा में यह 881 और माझा में 647 थी. इस अंतर के बाद पर्यावरण और कामकाज से जुड़े संभावित कारणों की जांच की गई, जिनमें कीटनाशक और पानी का प्रदूषण भी शामिल थे.

किसी भौगोलिक क्षेत्र में कैंसर के मामलों का ज्यादा होना कार्य-कारण संबंध को स्थापित नहीं करता लेकिन इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किन इलाकों में पर्यावरण और महामारी विज्ञान से जुड़ी विस्तृत जांच की जरूरत है. 

व्यापक स्तर पर कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित करने का सबसे बड़ा फायदा यहीं हो सकता है.

अगर रिपोर्टिंग से किसी जिले में मुंह के कैंसर, दूसरे जिले में भोजन नली के कैंसर या किसी तीसरे जिले में पित्ताशय के कैंसर की दर असामान्य रूप से ज्यादा सामने आती है तो स्वास्थ्य अधिकारी तंबाकू के इस्तेमाल, खान-पान, संक्रमण, कामकाज से जुड़े जोखिम, पर्यावरणीय प्रदूषण और अन्य संभावित कारणों की जांच कर सकते हैं.

इसलिए कैंसर की रजिस्ट्री केवल मामलों की गिनती करने की प्रक्रिया नहीं है. इससे यह पता चलता है कि किस व्यक्ति को किस तरह का कैंसर हो रहा है, कहां हो रहा है और किस दर से हो रहा है.

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