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बाबा रामदेव हैं भारत के अरबपति योगी

बाबा रामदेव को देश के लिए मर जाने दें,'' यह कहना है एक नए फेसबुक ग्रुप का, जो पिछले हफ्ते देश के सबसे चर्चित योग गुरु की राजनैतिक पैंतरेबाजियों से तंग आ चुका है. लेकिन उपवास की तकलीफ को झेलने की ताकत रखने वाला अगर कोई पैदा हुआ है तो वह व्यक्ति बाबा रामदेव हैं.

अपडेटेड 11 जून , 2011

बाबा रामदेव को देश के लिए मर जाने दें,'' यह कहना है एक नए फेसबुक ग्रुप का, जो पिछले हफ्ते देश के सबसे चर्चित योग गुरु की राजनैतिक पैंतरेबाजियों से तंग आ चुका है. लेकिन उपवास की तकलीफ को झेलने की ताकत रखने वाला अगर कोई पैदा हुआ है तो वह व्यक्ति बाबा रामदेव हैं.

सिर्फ इसलिए नहीं कि वे अपने सपाट पेट को 10 करोड़ टीवी दर्शकों के सामने हर सुबह धौंकनी की तरह चला सकते हैं. देश भर में 1,000 वैद्यों और 1,25,000 योग विशेषज्ञों व दुनिया भर में फैले 9,000 अन्य योग विशेषज्ञों की फौज के साथ वे 140 रोगों का इलाज कर सकते हैं. यह उनका दावा है.

दिल्ली के रामलीला मैदान में 4 जून को हजारों समर्थकों की भीड़ को संबोधित करते हुए योग गुरु ने गर्जना की थी, ''अगर आप मेरे नाम से एक इंच भी जमीन या एक भी पैसा बैंक खाते में दिखा दें तो आप जो भी कहेंगे, मैं करने के लिए तैयार हूं.'' लेकिन जब वे प्रति घंटा 2.40 लाख रु. के किराये वाले चार्टर विमान सेसना साइटेशन जेट से दिल्ली में उतरे तो यह लोगों में चर्चा का विषय बन गया.

यह भी किसी से छुपा नहीं रहा कि आगंतुकों के लिए 2.5 लाख वर्गफुट पर खड़ा किया गया तंबू वातानुकूलित था और बाबा के सहयोगी चमचमाती मित्सुबिशी मोंटेरो में आते-जाते दिखाई दिए, और वे महंगे सेलफोन लेकर घूम रहे थे.

बाबा के नाम कोई बैंक खाता हो या न हो, भारत के ये सबसे बड़े आध्यात्मिक चिकित्सक बड़े-बड़े सुपरस्पेशलिटी अस्पतालों को टक्कर दे सकते हैं.

अगर 2010 में अपोलो हॉस्पिटल समूह का कुल मूल्य 1,640 करोड़ रु. था, तो बाबा के पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट (पीवाइटी) और दिव्य योग मंदिर (डीवाइएम) का, जो हरिद्वार में करीब 1,000 एकड़ में फैला हुआ है, कुल मूल्य करीब 1,115 करोड़ रु. था. किसी भी सुपरस्पेशलिटी अस्पताल की तरह हरिद्वार में रामदेव का 300 बिस्तरों वाला आरोग्य केंद्र आधुनिकतम तकनीकों से युक्त है और उसका वातावरण अत्यंत मनोरम है.

यहां ओपीडी में 50 वैद्य हर रोज 2,000 मरीजों का इलाज करते हैं, जिसके कारण यहां एक मिनट में 3,000 रु. की उनकी दिव्य आयुर्वेदिक दवाएं बिक जाती हैं. यहां साल में दिव्य आयुर्वेद की 350 करोड़ रु. की दवा का कारोबार होता है. इसके अलावा हर साल 2-3 करोड़ रु. की योग की पुस्तकों, पत्रिकाओं और सीडी की बिक्री भी होती है.

जो शख्स नब्बे के दशक तक एक पुरानी साइकिल की सवारी करता रहा हो उसके लिए यह निश्चित ही एक ऊंची उड़ान है. उन्हें घर पर बने च्यवनप्राश के प्लास्टिक के कंटेनरों को ले जाने के लिए साइकिल की जरूरत पड़ती थी.

रामदेव के गुरु शंकर देव के करीबी रहे ओम प्रकाश जिज्ञासु के पड़पोते, हरिद्वार के सुशांत महेंद्रू कहते हैं, ''बाबा इसे किराये के एल्युमिनियम के बरतन में तैयार किया करते थे और घर-घर जाकर बेचते थे. साथ ही वे योग भी सिखाते थे.'' रामदेव ने 1999 में अपनी जो पहली कार खरीदी थी, वह लाल रंग की एक पुरानी मारुति वैन थी. इसके बाद उन्होंने दो साल बाद पुरानी मारुति जिप्सी खरीदी.

