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'औरत 30,000 रु. में पड़ती है, तो भैंस 70,000 रुपये में'

हरियाणा के झज्‍जर जिले में 06 वर्ष के आयु समूह का लिंगानुपात पूरे देश में सबसे खराब है. वहां एक हजार लड़कों पर मात्र 774 लड़कियां हैं.

हरियाणा का गांव
हरियाणा का गांव
अपडेटेड 2 मई , 2011

हरियाणा के झज्‍जर जिले में 06 वर्ष के आयु समूह का लिंगानुपात पूरे देश में सबसे खराब है. वहां एक हजार लड़कों पर मात्र 774 लड़कियां हैं. जिले के दो गांवों बेहराना और धिमाना में लिंगानुपात तो बेहद कम, क्रमशः 378 और 444 है. इसी आयु वर्ग में हरियाणा में लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या 4,07,370 कम है.

पिछली जनगणना में यह अंतर 3.31 लाख का था. कुल मिलाकर राज्‍य में 1.18 करोड़ महिलाओं की तुलना में 1.35 करोड़ पुरुष हैं. यानी इन दोनों के बीच 17.57 लाख का अंतर है. सन्‌ 2001 में यह अंतर 15.83 लाख का था.

इसकी वजहें एकदम स्पष्ट हैं-एक तो यह मान्यता कि लड़कियां बोझ होती हैं और दूसरे अल्ट्रासाउंड केंद्रों की बढ़ती संख्या, जो अब 1,174 तक पहुंच गई है. इनमें अधिकांश चोरीछिपे चलते हैं. 45 वर्ष के बैंक कर्मचारी अजित सिंह कहते हैं, ''आप जब चाहें एक औरत 30,000 रु. में खरीद सकते हैं, जबकि अच्छी नस्ल की भैंस70,000 रु. में आती है.''

चौपाल में बारीबारी से हुक्का पी रहे चार दूसरे दोस्त उनका समर्थन करते हैं. 42 वर्षीय स्थानीय जमींदार रणबीर यादव कहते हैं, ''दरअसल एक लड़की की लागत तो और भी कम हो सकती है, पर उसके लिए असम जैसे दूरदराज के इलाकों तक आनेजाने में बड़ा खर्च करना पड़ता है.''

अवांछित गर्भ को डॉक्टर की मदद से गिराने की लागत 1,000 रु. से लेकर 20,000 रु. तक पड़ती है और कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे गैर पंजीकृत केंद्रों ने कन्या भ्रूणहत्या की समस्या में इजाफा कर दिया है. ऐसे इलाके में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, जहां कहावत चलती है, ''छोरा मरै निर्भाग का, छोरी मरै भागवान की.'' (भाग्यहीन लोगों का बेटा और भाग्यशालियों की बेटी मरती है).

शर्मनाक बात तो यह है कि अक्सर महिलाएं ही इस विकृत परंपरा को चलाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं. पूर्व सैनिक और हरियाणा के 6,759 गांवों में से एक, बेहराना में खेती कर रहे 42 वर्षीय जयपाल सिंह कहते हैं, ''यकीन मानें, इसके लिए ज्‍यादातर महिलाएं ही जिम्मेदार हैं.

नर्सें, सहायक नर्सें और दाइयां (एएनएम)गर्भवती महिलाओं से संपर्क कर उन्हें शिशु के लिंग की जांच और फिर गर्भपात के लिए ले जाती हैं. हम पुरुषों को आम तौर पर इसकी जानकारी होती है, पर हम परवाह नहीं करते कि यह कहां होता है और कैसे होता है. हां, होता सब हमारी सहमति से ही है.'' बेहराना की आबादी 8,000 है, जिसमें ज्‍यादातर जाट हैं. यहां हर दूसरे घर में कोई सैनिक या पूर्व सैनिक है. बेटियों के प्रति घृणा यहां सभी में है.

बेहराना के अस्सी वर्ष पार कर चुके बुजुर्ग और पूर्व सैनिक चांदराम कहते हैं, ''हमें नहीं, व्यवस्था को दोष दीजिए. जिन लोगों की बेटियां एमबीए या स्नातकोत्तर करके नौकरियां कर रही होती हैं, उन्हें भी दहेज में एक लक्जरी कार देनी पड़ती है. लड़कियां पैदा करने में तुक ही क्या है? हमें लड़कियों की जरूरत नहीं है.''

73 वर्षीय किसान उमेद सिंह तर्क देते हैं, ''हम बेटियों से बिलावजह नफरत नहीं करते.'' वे कहते हैं, ''हम उनका क्या करते हैं? उन्हें पढ़ने बाहर भेजते हैं और वे सिर्फ परिवार की बदनामी करवाती हैं.''

यह उस राज्‍य में अजीबसी बात है, जहां कई महिलाएंराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित कर चुकी हैं. अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला हरियाणा में जन्मी थीं. 22 वर्ष की मिस इंडिया वर्ल्ड कनिष्ठा धनखड़ झज्‍जर की हैं. उनका जन्म मुंबई में हुआ, पर उनकी जड़ें कासनी गांव में हैं और नौसेना में कोमोडोर उनके पिता राज सिंह धनखड़ अपने परिवार के साथ अक्सर गांव आते रहते हैं.

कनिष्ठा कहती हैं, ''हरियाणा में हालत बहुत दुखद है जहां महिलाओं को कभी वह दर्जा नहीं मिला, जिसकी वे हकदार हैं. दरअसल, महिलाएं पुरुषों से कहीं बेहतर काम कर सकती हैं. यह सभी के लिए फिक्र की बात है, लेकिन मेरे आपके जैसे लोग इसमें कुछ नहीं करते. हमें उनको शिक्षित करने की जरूरत है.'' पिछले ही साल दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ खेलों में और उसके बाद चेंगझू में एशियाई खेलों में पदक जीतकर हरियाणा की लड़कियों ने राज्‍य का नाम रोशन किया था.

