हरियाणा, बिहार, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में हाल में हुए उपचुनावों के दौरान कांग्रेस को करारी हार का मुंह देखना पड़ा. इसमें कोई संदेह नहीं कि भ्रष्टाचार और महंगाई को लेकर अवधारणाओं ने चुनाव नतीजों को प्रभावित किया. इसलिए सवाल पैदा होता है कि विकास और शासन प्रणाली चुनावी किस्मत को किस हद तक प्रभावित करते हैं? इस बारे में आंकड़े अधूरे हैं.
हालांकि अच्छी शासन प्रणाली का फायदा मिलने और खराब शासन प्रणाली को दंडित किए जाने के कुछ प्रमाण हैं, लेकिन इसकी स्पष्ट व्याख्या करनी होगी कि शासन प्रणाली का आखिर मतलब क्या है. इसका ताल्लुक इस बात से है कि नागरिक किसी राज्य सरकार से क्या उम्मीदें रखते हैं.
उम्मीदें दरअसल वह पिटारा हैं, जिनमें कोई नागरिक समझ्ता है कि उसे एक अनुकूल माहौल मिले, कानून और व्यवस्था की अच्छी स्थिति हो, ठोस बुनियादी सुविधाएं (बिजली, सड़क और पानी) उपलब्ध हों, सामाजिक ढांचा दुरुस्त बने और भ्रष्टाचार में कमी हो. लेकिन इनमें से कुछ चीजें राज्य सरकारों के दायरे से बाहर हैं, जिससे गणनाएं उलट-पुलट हो जाती हैं.
असम, पश्चिम बंगाल, कव्रल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में हाल ही में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. इन पांच राज्यों के हर विधानसभा क्षेत्र में पार्टियों के कामकाज को लेकर आंकड़े उपलब्ध हैं. विधानसभा क्षेत्रों के स्तर पर कुछ भिन्नताओं के साथ सामाजिक-आर्थिक सूचकों के बारे में कुछ विशेष आंकड़े तैयार किए जा सकते हैं. इस तरह हमें 2006 और 2011 के बीच सामाजिक-आर्थिक सूचकों में सुधार (या उनके बिगड़ने) के बारे में जानकारी है और हम यह भी जानते हैं कि 2006 और 2011 के बीच पार्टियों को मिले वोटों में कितना अंतर आया. क्या इनके बीच कोई आपसी संबंध है? यहां यह बताना जरूरी है कि यह सवाल निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर पूछा जा रहा है, कुल मिलाकर राज्य के स्तर पर नहीं.
नतीजों से पता चलता है कि अगर कोई इस तरह से निर्वाचन क्षेत्र और उससे नीचे के स्तर पर देखे, तो इसमें वे सूचक सबसे ज्यादा मायने रखते हैं जिनका परिवार की आर्थिक उपलब्धियों-प्रति व्यक्ति आय और सड़क संपर्क-से गहरा और सीधा संबंध है.
सामाजिक-आर्थिक कसौटियां, जैसे कि शिशु मृत्यु दर, टीकाकरण और शिक्षा संबंधी परिवर्ती कारक कोई खास मायने नहीं रखते. शायद इसलिए नहीं कि वे महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि मतदाता जानता है कि इनके बारे में फैसला केंद्र सरकार की योजनाओं के अंतर्गत किया जाता है. यहां तक कि कुल मिलाकर देखें तो अपराध भी इसमें मायने नहीं रखता, लेकिन हिंसक अपराधों, आर्थिक अपराधों और सामाजिक अशांति से संबंधी अपराधों का चुनावों पर असर पड़ता है.
क्या इसका मतलब यह है कि अन्य सामाजिक-आर्थिक सूचकों का चुनाव नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ता है? कोई खास नहीं. असम, पश्चिम बंगाल, कव्रल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी के नमूना सर्वेक्षणों में यही बात देखने को मिली. इन पांच राज्यों में अन्य सामाजिक-आर्थिक सूचकों में सुधार होने का मतदान के तरीके पर कोई विशेष सांख्यिकीय असर नहीं पड़ा. इस अनुभव से अन्य राज्यों में अटकलें लगने का खतरा है.