जो व्यक्ति कभी हरिद्वार के कृपालु बाग की गरीब बस्ती में रहता था, आज वह छह एकड़ में बनी भव्य हवेली शिव कुटी में रहता है, जिसकी कीमत करीब 30 करोड़ रु. बताई जाती है.

रामदेव की सफलता का रहस्य स्वास्थ्य के क्षेत्र में पैठ बनाने में छुपा है, आरोग्य उस देश के लिए एक ऐसा लुभावना नारा है जो जीवनशैली से जुड़ी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त रहा है. यहां तक कि एक दशक पहले तक स्वास्थ्य सेवा का मतलब रोग का पता लगाना और उसका इलाज करना होता था. लेकिन आज रोगों से बचाव को महत्व दिया जाने लगा है.

बंगलुरू में हृदय के सर्जन डॉ. देवी शेट्टी के मुताबिक, ''यह ऐसा युग है जिसमें कोई भी बूढ़ा, मोटा, बीमार, तनावग्रस्त या बोर होना नहीं चाहता... आरोग्य के उद्योग की सफलता इसी प्रवृत्ति में निहित है.'' सुंदरता, फिटनेस, पौष्टिकता, पुनर्यौवन, ये सब कुछ बाबा रामदेव के आरोग्य के साम्राज्‍य में आते हैं, जिसका बाजार भारत में 27,000 करोड़ रु. का है.

इसके साथ ही बाबा की मार्केटिंग रणनीति भी काम करती है. धनबाद में इंडियन स्कूल ऑफ माइंस यूनिवर्सिटी में मैनेजमेंट का विषय पढ़ाने वाली मृणालिनी पांडे, जो एक केस स्टडी के बतौर बाबा रामदेव की सफलता की कहानी लिख चुकी हैं, कहती हैं, ''उपभोक्ता अब उत्पाद और सेवाएं नहीं खरीदते बल्कि अनुभव खरीदते हैं.

बाबा की माकर्व्टिंग रणनीति की अपार सफलता का कारण यह है कि उन्होंने प्राचीन भारतीय चिकित्सा, प्राणायाम या श्वास क्रिया को व्यापक रूप में लोगों तक पहुंचाया.'' बेचने की उनकी अनोखी कला में हमेशा यह दावा होता है कि उनके योगाभ्यास सभी लोगों के लिए उपयुक्त हैं और बिना दवा के ही असाध्य रोगों का भी इलाज इनसे किया जा सकता है (लेकिन दवा भी कम कीमत पर उनकी फार्मेसी में उपलब्ध हैं).

दिल्ली में सत्यम मार्केटिंग के सीईओ और मार्केटिंग एवं मैनेजमेंट सलाहकार आशीष दवे कहते हैं, ''बाबा व्यापार के दिग्गज हैं. बी-स्कूल के छात्रों को उनसे सीखना चाहिए. जहां अन्य दवा कंपनियां विज्ञापन, मार्केटिंग और मेडिकल रिप्रजेंटेटिव पर पैसे खर्च करती हैं, वहीं रामदेव इन मदों में पैसा नहीं खर्च करते.

हर व्यापार में उपभोक्ता के दरवाजे तक पहुंचने के लिए एक वितरण चैनल की जरूरत होती है, रामदेव मौखिक प्रचार के जरिए अपनी सप्लाइ चेन तैयार करते हैं. देश भर में 709 पतंजलि चिकित्सालयों और 825 आरोग्य केंद्रों का नेटवर्क फैला हुआ है, जिनसे हर साल करीब 90 करोड़ रु. की कमाई होती है. दवे कहते हैं, ''बेचने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जाता है, लेकिन लोग उनके ब्रांड के कारण खुद ही उनकी दवाइयां खरीदते हैं.''

टेलीविजन ने जादुई रूप से रामदेव को एक ब्रांड और योग को मीडिया का शगल बना दिया. पेट को मथते, हाथों पर शरीर को संतुलित करते या अपने पैरों को गर्दन के इर्दगिर्द लपेटते रामदेव की छवि लोगों को रोमांचित कर देती थी. साथ ही उनका यह प्रवचन भी लोगों को अभिभूत कर देता कि ''दवाओं से इलाज के पीछे मत भागो, प्राणायाम से आप आजीवन स्वस्थ रह सकते हैं.''

पहले 2002 में संस्कार चैनल और फिर आस्था चैनल पर दिखाई जाने वाली रामदेव की योग कक्षाओं ने उन्हें रातोरात लोकप्रिय बना दिया. पांडे कहती हैं, ''बाबा अपने ग्राहकों के साथ एक मर्मस्पर्शी रिश्ता बना लेते हैं. उनके अनुयायी उनकी भक्ति करते हैं और उनके संदेश को फैलाते हुए आंखें मूंद कर उनका अनुसरण करते हैं. यह एक व्यक्तिके ब्रांड बनने का नायाब उदाहरण है.''

