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आखिर बिहार विधानसभा चुनावों की चाभी ईबीसी के पास क्यों है?

बिहार विधानसभा चुनाव में जीत-हार के बीच अति पिछड़ी जातियों के मतदाता अहम भूमिका तय करते हैं, जो करीब 30 प्रतिशत हैं.

गया में 19 अक्तूबर को नीतीश कुमार (एएनआइ)
गया में 19 अक्तूबर को नीतीश कुमार (एएनआइ)
अपडेटेड 26 अक्टूबर , 2020

अमिताभ श्रीवास्तव

इंडिया टुडे के लोकनीति-सीएसडीएस ओपीनियन पोल में बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए के लिए बहुमत का अनुमान जाहिर किया गया है. लेकिन राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन से नजदीकी मुकाबले में 6 प्रतिशत अंक का फर्क अगर है तो इसमें अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी) की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होगी.  

ईबीसी या अति पिछड़ों में करीब 113 जातियां आती हैं जो कि राज्य में ओबीसी दर्जे में हैं. इनमें से अधिकांश लोग वंचित तबके के हैं और राज्य का 30 प्रतिशत वोट इसी तबके में हैं. माना जाता है कि ये फ्लोटिंग वोट है यानी इनकी किसी के प्रति निष्ठा नहीं है. ईसीबी में बिंद, मल्लाह, केवट (मछुआरे), निषाद (नाव चलाने वाले), चंद्रवंशी, लोहार, कुम्हार, बढ़ई, सुनार, तेली, कहार, नोनिया आदि शामिल हैं. करीब दो दर्जन अधिसूचित ईबीसी मुस्लिम समुदाय से हैं और इन्हें भी स्कॉलरशिप और पंचायतों में आरक्षण जैसी वे सभी सुविधाएं हासिल हैं जो हिंदुओं को हैं. अगर भाजपा से तालमेल होते हुए भी नीतीश अगर मुस्लिमों के वोट लेने में सफल हो सके हैं तो यह अल्पसंख्यकों के इन्हीं समूहों की बदौलत मुमकिन हुआ.  

लालू के जिन्न से लेकर नीतीश के समर्थन तक  

अपने जमाने में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का एक प्रसिद्ध वाक्य था ‘बैलेट बॉक्स से जिन्न निकलेगा’. राजद नेता कहते हैं कि जिन्न से लालू यादव का आशय ईबीसी के समर्थन से था. ईबीसी लंबे समय से किसी एक राजनीतिक दल के समर्थक नहीं रहे हैं क्योंकि इसमें बहुत सी जातियां हैं लेकिन 1990 से लेकर 2005 तक लगातार चुनावों में इन्होंने राजद का साथ दिया. मुस्लिम और यादव लालू यादव के भरोसेमंद समर्थक रहे हैं और ईबीसी उनके खामोश ‘जिन्न’ रहे. 2004 के लोकसभा चुनाव तक लालू ने ईबीसी समूहों के बीच प्रचार किया और उनकी समस्याओं के समाधान का भरोसा दिया लिहाजा तब तक ईबीसी ने भी उनका साथ दिया.  

लेकिन नीतीश कुमार ने नवंबर 2005 में मुख्यमंत्री बनते ही राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया. उन्होंने ईबीसी को मंडल के खांचे से बाहर निकालने का काम किया जिस पर लालू यादव की पकड़ थी. नीतीश ने सबसे पहले इनकी स्थानीय निकायों में भागीदारी सुनिश्चित की. इसके लिए जनवरी 2006 में जिला बोर्ड, पंचायत समिति और ग्राम पंचायत-तीन चरणों वाले स्थानीय निकायों में 20 प्रतिशत सीटें इनके लिए आरक्षित की गईं. इसके बाद इन्होंने ईबीसी के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए इस वर्ग के युवाओं को सिविल सर्विस की तैयारी या कारोबार लगाने में मदद की.  

बिहार में ईबीसी को मजबूत करने का विचार सोशलिस्ट नेता कर्पूरी ठाकुर का था जिन्हें राज्य में सोशल इंजीनियरिंग का पिता कहा जाता है. ये ठाकुर ही थे जिन्होंने पिछड़ी जातियों को नौकरियों में आरक्षण की शुरुआत की थी और ईबीसी के लिए विशेष लाभ के वास्ते कोटे के भीतर कोटे की संकल्पना पेश की थी. लेकिन उनकी ये सोशल इंजीनियरिंग आगे नहीं बढ़ सकी क्योंकि उनकी सरकार 1979 में गिर गई. बाद में लालू ने ईबीसी का समर्थन तो हासिल कर लिया लेकिन उनके लिए कुछ खास किया नहीं.  

साल 2006 में नीतीश ने वह हासिल किया जो कभी ठाकुर ने सोचा था. जनता दल (यूनाइटेड) के प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद कहते हैं, “सशक्तीकरण का यह एक नाजुक तत्व है. पहली बार निचले तबके के समूहों को न केवल शासन के ढांचे का हिस्सा बनाया गया बल्कि बिहार में उनके शैक्षिक और कारोबारी महत्वाकांक्षाओं के लिए भी मदद की गई.”  

14 साल पहले नीतीश सरकार ने पंचायतों में ईबीसी को 20 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था जो कि गेमचेंजर साबित हुआ. इस कदम से पंचायत स्तर पर ईबीसी सत्ता की केंद्रीय भूमिका में आ गए. बिहार में जाति और समुदाय के बदले गणित ने नीतीश को बढ़िया चुनावी नतीजे दिए. ईबीसी ने जातियों से ऊपर उठकर 2009 और 2019 के लोकसभा चुनाव तथा 2010 और 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्हें जबरदस्त जीत हासिल करने में मदद की. फिलहाल जद (यू) के 16 में से 5 लोकसभा सांसद ईबीसी से आते हैं. इस साल जून में नीतीश ने अपने कोटे की तीन विधानपरिषद सीटों से भी ईबीसी वर्ग के नेताओं को सदन में भेजा. ईबीसी ने तेजस्वी का भी ध्यान खींचा है. जद (यू) ने 27 ईबीसी प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं तो तेजस्वी ने भी 24 को टिकट दिया है. भाजपा ने पांच ईबीसी उम्मीदवारों को टिकट दिया है और 11 सीटें मुकेश सहनी की विकासशील इनसान पार्टी (वीआइपी) के लिए छोड़ी हैं जो खुद भी ईबीसी (मल्लाह) समुदाय से ताल्लुक रखते हैं.

अनुवादः मनीष दीक्षित

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