इसकी शुरुआत खुसफुसाहट से हुई. फिर से रंग में आई ऑस्ट्रेलिया की टीम पर्थ में भारतीय खिलाड़ियों को धो रही थी और टीम इंडिया एक बार फिर विदेशी धरती पर चार शून्य से सीरीज हार रही थी. दिन बीतने के साथ खुसफुसाहट तेज होती गई और दौरा खत्म होने तक तो यह शोर में तब्दील हो गई.
तोलस्तॉय ने लिखा है कि सभी सुखी परिवार एक ही तरह के होते हैं, लेकिन हर दुखी परिवार के अपने-अपने दुख होते हैं. यह दौरा महेंद्र सिंह धोनी के लिए बहुत खराब रहा और उनके परिवार ने अपने को विचित्र दयनीय स्थिति में पाया. मैदान पर भी और ड्रेसिंग रूम में भी.
इसके संकेत पहले से ही दिख रहे थे. मेलबॉर्न में खेले गए पहले टेस्ट में सब कुछ ठीकठाक रहा. गेंदबाजों ने 20 विकेट झटके और सचिन तेंडुलकर, राहुल द्रविड़ तथा वीरेंद्र सहवाग में से हरेक ने 50 से अधिक रन बनाए. इस तरह, मैच पांच दिन खिंचा. लेकिन उसके बाद बिखराव शुरू हो गया.
सिडनी में विराट कोहली ने जब ऑस्ट्रेलियाई भीड़ की तरफ उंगुली से अश्लील इशारा किया और उनकी निर्ममता का रोना रोया तो यह भारतीय टीम में निराशा की ही अभिव्यक्ति थी. लेकिन यह तो बाहरी कारण था. आम तौर पर शांत रहने वाले ईशांत शर्मा ने दिन भर के खेल के बाद जब एक गो-कार्ट (चार पहिए का छोटा वाहन) ट्रैक पर इसी तरह के भाव व्यक्त किए तो टीम की निराशाजनक मनोदशा की पुष्टि हो गई. पर्थ में तो सब कुछ सामने आ गया.
मुकद्दर के सिकंदर से रूठी किस्मत
टीम के साथ जाने वाले पत्रकारों और पूर्व खिलाड़ियों के बीच हुई बातचीत से संकेत मिला कि ड्रेसिंग रूम में सब कुछ ठीकठाक नहीं है. बुजुर्ग ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट लेखक रॉबर्ट क्रैडॅक ने हेराल्ड सन में लिखा कि वीरेंद्र सहवाग टेस्ट सीरीज में धोनी की कप्तानी से नाखुश खिलाड़ियों के एक गुट की अगुआई कर रहे थे. सहवाग के खेमे के खिलाड़ियों का मानना था कि धोनी ने एक के बाद एक घटिया प्रदर्शनों से टीम को नीचा दिखाया है.
हालांकि भारतीय कमेंटेटरों के एक तबके ने इस बारे में संकेत देना शुरू कर दिया था. हर गुजरते दिन के साथ यह और साफ होता गया कि ड्रेसिंग रूम में कुछ गड़बड़ है. भारत ने बेहद अरुचि और अनुशासनहीन तरीके से सभी टेस्ट मैच खेले. जब धोनी को एडिलेड में चौथे टेस्ट के लिए निलंबित किया गया तो वीरेंद्र सहवाग ने कमान संभाली. लेकिन उन्होंने भी साबित कर दिया कि उनकी कप्तानी धोनी से न बेहतर है, न बदतर. इसे विडंबना ही कहेंगे. भारत एडिलेड टेस्ट और सीरीज 4-0 से हार गया. युवा खिलाड़ियों की टीम लेकर आइसीसी टी-20 का पहला विश्व कप जीतने को लेकर चर्चा में आने वाले धोनी, कप्तान के परंपरागत सांचे में कभी फिट नहीं बैठे हैं. बहरहाल, उस जीत ने क्रांति ला दी थी क्योंकि वह वरिष्ठ खिलाड़ियों के बिना मिली थी.
बाहर से देखने पर ऐसा लगता है कि टीम में पुराने टेस्ट खिलाड़ियों के होने से धोनी बंध-से जाते हैं. वे इस तरह के संकेत भी दे चुके हैं. टेस्ट मैचों के खत्म हो जाने के बाद जब द्रविड़ और वी.वी.एस. लक्ष्मण स्वदेश रवाना हुए और ड्रेसिंग रूम 50 ओवर के तेज, उग्र और युवा खिलाड़ियों की ऊर्जा से लबरेज था, तो ऐसा लगा कि धोनी में नई जान आ गई है.
उन्होंने उस सीरीज से पहले कहा था, ‘वन-डे साइड हमारी टेस्ट साइड से बहुत अलग दिखती है. टीम में आने वाले नए लड़के ज्यादा मुखर हैं जिससे ड्रेसिंग रूम में गर्मजोशी रहती है. वे एक-दूसरे की टांग खींचना पसंद करते हैं. इससे ड्रेसिंग रूम का माहौल और अधिक जीवंत हो उठता है. ड्रेसिंग रूम पूरी तरह से बदल गया है. हम किशोर कुमार के गानों को पीछे छोड़ चुके हैं और सियां पॉल (जमैका का पॉप और रेगी आर्टिस्ट) के गानों तक पहुंच गए हैं. इस तरह का बदलाव आया है. ड्रेसिंग रूम शोर से भरा रहता है. वहां अलग-अलग पीढ़ी के खिलाड़ी होते हैं.’