यह प्रभाव का साम्राज्‍य है. हजारों लोग सूर्योदय से पहले उन्हें टीवी पर देखने के लिए उठ जाते हैं या उनके योग शिविर में जाने के लिए लाइन लगाए खड़े रहते हैं. उनके वाक्‌कौशल के चलते आस्था चैनल, जो विभिन्न देशों में अपना प्रसारण करता है, पर उन्हें प्राइम स्लॉट मिल गया.

आस्था के प्रबंध निदेशक शिव कुमार गर्ग, जो लखनऊ के उद्योगपति हैं और उनके पहले अनुयायी हैं, के साथ बाबा के करीबी संबंध ने न सिर्फ उन्हें टीवी का ब्रांड बनाने में अहम भूमिका निभाई, बल्कि उनकी दूसरी योजनाओं में भी वित्तीय मदद पहुंचाई. एक अंदरूनी सूत्र का कहना है कि इस चैनल पर महीने भर 20 मिनट के स्लॉट के लिए 3 लाख रु. का खर्च आता है. वे कहते हैं, ''अगर हम रामदेव के कार्यक्रमों के मिनटों का हिसाब लगाएं तो यह निश्चित तौर पर प्रतिमाह 31 लाख रु. बैठता है.

आम तौर पर यह रकम रामदेव के संगठन या उनके किसी भक्त द्वारा भुगतान की जाती है.'' रामदेव का दावा है कि 20 लाख पाउंड का स्कॉटिश टापू लिट्ल कंब्रे, जिसे स्वास्थ्य केंद्र बनाने के लिए पतंजलि योग ट्रस्ट ने हासिल किया है, उनके एक भारतीय मूल के अरबपति भक्त दंपती सैम और सुनीता पोद्दार की ओर से उपहार में दिया गया है.

लेकिन यह विवादों पर खड़ा किया गया साम्राज्‍य भी है. पिछले दशक में योग गुरु पर तमाम तरह के आरोप लगते रहे हैं. उन पर आरोप था कि वे अपनी विशुद्ध दवाओं में अघोषित सामग्री, मानव और जीव-जंतुओं के अंगों का इस्तेमाल करते हैं, गैरकानूनी उत्पादन तरीके अपनाते हैं.

एड्स का इलाज करने के दावे के कारण केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से उन्हें दवा निर्माण का काम रोकने का भी आदेश मिल चुका है, ड्रग्स एवं मैजिक रेमेडीज कानून के तहत लोगों को गुमराह करने के आरोप में उन्हें नोटिस भी जारी की जा चुकी है, पुत्रवती, ऐसी दवा जिससे महिलाएं सिर्फ पुत्र को जन्म दे सकती हैं, के आविष्कार की जांच हो चुकी है.

योग के जरिए कैंसर का इलाज करने का दावा करने के कारण इंडियन मेडिकल एसोसिएशन उनकी निंदा कर चुका है, संजीवनी बूटी की खोज कर लेने के दावे का मजाक बनाया जा चुका है, समलैंगिकता को ''उपचार योग्य रोग'' बताने के लिए उनकी भर्त्सना की जा चुकी है, और अपनी दवा इकाइयों से निकलने वाले कचरे को गंगा में बहाने के लिए उन्हें फटकार लगाई जा चुकी है.

लेकिन हर बार बाबा बेदाग निकल आने में सफल रहे. कभी उनके शिष्यों ने उत्पात मचाया (2006 में उन्होंने दिल्ली में माकपा मुख्यालय में तोड़-फोड़ कर दी थी, क्योंकि वृंदा करात ने आरोप लगाया था कि उनकी दवाओं में अघोषित गैर-हर्बल सामग्री का इस्तेमाल होता है) तो कभी उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया गया (करात का आरोप था कि सरकारी मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला द्वारा शुरुआती नमूनों में गड़बड़ी पाए जाने के बावजूद बाबा को मुक्त कर दिया गया था, गैर-कानूनी दवा उत्पादन के ज्‍यादातर आरोप इंडियन ड्रग्स ऐंड कॉस्मेटिक्स कानून, जो वैकल्पिक दवा निर्माण पर नजर रखता है, की खामियों के कारण बेअसर रहे.

गलत दावों के चलते लाइसेंस वापस लिया जा सकता था लेकिन उत्तराखंड सरकार ने उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया. कई मौकों पर रामदेव यह कहकर बच निकले कि या तो उनकी बात को गलत तरह से पेश किया गया है (उदाहरण के लिए, योग के जरिए एड्स का इलाज करने का दावा) या फिर उन्होंने अपने मरीजों को सामने पेश करके उनके मुंह से (कैंसर) इलाज की कहानी सुनवा दी.