महिलाओं की घटती संख्या को जायज ठहराने के लिए इस इलाके में अजीबोगरीब तर्क भरे पड़े हैं. लगभग 190 परिवारों वाले धिमाना गांव में वहां के लोग यह मानने से ही इनकार कर देते हैं कि इस असंतुलित लिंगानुपात के पीछे वजह असल में भ्रूणहत्या है.

धिमाना गांव में 70 वर्ष के अविवाहित सरपंच ओमप्रकाश कहते हैं, ''यह तो ईश्वर की देन है कि इस गांव में पैदा होने वाले ज्‍यादातर बच्चे लड़के ही होते हैं.'' सनराइज हाइस्कूल के 67 वर्षीय प्रधानाध्यापक वरिंदर कुमार नरूला एक और तर्क पेश करते हैं, ''इसका संबंध खुराक से है. यहां के लोग अच्छा खातेपीते हैं और इसलिए लड़कों को जन्म देते हैं.''

लेकिन दूसरी तरफ सरकारी अधिकारी एक जायज बात उठाते हैं. स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक नरबीर सिंह कहते हैं, ''असंतुलित लिंगानुपात के पीछे अकेला सबसे बड़ा कारण अल्ट्रासाउंड केंद्र हैं.

हम अपनी ओर से पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन समस्या यह है कि इन अवैध हरकतों में से ज्‍यादातर गैरपंजीकृत अल्ट्रासाउंड केंद्रों में होती हैं, जो छोटे उपकरणों का इस्तेमाल करके ऑपरेशन करते हैं, जिससे हमारे लिए उन्हें पकड़ना मुश्किल हो जाता है. जब तक लोग इच्छाशक्ति नहीं दिखाएंगे, समस्या खत्म नहीं की जा सकेगी.''

और समस्या से निबटने की इच्छाशक्ति यहां नजर नहीं आती. झज्‍जर के 43 वर्षीय व्यवसायी नरिंदर पोपली कहते हैं,''दूसरी संतान को जन्म देने वाले 90 प्रतिशत से ज्‍यादा मामलों में पतिपत्नी लिंग परीक्षण करवा लेते हैं.''

अरसे से यह विश्वास किया जाता रहा है कि पढ़ने लिखने के साथ स्थिति में अपनेआप ही बदलाव आ जाएगा. ताजा जनगणना ने अब इस सिद्धांत की भी हवा निकालकर रख दी है. झज्‍जर में साक्षरता की दर 80 प्रतिशत से ज्‍यादा है. जिस मेवात में साक्षरता दर मात्र 56.1 प्रतिशत है और जिसे हरियाणा का सबसे पिछड़ा जिला माना जाता है, वहां लिंगानुपात हरियाणा में सबसे ज्‍यादा है-यानी वहां 1,000 लड़कों पर 906 लड़कियां हैं.

नीलोखेड़ी स्थित हरियाणा इंस्टीट्‌यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट में सलाहकार रणबीर सिंह कहते हैं, ''साक्षरता और आधुनिकीकरण ने स्थिति और बिगाड़कर रख दी है. लोग अब गर्भपात के बारे में भी जानते हैं और लिंग परीक्षण के तरीकों के बारे में भी.

और अब ये चीजें समाज में पहले से कहीं ज्‍यादा स्वीकार्य हो चुकी हैं. झज्‍जर जैसी जगहों में जमीन की कीमतें बहुत अधिक हैं और लोग नहीं चाहते कि उन्हें अपनी जायदाद का हिस्सा अपनी बेटियों को देना पड़े, जिसका उन्हें कानूनी अधिकार है.''

असंतुलित लिंगानुपात का असर समाज पर भी पड़ रहा है. इसकी वजह से दुलहनों की भारी कमी हो गई है. सैद्धांतिक तौर पर, इससे दहेज पर रोक लगनी चाहिए थी, लेकिन शादी करने वालों में एक भारी संख्या उन लोगों की है, जो भारी दहेज की मांग करते हैं.

कई स्थानों पर अदलाबदली के आधार पर शादियां हो रही हैं. लोग अपनी बेटी की शादी कर देते हैं और ऐवज में अपने बेटों के लिए बहू ले लेते हैं. जिन लोगों को स्थानीय तौर पर दुलहन नहीं मिल पाती है, वे उन्हें असम, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और अन्य गरीब राज्‍यों से खरीद कर लाते हैं.

21 वर्ष के मनोज कुमार कहते हैं, ''मैं जानता हूं कि हमारी शादी नहीं होने वाली है और यह बेहद अफसोसजनक है.'' 19 वर्ष के मनदीप अहलावत कहते हैं, ''हम लोग इस बारे में बात करते रहते हैं. लेकिन पत्नी पाने के लिए नौकरी पाना जरूरी है. हमें नहीं लगता कि इनमें से कुछ भी मिलने वाला है.'' 

लड़कियों के प्रति पूर्वाग्रह, जिसकी जड़ें अल्कालिक आर्थिक सोच में हैं, धीमेधीमे, लेकिन निश्चित तौर पर ऐसे जख्म छोड़ता जा रहा है, जिन्हें भर पाना हरियाणाके लिए आसान नहीं रहेगा. वहां के बहुत सारे पुरुष अविवाहित ही रहने के लिए मजबूर होंगे, क्योंकि दुलहनें मिलना मुश्किल हो जाएगा.

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