जब आपने उनके इस तरह के विचार सुन लिए तो आप यही प्रार्थना करेंगे कि तेंडुलकर के आइपॉड में किशोर के गाने न हों.
बहरहाल, वरिष्ठ खिलाड़ियों का अभी और अधिक अपमान होना था. ऑस्ट्रेलियाई टीम के खिलाफ अंततः जब एक जीत मिली तो उसमें मैन ऑफ द मैच पाने वाले गौतम गंभीर ने ऐलान किया कि कुछ खास खिलाड़ियों का न रहना भारतीय टीम के लिए अच्छा ही रहा. उन्होंने पत्रकारों से कहा, ‘आप बड़े नाम नहीं चाहते, आप ऐसे खिलाड़ी चाहते हैं जो कुछ करके दिखा सकें. सबसे अच्छी टीम वही होती है जिसके सभी 11 खिलाड़ियों में यह भरोसा हो कि वे किसी भी विरोधी टीम को हरा सकते हैं. और खेलने वाले इन 11 खिलाड़ियों को भरोसा था कि वे इस वन-डे में ऑस्ट्रेलिया को हरा सकते हैं. एक या दो खिलाड़ियों से कोई फर्क नहीं पड़ता.’ वे एक या दो खिलाड़ी कौन थे? क्या वे किशोर दा के प्रशंसक थे?
क्या हमें उनके नाम लेने की जरूरत है? यहां इतना कहना काफी होगा कि तेंडुलकर उस वन-डे में नहीं खेले थे. जैसा कि टेलीविजन पर कहा जाता. यह किसी ‘बम धमाके’ से कम नहीं था, गंभीर भी नाखुश थे. उन्होंने कहा भी कि मैच जीतने के लिए दो गेंदें रह गई थीं. उन्हें कप्तान पर गुस्सा आ रहा था. अगर उनका बस चला होता तो वे मैच को पहले ही जीत लेते. यहां तक कि धोनी ने भी माना कि सिर से पानी गुजरने तक चीजों को छोड़ देने की उनकी आदत से भारतीय टीम का श्रीलंका के खिलाफ जीता हुआ मैच टाइ हो गया.
ब्रिसबेन में हार के बाद तो भारतीय टीम की थू-थू होने लगी. इस वन-डे में भी ओवर फेंकने की धीमी रफ्तार के कारण धोनी को निलंबित किया गया. इस तरह, दौरे में वे दो बार सस्पेंड हो चुके थे. कप्तान ने कहा कि गंभीर, सहवाग और तेंडुलकर जैसे खिलाड़ी धीमी गति से फील्डिंग करते हैं, जिसके कारण भारत ने बहुमूल्य रन गंवाए. उन्होंने कहा, ‘गेंद इन खिलाड़ियों के पास जाने पर ऑस्ट्रेलियाई या श्रीलंकाई बल्लेबाज दो या तीन रन लेने की कोशिश करेंगे. इसका मतलब है कि हमारे खिलाड़ियों के शरीर पर और अधिक दबाव पड़ेगा क्योंकि थ्रो और डाइविंग, दोनों अच्छी होनी चाहिए. इन दोनों चीजों के कारण उन पर निरंतर दबाव रहेगा. इससे हमारी फील्डिंग काफी प्रभावित होगी. इसका अर्थ है कि हमारे बल्लेबाजों पर उन अतिरिक्त 20 रनों को बनाने का दबाव रहेगा.’
सहवाग ने अगले मैच में जब धोनी से फिर कमान ली तो एक और हार मिली. इस हार पर जब टिप्पणी की गई तो सहवाग ने अपने 'क्लासिक' कैच के बारे में कहा, ‘आपने मेरा कैच देखा? हम पिछले 10 वर्षों से इसी तरह फील्डिंग करते आ रहे हैं.’
लेकिन सहवाग ने टीम में किसी तरह की फूट से इनकार किया. उन्होंने कहा, ‘हम एकजुट हैं, खुश हैं. वे (धोनी) कप्तान हैं. जो चाहें वे कह सकते हैं. वे मीडिया को संबोधित करते हैं और ऐसा पिछले दो वर्षों से करते आ रहे हैं. हमें इसकी आदत है.’ लेकिन टीम इंडिया ऑस्ट्रेलिया में खुद ही बता रही है कि उसके भीतर कितने मतभेद हैं. ऐसा पहले शायद ही देखा गया हो. दौरे की लंबी अवधि और लगातार खराब प्रदर्शन अपनी कीमत वसूल रहे हैं. अगर आपमें हिम्मत है तो इसे पढ़ते रहिए क्योंकि कोई भी पक्के तौर पर कह सकता है कि यह तमाशा यहीं खत्म होने को नहीं है.
लेखक द ऑस्ट्रेलियन अखबार में क्रिकेट विषयों पर लिखते हैं