वे कुछ अनजान पश्चिमी वैज्ञानिकों को उद्धृत करके अपनी विधि को सही साबित करते हैं (जैसे कि समलैंगिकता के मामले में यह कहना कि वह एक बीमारी है), तो कभी वे टका-सा जवाब दे देते हैं कि, ''मुझ्से मत पूछो, पतंजलि ट्रस्ट से पूछो.''

एक दशक में बाबा का साम्राज्‍य दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ा है. उनकी ब्रांड छवि जब नई ऊंचाइयां छू रही हैं, हरिद्वार और हिमाचल प्रदेश में उनका व्यापार 2,000 करोड़ रु. के आसपास पहुंच गया है. हरिद्वार में एक नई समृद्धि है. स्थानीय लोगों का कहना है, ''साइलेंट रूप से सारा पैसा बाबा ही लगा रहे हैं.''

लेकिन आरोग्य गुरु के रूप में उनकी सफलता क्या नागरिक अधिकारों के अलंबरदार के अवतार के रूप में उनके सामने खड़ी चुनौतियों से निबटने में मददगार होगी? क्या इस बार भी वे अपने वाक्‌कौशल के बूते संकट के दौर से उबर पाएंगे?

-साथ में किरण तारे, पद्मपर्णा घोष, भावना विज-अरोड़ा और संदीप उन्नीथन

 

साइकिल से निजी विमान तक

रामदेव का अभूतपूर्व सफर विवादों से घिरा रहा है, लेकिन कोई भी विवाद लंबे समय तक नहीं टिका

1964 या 1974  रामदेव की असली उम्र कोई नहीं जानता. सिर्फ  इतनी ही जानकारी है कि रामकृष्ण यादव का जन्म हरियाणा के अलीपुर गांव में हुआ.

1992-95  टूटी-फूटी जर्जर साइकिल पर हरिद्वार में घर में बनी दवाइयां बेचते थे. 1995 में दिव्य योग ट्रस्ट की स्थापना की.

2002  पहली बार संस्कार टीवी चैनल पर, 2003 से आस्था चैनल पर सुबह के योग के लिए दिखाई दिए. रामदेव ने रातोरात हलचल मचा दी.

2005  दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के 113 कर्मचारियों ने न्यूनतम मजदूरी के लिए आंदोलन शुरू किया. कुछ को निकाल दिया गया.

2006  माकपा ने आरोप लगाया कि रामदेव जड़ी-बूटियों वाली दवाओं में मनुष्य और जानवरों के अंग मिलाते हैं. आरंभिक नमूनों में इसकी पुष्टि हुई लेकिन सरकार की मान्यताप्राप्त प्रयोगशालाओं ने बाद में रामदेव को क्लीन चिट दी. उनके शिष्यों ने दिल्ली में माकपा के कार्यालय पर तोड़फोड़ की.

2006  केंद्रीय गृह मंत्रालय ने औषधि और जादू कानून के अंतर्गत रामदेव को नोटिस दिया. उन पर आरोप था कि वे जादुई इलाज का दावा कर जनता को गुमराह कर रहे हैं. अस्पष्ट कानून के कारण वे बच निकले.

2006  दावा किया कि योग से एड्स का इलाज हो सकता है. इस दावे के लिए गृह मंत्रालय द्वारा स्थगन और विराम आदेश देने पर रामदेव ने कहा, उन्हें गलत उद्घृत किया गया है. 

2007 पुत्र को जन्म देने में महिलाओं की मदद करने वाली एक दवा, पुत्रवती आई. यह जन्म पूर्व निदान तकनीक कानून के अंतर्गत एक अपराध है. सरकार ने जांच शुरू की. जांच असफल रही.

2008  इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने योग के जरिए कैंसर का इलाज करने के बारे में उनके दावे को ठग विद्या कहा. रामदेव ने ऐसे मरीजों की परेड करा दी जिन्होंने अपने मुंह से स्वस्थ होने की कहानी बताई.

2008  वनस्पति शास्त्रियों ने संजीवनी बूटी प्राप्त करने के रामदेव के दावे का खंडन किया.

2008  उन्होंने एक्यूप्रेशर के जरिए पूर्व सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी का इलाज करने की इजाजत मांगी. एम्स ने इनकार कर दिया.

2009 रामदेव ने समलैंगिकता को कानूनी मान्यता देने का विरोध किया. पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों के समक्ष दावा किया कि वे योग से इसका इलाज कर सकते हैं. विवाद हो गया.

2010 अपनी फार्मा इकाई से गंगा में रासायनिक कचरा बहाने को लेकर फटकार मिली.

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